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लिबास में लिपटी साख
विल्स लाइफस्टाइल डिजायनरों के बनाए परिधान बेचता है, जिनकी कीमत 4,000 से 10,000 रुपये तक होती है। बता रहे हैं
भूपेश भंडारी और सायंतनी कर /  October 26, 2009

जब दुनिया नई सदी में कदम रखने जा रही थी, तभी आईटीसी ने वर्ष 2000 में विल्स लाइफस्टाइल के साथ पहनावों के खुदरा बाजार में कदम रख दिया।

इससे पहले इसकी सिगरेट से शायद ही कोई नावाकिफ हो, लेकिन समूह को इस बात का अहसास था कि इस कारोबार में अब उतनी चिंगारी नहीं रही। इसीलिए आईटीसी ऐसा कोई कारोबार तलाश रहा था, जहां एक पुख्ता ब्रांड तैयार किया जा सके और उसकी नजर पहनावों यानी कपड़ों पर टिक गई।

कपड़ों का बाजार तेजी से पांव पसार रहा था क्योंकि लोगों के पास खर्च करने के लिए अच्छी खासी रकम आ रही थी। आईटीसी ने विल्स के तहत सबसे पहले पुरुषों के लिए औपचारिक पहनावे और कामकाजी महिलाओं के लिए पाश्चात्य ढंग के कपड़े बाजार में उतारे। लेकिन साल बीतते गए और विल्स की अलमारी में ईवनिंग वियर, स्पोट्र्सवियर, डिजायनर वियर, इत्र तथा एसेसरीज की गिनती भी बढ़ती गई।

लेकिन 10 साल बीतने के बाद भी इसका कारोबार बहुत ज्यादा नहीं है। यह कारोबार आईटीसी को एफएमसीजी खंड के तहत आता है, जिसने पिछले वित्त वर्ष में 18,129 करोड़ रुपये का कारोबार किया। आईटीसी के लाइफस्टाइल खुदरा कारोबार के मुख्य कार्याधिकारी अतुल चंद कहते हैं कि विल्स लाइफस्टाइल का कारोबार तकरीबन 200 करोड़ रुपये हो सकता है।

उन्होंने कहा, 'तकरीबन 2,000 करोड़ रुपये के प्रीमियम परिधान बाजार में हमारी तकरीबन 10 फीसदी हिस्सेदारी है।' समूह के एक और ब्रांड जॉन प्लेयर्स से उसे 150 से 200 करोड़ रुपये का कारोबार मिलता है। इस ब्रांड के देश भर में 225 स्टोर हैं।

इस तरह आईटीसी के एफएमसीजी कारोबार में विल्स लाइफस्टाइल और जॉन प्लेयर्स की बमुश्किल 2 फीसदी हिस्सेदारी है। देश में ब्रांडेड परिधान का सालाना 10,000 करोड़ रुपये का बाजार है यानी आईटीसी का इसमें 4 फीसदी से ज्यादा हिस्सा नहीं है।

मुनाफे की लंबी चादर

बेशक आंकड़े बड़े नहीं हैं, लेकिन क्या इनसे फायदा हो रहा है। चंद आंकड़ों का खुलासा करने से इनकार कर देते हैं। लेकिन वह कहते हैं, 'हमने इतने अर्से में जो किया है, उससे हमारे कारोबार में मुनाफा बढ़ा है।' इसका आप कोई भी मतलब निकाल सकते हैं। लेकिन कुछ दूसरे आंकड़े आपको मुनाफे की बानगी देते हैं।

विल्स लाइफस्टाइल के रिटेल स्टोर 100,000 वर्ग फुट क्षेत्रफल में हैं, जिनसे सालाना चंद को 200 करोड़ रुपये की बिक्री हासिल होती है। इस तरह आप कह सकते हैं कि हर साल एक वर्ग फुट जमीन से उन्हें बिक्री में 20,000 रुपये मिलते हैं यानी हर महीने 1,650 रुपये से ज्यादा की बिक्री जमीन का यह टुकड़ा देता है।

किफायती सामान बेचने वाले  रिटेलरों को एक वर्ग फुट जमीन से महज 400 रुपये महीना की बिक्री मिलती है, जबकि लाइफस्टाइल रिटेलर भी एक महीने में 1,000 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से बिक्री कर पाते हैं। रेडीमेड कपड़ों का बाजार कई टुकड़ों में बंटा है। आदित्य बिड़ला समूह की मदुरा गारमेंट्स के पास प्रीमियम परिधान के बाजार की तकरीबन 12 फीसदी हिस्सेदारी है।

इस कंपनी के पास वैन हैजन, लुई फिलिप और एलन सॉली जैसे नामी ब्रांड हैं। आईटीसी के पास 10 फीसदी बाजार हिस्सेदारी है, जो खराब नहीं कही जा सकती। इससे यह बात भी साफ होती है कि इस बाजार में टक्कर जोरों की है और अपने ब्रांड की चमक बरकरार रखने के लिए चंद को हर समय चौकन्ना रहना पड़ता है। उनकी दिक्कत मदुरा गारमेंट्स जैसी कंपनियों का तौर तरीका है।

मदुरा ने हाल ही में विल्स लाइफस्टाइल की तर्ज पर हर वर्ग के परिधान बाजार में उतार डाले। कंपनी के मुख्य परिचालन अधिकारी शीतल कुमार मेहता कहते हैं, 'हम परिधान बाजार के कमोबश हरेक खंड में मौजूद हैं।' जाहिर है कि विल्स लाइफस्टाइल की खासियत अब खासियत नहीं रह गई। ऐसे में चंद को कुछ और तो करना ही था। इसलिए विल्स लाइफस्टाइल इंडिया फैशन वीक का मुख्य प्रायोजक बन गया।

चंद का मानना है कि इससे ब्रांड की पहचान और पुख्ता हो गई। इतना ही नहीं देश के नामी गिरामी फैशन डिजायरों तक भी इस ब्रांड की पहुंच हो गई। विल्स लाइफस्टाइल डिजायनरों के बनाए परिधान बेचता है, जिनकी कीमत 4,000 से 10,000 रुपये तक होती है। चंद कहते हैं, 'डिजायनर वियर को लोकप्रिय बनाने की यह सबसे बड़ी पहल है। हमने अब तक ऐसे 100,000 से ज्यादा परिधान बेच दिए हैं।'

दम के लिए कदम

इस बार चंद ने आठ दिग्गज डिजायनरों के साथ गठजोड़ किया है। ये नाम हैं - जे जे वलाया, राजेश प्रताप सिंह, राणा गिल, रीना ढाका, रोहित बल, रोहित गांधी और राहुल खन्ना, सत्या पॉल और शांतनु और निखिल। इनमें से कुछ परिधान खुद बनाते हैं और बाकी ठेके पर बनवाते हैं।

लेकिन यह जरूर है कि जो डिजायन विल्स लाइफस्टाइल के स्टोर पर पहुंच जाती हैं, वे कहीं और नहीं बिकतीं। सवाल है कि इससे डिजायनरों को क्या हासिल होता है? कम कीमत होने पर उनके ब्रांड की साख खराब नहीं होती? चंद कहते हैं कि इससे डिजायनर छोटे शहरों के बाजार में भी पहुंच जाते हैं। कम कीमत के डिजायनर कपड़ों को महिलाएं बहुत पसंद करती हैं।

विल्स लाइफस्टाइल में 35 फीसदी बिक्री महिलाओं के परिधानों की हैं और खरीदारों में आधी महिलाएं ही होती हैं। लेकिन जनाब, महिलाओं के लिए परिधान बेचना भी आसान नहीं हैं। कई कंपनियां इसमें चोट खाने के बाद तौबा कर चुकी हैं।

जानकार बताते हैं कि इसकी वजह महिलाओं की वह फितरत है, जिसकी वजह से वे एक-एक पाई की कीमत वसूलना चाहती हैं। रेमंड ने बी स्टोर शुरू किए थे, जो केवल महिलाओं के लिए थे। लेकिन ये स्टोर बंद हो चुके हैं। विल्स लाइफस्टाइल में महिला परिधान का कारोबार मजबूत करने के लिए चंद ने मिलान के रिकार्डो रामी स्टूडियो के साथ करार किया है। इसके परिधान केवल 2,000 से 3,000 रुपये में मिलेंगे।

हालांकि कुछ प्रतिद्वंद्वी मानते हैं कि महिला परिधान का बाजार अभी बहुत छोटा है और रेडीमेड परिधान के बाजार में अब भी पुरुषों का दबदबा है। मेहता कहते हैं, 'महिलाओं के ब्रांडेड परिधानों का बाजार अभी शुरुआती दौर में है। अगले पांच साल में बाजार जैसे-जैसे बढ़ेगा, हम भी अपना दखल बढ़ाते जाएंगे। उसी वक्त हम अपनी मौजूदगी बढ़ाएंगे।'

चंद भी मानते हैं कि महिला परिधानों के बाजार में कई पेच हैं। वह कहते हैं, 'इसकी कई वजहें हैं। कई कंपनियां इस बाजार में हैं, इसका असंगठित बाजार बहुत बड़ा है, कपड़े भी अलग-अलग तरह के इस्तेमाल होते हैं, रंग का मिजाज अलग होता है और स्टायल तथा एसेसरीज के बारे में भी आपको कोई तय हिसाब नहीं मिलेगा।'

लेकिन वह यह भी कहते हैं कि ग्राहक की नब्ज को सही तरह से पहचानने पर इसमें कामयाबी मिलना मुश्किल नहीं है। चंद ने डिजायनर वियर और रिकार्डो रामी के परिधान तो उतारे हैं, लेकिन उनकी कीमत 2,000 रुपये से ज्यादा है। चंद की मानें तो 1,500 से 2,000 रुपये के बीच दाम वाले परिधान ज्यादा बिकते हैं।

निगाह दूर की

लोकप्रिय परिधानों में ताजगी बनाए रखने के लिए चंद ने हर दो महीने में इनकी पूरी शृंखला बदलने का फैसला किया है। आम तौर पर रिटेलर गर्मियों के लिए अलग परिधान लाते हैं और सर्दियों के लिए अलग। लेकिन विल्स लाइफस्टाइल साल में 6 बार अपने कपड़ों की पूरी श्रृंखला बदलता है।

दरअसल चंद मानते हैं कि ग्राहक आम तौर पर हर दो महीने में विल्स लाइफस्टाइल के स्टोर में आता है, इसलिए हर बार उसे कुछ नया मिलना चाहिए। असल में यह ग्राहकों को अपना बनाकर रखने का तरीका है। चंद के मुताबिक विल्स लाइफस्टाइल के ग्राहक आम तौर पर उसके साथ जुड़े रहते हैं।

उसके 'लॉयल्टी कार्यकम' में 80,000 सदस्य हैं, जिनसे उसकी आधी से अधिक बिक्री हो जाती है। इतना ही नहीं उसके आधे से ज्यादा डिजायनर परिधान वे ग्राहक खरीदते हैं, जो पहले से उसके परिधान पहन रहे होते हैं।

हालांकि हर दो महीने में परिधानों की शृंखला बदलने के लिए विल्स को बेहतर आपूर्ति तंत्र की दरकार होगी। इसके अलावा बार-बार उसे छूट यानी सेल के जरिये कपड़े बेचने होंगे। कहा जाता है कि बार-बार सेल लगाने से ब्रांड की छवि खराब होती है। लेकिन चंद को इसकी फिक्र नहीं है।

वह कहते हैं, 'एंड ऑफ सीजन सेल का चलन तो इस कारोबार में बेहद आम है। सभी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भी ऐसा करते रहते हैं।' रही बात आपूर्ति की तो आईटीसी टी शर्ट के अलावा सभी परिधान खुद बनाता है।

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