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हर महीने दो हिसाब
एफआईआई पर कंपनियों से कह सकती है सरकार
सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली November 25, 2009

विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) के मामले में सरकार सख्ती बरतने जा रही है। अब उन तमाम कंपनियों से हर महीने हिसाब मांगा जा सकता है, जिनमें विदेशी संस्थागत निवेश है।

सरकार की तीन प्रमुख एजेंसियां आर्थिक मामलों का विभाग, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस बात पर सहमत हो गए हैं कि ऐसी कंपनियों की पड़ताल हर महीने या हर तिमाही में की जाए। इसका उद्देश्य किसी भी क्षेत्र में एफडीआई की उस सीमा का उल्लंघन रोकना है, जो विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) के नए दिशानिर्देशों में तय की गई है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने महीने भर पहले मौजूदा दिशानिर्देशों में तब्दीली का प्रस्ताव रखा था। उसका कहना था कि विदेशी निवेश की सीमा में सभी तरह के निवेश शामिल होने चाहिए। इसमें एफआईआई, प्रवासी भारतीय के निवेश, अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (एडीआर), ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट्स (जीडीआर), विदेशी मुद्रा में परिवर्तनीय बॉन्ड और परिवर्तनीय तरजीही शेयर शामिल हैं।

मंत्रालय का प्रस्ताव था कि इन निवेशों के लिए कोई उप सीमा निर्धारित नहीं की जाए। फिलहाल किसी भारतीय कंपनी में एफआईआई 24 फीसदी तक हो सकता है। लेकिन अपनी सालाना आम बैठक में प्रस्ताव पारित कर वह इसे बढ़ा सकती है। यह प्रस्ताव सचिवों की समिति के पास आएगा और फिर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति को जाएगा।

मंत्रालय के शुरुआती प्रस्ताव पर सवाल उठाए गए थे, जिसमें कहा गया था कि विदेशी निवेश के आकलन के लिए 31 मार्च की तारीख तय की जानी चाहिए क्योंकि एफआईआई पर रोजाना नजर नहीं रखी जा सकती। आरबीआई ने कहा कि एफआईआई निवेश में उतार चढ़ाव आता रहता है और बाजार की चाल से यह सीधे प्रभावित होता है।

ऐसे में कुछ समय के लिए एफडीआई की सेक्टर सीमा तो टूट ही सकती है, किसी कंपनी में विदेशी हिस्सेदारी 51 फीसदी से भी ज्यादा हो सकती है, जिसका मतलब है कि भारतीय कंपनी विदेशी हो जाएगी। इससे बैंकिंग और दूसरे संवेदनशील क्षेत्रों पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए मासिक या तिमाही आधार पर एफआईआई हिस्सेदारी का जायजा लेना आरबीआई को सही लगा।

हर महीने मांगा जा सकता है एफआईआई का ब्योरा
एफडीआई के नए दिशानिर्देशों के तहत होगी पहल
बैंकिंग और संवेदनशील सेक्टरों को बचाने की कवायद

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