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रेडियो के लिए नई नीति देर से होगी पेश
विनिता कोहली-खांडेकर / नई दिल्ली November 16, 2009

देसी रेडियो उद्योग क्या वक्त के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है?

बीते हफ्ते एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स ऑफ इंडिया (एआरओआई) के पहले सम्मेलन में रॉयल्टी लागत, एक शहर में एक से ज्यादा रेडियो स्टेशन खोलने की इजाजत और समाचार प्रसारण के पुराने मुद्दे ही सुनाई दिए। हालांकि, छोटी-बड़ी सभी रेडियो कंपनियों के लिए एक दिक्कत समान सी है, यह है नई रेडियो पॉलिसी के आने में देरी।

ट्राई ने 2008 की शुरुआत में सरकार के सामने एक मसौदा पेश किया था, जो काफी उदार था। सरकार ने उसकी काफी सिफारिशों को मान लिया है, जिसके तहत एफएम रेडियो स्टेशनों से गैर राजनीतिक खबरों (जैसे ट्रैफिक, मौसम, स्पोट्र्स अपडेट) का प्रसारण किया जा सकता था।

साथ ही, सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा भी 20 फीसदी से बढ़ाकर 26 फीसदी करने की इजाजत दे दी। हालांकि, इस मसौदे को अब भी सरकार ने हरी झंडी नहीं दिखाई है। इसी से जुड़ा हुआ है, निजी रेडियो स्टेशन लाइसेंस वितरण के तीसरे चरण के लिए रेडियो ऑपरेटरों का उत्साह। इस वक्त भारत में आकाशवाणी के साथ-साथ 248 निजी रेडियो स्टेशन काम कर रहे हैं।

एक अनुमान के मुताबिक बीते साल इस उद्योग ने विज्ञापनों के जरिये 1,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की कमाई की थी। रेडियो उद्योग, 16.7 अरब डॉलर के देसी मीडिया और मनोरंजन उद्योग का सबसे संगठित और सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला हिस्सा है। हालांकि, यह बात साफ नहीं है कि यह कैसे मोटा मुनाफा कमाने वाला बन सकता है।

ज्यादातर ऑपरेटर नए स्टेशनों के लिए बोली लगाना चाहते हैं क्योंकि मुनाफा कमाने के लिए बनाई गई उनकी रणनीति के तहत विस्तार करना एक अहम हिस्सा है। लेकिन नए स्टेशनों के लिए बोली लगाने से उन्हें कुछ पुरानी दिक्कतों का भी समाना करना पड़ सकता है। मिसाल के तौर पर रॉयल्टी लागत।

एफएम स्टेशनों के परिचालन लागत में इनका हिस्सा सबसे बड़ा रहता है। चूंकि रॉयल्टी हर घंटे बजाए गए संगीत के आधार पर तय की जाती है, छोटे शहरों के एफएम स्टेशनों की 40-60 फीसदी कमाई रॉयल्टी चुकाने में ही खर्च हो जाती है।

चेन्नई, मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रेडियो स्टेशनों की कमाई का सिर्फ सात फीसदी हिस्सा ही रॉयल्टी पर खर्च होता है। दरअसल, इन शहरों में रेडियो स्टेशनों को 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई होती है। इसलिए यहां कारोबार काफी फायदेमंद होता है। 

हालांकि, जिन नए रेडियो स्टेशनों को तीसरे चरण के तहत नीलाम किए जाना है, उनमें से ज्यादातर रेडियो स्टेशन छोटे शहरों से ताल्लुक रखते हैं। इसलिए इनके लिए कमाई की संभावनाएं भी कम होती हैं।

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