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फंड के बड़े आकार पर न जाएं, अपनी अक्ल लगाएं
नेहा पांडेय / मुंबई November 26, 2009

म्युचुअल फंड बाजार जोखिमों से बचे नहीं रह सकते। निवेश करने से पहले ऑफर डॉक्यूमेंट को सावधानी से पढ़े।

फंड कंपनियों को अपने विज्ञापनों और निवेशकों से संपर्क बनाने के लिए जो संवाद कायम करना होगा उसमें इस वाक्य को शामिल करना होगा। लेकिन बाजार जोखिम की बात ऐसी नहीं है जिससे निवेशकों को चिंतित होना चाहिए खासतौर पर वे जो एक मौजूदा फंड में निवेश कर रहे हों है।

विश्लेषकों को हमेशा यह सलाह दी जाती है कि उन्हें अपने पिछले प्रदर्शन, शेयरों के चयन और शार्पे रेशियो पर पर नजर रखनी चाहिए। दूसरे कारकों में नकदी, राशि के आकार, औसत परिपक्वता, कारोबार की दर, कम खर्च अनुपात, प्रभार की संरचना कुछ ऐसे कारक हैं जिसे दिमाग में रखना जरूरी होता है।

जिन योजनाओं में ज्यादा नकदी, कम औसत परिपक्वता और कम कारोबार दर होता है उसे पसंद किया जाता है। हमेशा ऐसी योजनाओं का चयन करने की सलाह दी जाती है जिनका पोर्टफोलियो विशाखित हो क्योंकि इनमें कम जोखिम होता है। पोर्टफोलियो का आकलन कंपनी, सेक्टर और उद्योग के आधार पर किया जाता है।

हालांकि कई इक्विटी डाइवर्सिफाइड फंड हैं जिनमें ज्यादा रकम है। ऐसे में सवाल है कि क्या बड़ी रकम सीमा से फंड मैनेजर बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखता है, क्या इसी वजह से एक निवेशक को वैसे फंड पर ध्यान देना चाहिए जो 1,000 करोड़ रुपये से कम है?

हालांकि ज्यादा पूंजी से यह संकेत मिलता है कि निवेशकों ने योजना में अपना भरोसा जताया है। हालांकि इसके उलट कुछ विशेषज्ञों का मानना बड़ी पूंजी के आकार का प्रबंधन करना आसान नहीं होगा और फंड मैनेजर पैसे लगाने के लिए भरपूर कोशिश करते हैं। मसलन कुछ आर्बिट्रेज फंड ज्यादा पैसे लेने से मना कर देते हैं क्योंकि उनमें निवेश के मौके कम होते हैं।

सुंदरराजन का कहना है, 'बडे फ़ंड का प्रदर्शन सूचकांक पर बहुत बेहतर नहीं होता है क्योंकि इस तरह के स्कीम में ज्यादा शेयरों में निवेश किया जाता है। ऐसे में फंड मैनेजर अपने शेयरों का प्रबंधन बेहतर तरीके से नहीं कर पाता।' 

डीबीएस चोला परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी के सीईओ संजय सिन्हा कहना है, 'फंड मैनेजरों का कहना है कि ज्यादा रकम से फंड का प्रदर्शन बेहद सीमित हो सकता है लेकिन यह कुछ मामले में ही हो सकता है। किसी स्कीम का चयन करने के लिए रकम का आकार ही बेहद महत्वपूर्ण वजह नहीं होती है। बल्कि ट्रैक रिकॉर्ड और स्कीम की पोर्टफोलियो महत्वपूर्ण कारक हैं।'

विशेषज्ञों का कहना है कि लार्ज कैप फंड या इंडेक्स फंड में रकम का आकार ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता क्योंकि लार्ज कैप स्टॉक में ज्यादा नकदी होती है। मिसाल के तौर पर रिलायंस इंडस्ट्रीज और इन्फोसिस का का रोजाना औसत कारोबार क्रमश: 961 करोड़ रुपये और 312 करोड़ रुपये रहा है। लेकिन मिड-कैप या स्मॉल-कैप फंड के लिए बड़ी रकम फंड मैनेजरों के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है।

मिसाल के तौर पर मिड-कैप योजनाओं के लिए जिन फंड मैनेजरों के पास 250 करोड़ रुपये है, उनके लिए निवेश करना आसान होता है। लेकिन अगर रकम 1,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाए तो फंड मैनेजर इसमें जबरदस्त रूप से फंस जाते हैं क्योंकि उन्हें मिड और स्मॉल कंपनियों में ही निवेश करने का आदेश मिलता है।

इन शेयरों में नकदी का स्तर थोड़ा कम है। टोरंट पावर (मिड-कैप) और साउथ इंडियन बैंक (स्मॉल-कैप) का औसत रोजाना कारोबार 22.27 करोड़ रुपये और 6.89 करोड़ रुपये है। इसके अलावा इन योजनाओं में यह सख्त पाबंदी होती है कि एक शेयर में कुछ फीसदी से ज्यादा निवेश नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे चीजें और भी ज्यादा मुश्किल हो सकती हैं।

प्रिंसिपल म्युचुअल फंड, इक्विटी के सीआईओ के रजत जैन का कहना है, 'मिड-कैप के क्षेत्र में बड़ी मुश्किल से 3-4 फीसदी शेयरों को बेहतर रिटर्न मिल सकता है। बड़ी रकम वाली स्कीम के जरिये बड़े क्षेत्र में निवेश करना मुश्किल हो सकता है।' जैन का कहना है, 'करीब 5 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक की रकम की छोटी योजनाओं को नजरअंदाज करना अच्छा है।'

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