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हक का सवाल
संपादकीय /  November 17, 2009

नागरिक संगठनों के जोरदार विरोध के बाद सरकार ने यह मान लिया है कि वह सूचना के अधिकार कानून में संशोधन करने पर विचार कर रही है।

हालांकि उसने सामाजिक कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया है कि कोई भी कदम उठाने से पहले एक पारदर्शी और सलाह-मशविरे की प्रक्रिया को अपनाया जाएगा और अगर नागरिक समूह सरकार को यह समझाने में कामयाब रहे कि संशोधन या तो अनावश्यक है या फिर इस अधिकार के असर को कम करने वाला है तो संशोधन नहीं किया जाएगा।

इस भरोसे के बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार एक ऐसे कानून को बदलने पर विचार कर रही है जो पिछली संप्रग सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में से एक है। संशोधन की पैरोकारी करने वाले लोगों की दो प्रमुख दलीलें हैं- अवांछनीय और बेकार के आवेदनों को छांटना और चर्चा के दौरान फाइल नोटिंग को कानून के दायरे से बाहर करना।

सामाजिक संगठनों ने दूसरी ओर बड़ी संख्या में ऐसे कारण बताए हैं। आखिर वे संशोधन को पीछे हटने वाला कदम क्यों मानते हैं। दो विस्तृत अध्ययन, जिनमें से एक सरकार की ओर से कराया गया है, में बताया गया है कि इस कानून के बेहतर इस्तेमाल में क्या बाधाएं हैं। इनमें से कुछ रिकॉर्ड प्रबंधन की बुरी स्थिति, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी और आवेदकों में जागरूकता की कमी।

उल्लेखनीय है कि किसी भी अध्ययन में अनावश्यक आवेदनों को बाधक नहीं माना गया है। सच पूछिए तो इस स्थिति में सरकार द्वारा नियुक्त सूचना आयुक्त का भी मानना है कि इस स्तर पर कानून में किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है। विवाद की असली वजह फाइल नोटिंग है। ज्यादातर मंत्री और नौकरशाह अभी भी खुद को इस कानून के दायरे में शामिल किए जाने का विरोध कर रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानून के दायरे में उन्हें शामिल करने से सरकार के कामकाज में किसी तरह की बाधा नहीं पैदा होगी या कामकाज ठप नहीं होगा। दूसरी ओर कई अधिकारियों का मानना है कि सूचना के अधिकार कानून के मौजूदा स्वरूप से कई ईमानदार और गंभीर अधिकारियों के हाथ मजबूत हुए हैं और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि अब यह सवाल किया जा रहा है कि कोई खास फैसला क्यों किया गया।

ऐसा इस कानून के जरिए ही संभव हो सका है। अगर फाइल नोटिंग को हटा लिया गया तो केवल आधिकारिक पत्राचार ही इस कानून के दायरे में बचा रह जाएगा और इस तरह यह कानून अप्रभावी साधन बनकर रह जाएगा। एक ऐसा देश जो भ्रष्टाचार के वैश्विक सर्वेक्षण में निचले पायदान पर है, और सार्वजनिक सेवाओं की घटिया आपूर्ति जिसकी खासियत है, उस देश में सरकारी कार्यकलाप में खुलापन सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

कानून का सही कार्यान्वयन सुनिश्चित करके ही ऐसा किया जा सकता है। इस तरह कुछ प्रमुख प्रशासनिक दिक्कतों का समाधान किया जा सकता है। सच पूछिए तो नागरिक इस नए अधिकार का ऐसे उत्साह से इस्तेमाल कर रहे हैं कि उनका निपटान मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में इस बात पर ध्यान देना चाहिए आवेदनों की भरमार को कैसे रोका जाए, न कि इस कानून को कैसे बेअसर बना दिया जाए।

Keyword: social activist, research, act, RTI,
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