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गन्ना किसानों के आंदोलन से दबाव में आया संप्रग
दिल्ली डायरी
ए. के. भट्टाचार्य /  November 24, 2009

हाल के समय में सरकार ने जितनी तेजी से पलटी मारी है उतनी जल्दी शायद किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया होगा।

संसद के बाहर गन्ना किसानों के सिर्फ एक दिन के प्रदर्शन के बाद ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने पिछले महीने जारी अधिसूचना के विवादास्पद प्रावधान को वापस लेने का फैसला कर लिया। संप्रग ने पिछले महीने गन्ना उगाने वाले किसानों को उचित व लाभकारी मूल्य (एफआरपी) के भुगतान की बाबत अधिसूचना जारी की थी।

आप चाहें तो इसे उत्तरदायी सरकार का उदाहरण कह सकते हैं। कुल मिलाकर लोकतंत्र में किसी सरकार को जनता की वैध मांग को निश्चित रूप से सुनना चाहिए। वास्तव में विपक्षी दलों ने इसे भारतीय लोकतंत्र की जीत बताया है। सरकार के भीतर भी नीति में बदलाव को सतर्क मंत्रियों का संकेत बताते हुए इसे सही ठहराने की कोशिश हुई, जो नहीं चाहते थे कि किसानों के आंदोलन से राजनीतिक संकट में इजाफा हो।

ये दावे और बयान कितने खोखले हैं, यह तब और स्पष्ट हो जाता है जब हम सही संदर्भ में इस आदेश के ब्योरे, इसकी पृष्ठभूमि और उस तरीकेको रखते हैं जिसके तहत सरकार ने इसके विवादास्पद प्रावधान को निरस्त किया। यहां कई विंदुओं पर स्पष्टीकरण की दरकार है।

पहला, केंद्र सरकार के विवादास्पद आदेश ने आवश्यक वस्तु अधिनियम का सहारा लिया था और राज्य सरकार के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि अगर वे गन्ना किसानों को केंद्र द्वारा तय उचित व लाभकारी मूल्य (एफआरपी) से ज्यादा भुगतान करना चाहते हैं तो उसे अतिरिक्त राशि का भुगतान अपने से करना होगा।

दूसरे शब्दों में अगर राज्य सरकारें ऊंची कीमत देकर गन्ना किसानों को खुश करना चाहती हों तो वे उम्मीद न करें कि इसका भार केंद्र या चीनी मिलें उठाएंगी। ऐसे में किसान इस आदेश से क्यों चिंतित थे? आदर्श स्थिति यह है कि अगर गन्ना किसानों को लगता था कि वे ऊंची कीमत के हकदार हैं तो उन्हें राज्य सरकार का दरवाजा खटखटाना चाहिए था।

लोकतंत्र के प्रति उत्तरदायी सरकार होने के नाते संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह तय करना चाहिए कि क्या राज्य के किसानों को केंद्र द्वारा तय की गई उचित व लाभकारी कीमत से कुछ ज्यादा दिए जाने की दरकार है या नहीं। लेकिन ऐसा वास्तव में नहीं हुआ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश ज्यादातर गन्ना किसान और उनमें से कई मुलायम सिंह यादव (जिन्होंने बहुजन समाज पार्टी की मायावती के हाथों अपनी सत्ता गंवा दी है) के प्रति निष्ठावान किसानों ने इसके बदले केंद्र सरकार का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। यह विचित्र तो है, लेकिन सच है।

मुलायम सिंह यादव ने भी अपना खेल खेला। किसानों को ऊंची कीमत देने के लिए मायावती पर दबाव बनाने के बजाय उन्होंने केंद्र पर गन्ना किसानों को बकाया भुगतान से वंचित रखने के लिए साजिश रचने का आरोप लगाया। मुमकिन तौर पर यह तर्क दिया जा सकता है कि यादव ने केंद्र को निशाना बनाया क्योंकि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इससे उन्हें ज्यादा राजनीतिक लाभ मिल सकता है।

लेकिन इस वजह से संप्रग सरकार के खिलाफ उनका वर्तमान कदम पूरी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। निश्चित रूप से केंद्रीय आदेश के दो मुख्य प्रावधान थे। पहला प्रावधान किसानों के खिलाफ नहीं था। कहा गया था कि केंद्र द्वारा तय कीमत से ज्यादा भुगतान से राज्य सरकार को पड़ने वाला भार चीनी मिल के बजाय राज्य के खजाने पर पड़ेगा। यह अतार्किक नहीं था।

लेकिन राजनीति अपने आप विचित्र खेल खेलती है। सभी राजनीतिक दलों ने फैसला लिया कि इस वजह से पड़ने वाला भार या तो उद्योगों द्वारा वहन किया जाना चाहिए या फिर केंद्र द्वारा और किसी भी सूरत में इसका भार राज्य सरकारों को नहीं वहन करना चाहिए। बुरा यह हुआ कि केंद्र सरकार भी दबाव की इस राजनीति में आ गई।

हां, केंद्र के आदेश में मौजूद दूसरा प्रावधान गन्ना किसानों के खिलाफ गया। इसने गन्ने की ऊंची कीमत के रूप में चीनी मिलों के भारी मुनाफे में किसानों के साथ साझेदारी करने की व्यवस्था को समाप्त कर दिया था। इससे केंद्र सरकार की अग्रिम योजना जैसे बड़े मुद्दे को सामने ला दिया जो कि गन्ना किसानों के लिए उचित व लाभकारी कीमत तय करने के पहले बनाई गई या नहीं बनाई गई हो सकती है।

गन्ने की कीमत की बाबत पिछले दो महत्त्वपूर्ण बदलाव के लिए आदेश जारी किए गए थे : राज्यों द्वारा घोषित गन्ने की ऊंची कीमत का भार उद्योगों से लेकर राज्य के खजाने पर हस्तांतरित करना और किसानों के साथ मुनाफे की साझेदारी से उद्योग को मुक्त करना। पहला कदम उद्योगों की कीमत पर किसानों को वित्तीय छूट की खैरात देने की राज्य की स्वतंत्रता को कमजोर करने से संबंधित था।
 
दूसरा कदम सीधे तौर पर किसानों से जुड़ा हुआ था। इस आदेश पर जिस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई है उस बाबत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को पहले से अनुमान लगाना चाहिए था और इस पर भी कि विभिन्न राज्य सरकारें और किसान गन्ने की उचित व लाभकारी कीमत के दो मुख्य प्रावधानों के खिलाफ किस तरह आमने-सामने आ गए।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को इस तरह से प्रचारित किया जा रहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की और इस संकट को समाप्त कराया। लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार और खास तौर से उपभोक्ता मामले, खाद्य व जनवितरण मंत्रालय को विचार करना चाहिए कि गन्ना की कीमत प्रणाली में बदलाव की कोशिश में कहीं उनके कदम लड़खड़ा तो नहीं गए और सत्ताधारी पार्टी को राजनीतिक रूप से शर्मिंदगी उठानी पड़ी जिससे बचा जा सकता था।

Keyword: sugar farmers, agigation, UPA, FRP, democracy,
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