बिजनेस स्टैंडर्ड - क्योंकि 'महंगे' पड़े सस्ते मकान
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क्योंकि 'महंगे' पड़े सस्ते मकान
रियल एस्टेट डेवलपरों की आफत में फंस गई जान...
राघवेंद्र कामत / मुंबई November 29, 2009

रियल एस्टेट कंपनियों की किफायती' मकानों की योजना को अब जमीनी सच्चाई का अहसास हो रहा है।

काफी शोरशराबे के साथ शुरू की गई कई योजनाओं को अब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। मांग उतनी नहीं है लेकिन रियल्टी कंपनियों ने फ्लैट उससे ज्यादा तादाद में बना दिए हैं। मिसाल के तौर पर हैदराबाद में पिछले एक साल में बने 30 लाख रुपये की कीमत वाले तीन मकानों में से केवल एक को ही खरीदार मिल पा रहे हैं।

कोलकाता, बेंगलुरु और गुड़गांव में हालात हल्के से बेहतर हैं यहां 50 फीसदी मकानों को ही खरीदार नसीब हो रहे हैं। यह कुछ शहरों तक सिमटी हकीकत नहीं है बल्कि पूरे देश की कहानी है। रियल एस्टेट रिसर्च फर्म प्रोप इक्विटी के अध्ययन के मुताबिक देश में बन रहे किफायती मकानों में से 40 फीसदी मकान नहीं बिक पा रहे हैं।

हालांकि 30 लाख रुपये की कीमत वाले मकानों की मुंबई, गुड़गांव, नोएडा, ठाणे, बेंगलुरु, कोलकाता, हैदराबाद और पुणे में मांग बढ़ी है। मगर सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि मांग जितनी तेजी से बढ़ी है रियल्टी कंपनियों ने उससे भी ज्यादा तेजी से मकान खड़े कर दिए हैं।

प्रॉप इक्विटी के आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2008 से अक्टूबर 2009 के बीच बने 1,05,637 फ्लैटों में से केवल 60,464 को ही खरीदार मयस्सर हो पाए हैं। इस लिहाज से देखें तो बिक्री का आंकड़ा केवल 57 फीसदी ही है। हैदराबाद शहर में ही इस दौरान 8,200 ऐसे फ्लैट बने लेकिन इनमें से एक तिहाई ही बिकने में कामयाब हुए।

कुछ शहरों में तो बिक्री का रिकॉर्ड और भी खराब है और बने हुए मकानों को बिकने में 4 से 16 महीनों का वक्त लग सकता है। यह समयसीमा तब के लिए है जब रियल्टी कंपनियां इस तरह का नया निर्माण नहीं करतीं। उदाहरण के लिए गुड़गांव में अगस्त 2009 से अक्टूबर 2009 के बीच हर महीने 326 फ्लैट बिके।

इस रफ्तार के हिसाब से बचे हुए फ्लैट बिकने में 16 महीने लग सकते हैं। इसी तरह कोलकाता में आठ महीने और बेंगलुरु में छह महीने का वक्त खर्च हो सकता है। पिछले एक साल में यूनिटेक, ऑमेक्स, टाटा हाउसिंग, पूर्वांकरा, लोढ़ा डेवलपर्स और अंसल जैसी रियल एस्टेट कंपनियों ने 30 लाख रुपये कीमत वाले मकानों की कई परियोजनाएं शुरू की हैं।

मगर मंदी की वजह से भी इन मकानों की बिक्री प्रभावित हुई। प्रॉप इक्विटी के संस्थापक और सीईओ समीर जसूजा कहते हैं कि कई कंपनियों को लगा कि केवल यही सेगमेंट बढ़िया कर रहा है इसलिए इस पर दांव लगाना बेहतर रहेगा। लेकिन मांग की तुलना में अधिक आपूर्ति ने खेल बिगाड़ दिया है।

एचडीएफसी के प्रमुख दीपक पारेख का कहना है, 'जहां पर कंपनियां किफायती दरों पर मकान बेच रही हैं वहां पर बिक्री में दिक्कत नहीं आ रही लेकिन जहां भी कीमत बढ़ी है वहां पर मुश्किल आई है।'

शहर                                  खपत (फीसदी में)
हैदराबाद                                   35.85
कोलकाता                                 43.07
बेंगलुरु                                     45.53
गुड़गांव                                    47.20
चेन्नई                                     52.64
थाणे                                       54.80
पुणे                                        60.54
मुंबई                                      62.62
नोएडा                                    80.72
(
नवंबर 08 से अक्टूबर 09 के बीच मांग और आपूर्ति पर आधारित)
स्रोत: प्रोप इक्विट

किफायती मकानों के लिए नहीं मयस्सर हो रहे हैं खरीदार
पिछले एक साल में केवल 57 फीसदी मकान बिक पाए
बचे हुए स्टॉक को बिकने में लग सकता है 4 से 16 महीने का वक्त
कई शहरों में बिक्री बढ़ी लेकिन मांग की तुलना में आपूर्ति अधिक

Keyword: real estate companies, affordable housing, projects became flop, kolkata, bengaluru, gurgaon, prop equity,
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