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कारोबारियों की कामयाबी की नायाब दास्तां
पुस्तक समीक्षा
कैलाश नौटियाल /  November 03, 2009

दसवीं की परीक्षा मात्र 45 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण करने के बाद बिट्स पिलानी और आईआईएम, अहमदाबाद जैसे देश के नामी-गिरामी संस्थानों में किसी छात्र का प्रवेश पा लेना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

आगे चलकर यही छात्र प्रबंधन पाठयक्रम पूरा करने के बाद एक कुशल व्यवसायी बनता है और अब अपने पुराने प्रबंध संस्थान में  प्रोफेसर के रूप में नई पीढ़ी को सफल उद्यमी बनने के लिए प्रेरित कर रहा है।

यह करिश्मा करने वाले छात्र थे सुनील हांडा जो इस समय भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), अहमदाबाद में लैबोरेटरी इन एंट्रीप्रीनियरिल मोटिवेशन (एलईएम) पाठयक्रम के छात्रों को 1992 से पढ़ा रहे हैं। यह आईआईएम का प्रतिष्ठित कोर्स माना जाता है। प्रो. हांडा के अनुसार एलईएम कोर्स कर चुके 400-500 छात्रों में से 150 के करीब उद्यमी बन चुके हैं।

रश्मि बंसल की पुस्तक स्टे हंग्री स्टे फूलिश में 25 जाने-माने उद्यमियों के इसी तरह के अनेक रोचक प्रसंग दिए गए हैं। ये सभी उद्यमी आईआईएम अहमदाबाद के प्रबंधन स्नातक हैं और उन्होंने अपने-अपने कारोबार में शोहरत हासिल की है। पुस्तक में इन उद्यमियों के जीवन की प्रेरणादायी गाथा है जो उनसे बातचीत के आधार पर लिखी गई है।

दिलचस्प यह है कि इन 25 उद्यमियों में से यादातर मध्यम वर्ग के हैं जिनके पिता कारोबार नहीं बल्कि नौकरी करते थे। इन सभी उद्यमियों में एक समानता नजर आती है, वह यह कि उन्हें अपने सपनों पर अटल विश्वास था।

उन सभी की कहानी से एक बात साबित होती है कि उद्यमशीलता का गुण जन्मजात नहीं होता। यानी उद्यमी बनने के लिए किसी उद्यमी के परिवार में जन्म लेना जरूरी नहीं है। दृढ़ निश्चय और कड़ी मेहनत के भरोसे कोई भी उद्यम का बीहड़ रास्ता चुन सकता है।

पुस्तक में प्रो. हांडा बताते हैं- 'मेरे पिता पाकिस्तान से आए एक शरणार्थी हैं। अहमदाबाद आने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था। एक कपड़ा मिल में मजदूरी करते हुए उन्होंने अपना जीवन शुरू किया। वह (सुनील के पिता) रात 8 बजे से सुबह 8 बजे तक काम करते थे और कारखाने की बगल में एक चाल में रहते थे। इसी बीच उन्होंने मैट्रिक, बीएससी और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।'

प्रो. हांडा के अनुसार, दसवीं तक उनके 45 से 50 प्रतिशत अंक आते थे। लेकिन कठोर परिश्रम के फलस्वरूप उन्होंने हैदराबाद पब्लिक स्कूल से आईसीएसई में टॉप किया। उसके बाद बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग की। उसके पश्चात आईआईएम, अहमदाबाद से एमबीए किया।

प्रो. हांडा इस समय कोर एंबैलेज कंपनी के सीईओ भी हैं जिसका सालाना कारोबार 35 करोड़ रुपये का है। हालांकि कारोबार में भाई से अलगाव ने उनकी सोच को बदल दिया। प्रो. हांडा का कहना है कि, 'अलगाव की पीड़ा कई महीनों तक बनी रही। अंत में मेरे दिल, दिमाग और आत्मा ने पैसा कमाने की बात से तौबा कर ली। मैं सोचने लगा कि यह जीवन का मकसद नहीं हो सकता। जीवन में पहली बार मैं विषाद का शिकार हुआ।'

इसके बाद उन्होंने सामाजिक कार्य की ओर ध्यान देते हुए 1998 में एकलव्य स्कूल की स्थापना की जो आज अहमदाबाद का एक लोकप्रिय स्कूल है। एकलव्य लाभार्जन करने वाली कंपनी नहीं है। प्रो. हांडा से मिलती जुलती कहानी वेंकट कृष्णन की है जिन्होंने देश में वंचित तबके के लोगों को देने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए गिव इंडिया की शुरुआत की।

उन्होंने एक ऐसे स्कूल में शिक्षा ग्रहण की जहां यादा छात्र चालों और झुग्गियों से आते थे। वहां बिताए गए छह वर्षों ने उनके जीवन को बदल दिया। कुछ इसी तरह की कहानी विजय महाजन की है जिन्होंने ग्रामीण निर्धनों को ऋण उपलब्ध कराने के लिए बेसिक्स नाम के संगठन की शुरुआत की।

पुस्तक को तीन खंडों में बांटा गया है। पहले खंड का शीर्षक है- जिन्हें अपने ऊपर विश्वास है। इसमें उन प्रमुख व्यवसायियों की गाथा है जिन्होंने एमबीए करने के तुरंत बाद या केवल कुछ ही वर्षों तक नौकरी करने के बाद जोखिम से भरी छलांग लगाई और तब तक कठोर परिश्रम करते रहे जब तक कि सफलता उनके कदम नहीं चूमने लगी।

इनमें सुनील हांडा के अलावा नौकरी डॉट कॉम के संजीव बिखचंदानी, एडुकॉम्प के शांतनु प्रकाश, फीडबैक वेंचर्स के विनायक चटर्जी, मास्टेक के अशंक देसाई, सुभिक्षा के आर सुब्रमण्यन,श्री रेणुका शुगर्स के नरेंद्र मुरकुंबी, रॉयल ऑर्किड होटल्स के चंदर बालजी, टेगा इंडस्ट्रीज के मदन मोहनका और फाउंटेनहेड स्कूल के वरदान काबरा शामिल हैं।

दूसरे खंड का शीर्षक दिया गया है- उद्यमी जो अवसर का लाभ उठाकर उद्यमी बने। इनमें उन उद्यमियों का जीवन-वृत्तांत है जिनकी पहले तो उद्यमी बनने की कोई योजना नहीं थी लेकिन जब अवसर उनके सामने आया तो वे उद्यमी बन गए। उनकी सफलता की कहानी से पता चलता है कि उद्यमिता का गुण आवश्यक रूप से जन्मजात नहीं होता। किसी भी उम्र में आपका झुकाव उद्यम की ओर हो सकता है।

ऐसे उद्यमियों में मेकमाईट्रिप डॉट कॉम के दीप कालरा,एडलवाइस कैपिटल के रशेष शाह, इंडिया इन्फोलाइन के निर्मल जैन, ईएक्सएल सर्विस के विक्रम तलवार, आर्किड फार्मा के के राघवेंद्र राव, एमफेसिस के जेरी राव, आईसीआरआई के शिवरामन दुगगल, मार्केटिक्स के शंकर मरुवदा, प्रेशस फार्मल्स की रूबी अशरफ, आईआरआईएस की दीप्ता रंगराजन और कैलोरी केयर के साइरस ड्राइवर शामिल हैं।

तीसरे खंड का शीर्षक है- वैकल्पिक अभिदृष्टि। इसमें उन उद्यमियों की कहानी दी गई है जो उद्यमिता का इस्तेमाल सामाजिक प्रभाव के लिए या एक ऐसे मंच के रूप में कर रहे हैं जो उन्हें रचनात्मक अभिव्यक्ति का आधार प्रदान करता है। इनमें वेंकट कृष्णन और विजय महाजन के अलावा क्लोरोफिल के आनंद हाल्वे और सिंटेक्स के एसबी दनगयाच शामिल हैं।

हरेक उद्यमी के बारे में दिए गए अध्याय के अंत में उनकी ओर से भावी उद्यमियों को सलाह भी दी गई है। लेखिका के अनुसार पुस्तक का उद्देश्य है- युवा स्नातकों को प्लेसमेंट और आकर्षक वेतनों से परे देखने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने सपनों पर दृढ़ विश्वास करना सिखाना। इस लिहाज से इन उद्यमियों के जीवन से जुड़ी वास्तविक कहानियां भावी उद्यमियों को ही नहीं बल्कि सभी युवाओं को प्रेरित कर सकती हैं।

पुस्तक समीक्षा

स्टे हंग्री स्टे फूलिश
लेखिका : रश्मि बंसल
प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स
कीमत : 150 रुपये
पृष्ठ : 357

Keyword: Incredible story of traders success,
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