बिजनेस स?टैंडर?ड - गारंटरों से कर्ज वसूली जायज नहीं
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गारंटरों से कर्ज वसूली जायज नहीं
एम. जे. एंटनी /  April 24, 2008
कर्ज वसूली एक ऐसा काम है, जिसके लिए पिछले कुछ समय में कानूनी हथियार का इस्तेमाल तो किया ही जा रहा है, जोर जबर्दस्ती करने में भी कोई गुरेज नहीं हो रहा है।
 
नामीगिरामी बैंकों के हट्टे-कट्टे एजेंटों को रोकने के लिए अदालतों ने भी कई फैसले दिए हैं। शायद यही वजह है कि वित्तीय संस्थाओं ने अपनी रकम वापस पाने के लिए अब कानूनी रास्ते पर चलना शुरू कर दिया है।
कर्ज वसूली की रफ्तार तेज करने के लिए तमाम कानून बनाए गए हैं, इसके बावजूद कानूनी पचड़े सुलझाने के लिए अक्सर सर्वोच्च न्यायालय को बीच में आना पड़ता है, जैसा कि हाल ही में दो मामलों में देखा गया।
कर्नाटक राज्य वित्तीय निगम बनाम एम. नरसिंहैया मामले में न्यायालय ने किसी कंपनी के निदेशकों की जिम्मेदारी का जिक्र किया। उसके मुताबिक औद्योगिक हितों के लिए गए कर्ज के मामले में निदेशक ही जमानत देते हैं। ए. पी. रॉक्स लिमिटेड के कुछ निदेशकों ने गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्रों के रूप में कंपनी को कर्ज दिलाया था।
उन्होंने राज्य वित्तीय निगम को उस ऋण की वापसी की गारंटी देने वाले कागजात पर दस्तखत भी किए थे। इतना ही नहीं, निदेशकों ने जमानत के तौर पर अपनी संपत्तियां रखने की बात भी कही थी।
तीन साल बाद कंपनी मुकर गई, जिसकी वजह से निगम को वसूली की कार्यवाही शुरू करनी पड़ी। उसने राज्य वित्तीय निगम अधिनियम की धारा 29 का हवाला दिया और निदेशकों की संपत्तियों पर कब्जा करने की कोशिश की। इससे बौखलाए निदेशक उच्च न्यायालय पहुंच गए, जिसने राज्य निगम के आदेश खारिज कर दिए। उच्चतम न्यायालय में भी निगम की अपील खारिज कर दी गई।
इस अधिनियम की धारा 29 में कर्ज वसूली के बारे में राज्य वित्तीय निगमों के अधिकारों का जिक्र किया गया है। इनका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब कोई कंपनी कर्ज के तौर पर ली गई रकम वापस नहीं करती। इसके मुताबिक 'निगम औद्योगिक संस्था यानी कंपनी का प्रबंधन अथवा संपत्तियां अपने हाथ में ले सकता है अथवा दोनों ही उसके हाथ में आ सकते हैं।
इसके अलावा वित्तीय निगम के पास रेहन रखी गई या उसे सौंपी गई संपत्ति को पट्टे अथवा बिक्री के जरिये किसी और को देने का अधिकार भी निगम के पास होता है।' अधिनियम की धारा 31(1)(एए) के अनुसार निगम को जमानत की जवाबदेही तय करने का भी अधिकार हासिल है।
बकाये की वसूली की प्रक्रिया तेज करने के लिए राज्य वित्तीय निगमों को मिला यह असाधारण अधिकार है। यह विशेष कानून जब बनाया गया था, तो उसका मकसद राज्य निगमों को यह मानकर अधिकार देना था कि वे उनका इस्तेमाल सौहार्द और सही उद्देश्य के साथ करेंगे।
कई पारंपरिक कानून भी हैं, जो ऋणदाताओं को उनको पैसा वापस लेने के अधिकार प्रदान करते हैं। सामान्य कानून के अलावा संपत्ति के हस्तांतरण कानून की धारा 69 के मुताबिक जिस व्यक्ति के पास संपत्ति गिरवी रखी गई है, वह कुछ मामलों को छोड़कर संपत्ति बेच सकता है और उसमें कानूनी हस्तक्षेप भी नहीं हो सकता। ऋणदाता करार की याद दिला सकता है और कह सकता है कि मूल रूप से ऋण लेने वाले की ही तरह जमानत लेने वाले की भी जवाबदेही बनती है।
भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 128 में ऐसे ही मामलों का जिक्र है। लेकिन राज्य वित्तीय निगम अधिनियम एक विशेष कानून है और सर्वोच्च न्यायालय के मुताबिक उसके प्रावधानों को सही परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए।
जिस मामले की बात की जा रही है, उसमें फैसले से उन निदेशकों को बड़ी राहत मिली, जिन्होंने कंपनी द्वारा लिए गए ऋण के लिए जमानत ली थी। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ लफ्जों में कहा कि 'जमानत लेने वाले और मूल रूप से कर्ज लेने वाले के अधिकार और जवाबदेही अलग-अलग होते हैं।'
बैंकों में जो चलन है, उसके मुताबिक वित्तीय निगम जमानत की मांग कर सकते हैं। जमानत कंपनी के निदेशक ले सकते हैं और कर्मचारी भी। इतना ही नहीं, निदेशकों या कर्मचारियों के रिश्तेदार भी जमानत ले सकते हैं। ध्यान देने लायक तो कानून की धारा 29 है। इस धारा में यह कहीं नहीं कहा गया है कि निगम जमानत लेने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकता है। यदि संपत्ति उसके पास रेहन रखी गई है, तब भी वह ऐसा नहीं कर सकता।
निगम अपने अधिकारों का इस्तेमाल केवल उसी पक्ष के खिलाफ कर सकता है, जो कर्ज वापसी से मुकर गया है। ऐसे मामलों में कानून जमानतदारों के बारे में कुछ नहीं कहता। जमानतदारों के खिलाफ कार्यवाही तभी की जा सकती है, जब वे खुद मुकर जाएं।
विशेष कानून में गारंटी यानी जमानत लेने वाले की हिफाजत का यह प्रावधान सुरक्षा के उन उपायों से इतर है, जो वायदे और संपत्ति के हस्तांतरण के कानूनों में उसे दिए गए हैं। न्यायालय ने जोर देकर कहा, 'विधि में कोई और प्रावधान नहीं होने की हालत में कानूनी स्वामित्व वाले किसी भी व्यक्ति को केवल इस आधार पर संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता कि मूल रूप से ऋण लेने वाला उसकी वापसी से मुकर गया।'
न्यायालय ने अदालतों में संपत्ति के अधिकार को मानवाधिकार मानने के अदालती चलन को भी पुख्ता किया, हालांकि इस अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना जाता।सर्वोच्च न्यायालय के हाल ही में आए एक और फैसले में बिल्कुल उल्टा मामला निकला। सीता राम गुप्ता बनाम पंजाब नेशनल बैंक मामले में गारंटी लेने वाला इतना भाग्यशाली नहीं निकला। बैंक ने किसी व्यक्ति को कर्ज दिया था।
कर्जदार की गारंटी लेने वाले ने बैंक को एक चिट्ठी लिखकर अपनी गारंटी खत्म कर दी। उसने तर्क दिया कि अनुबंध कानून की धारा 130 के तहत गारंटी कर्ज लिए जाने से पहले ही खत्म हो गई थी।दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने उसके तर्क को खारिज कर दिया।
गारंटी के समझौते में साफ तौर पर कहा गया था कि गारंटी लगातार चलती रहेगी और किसी भी वजह से उसे रद्द नहीं माना जा सकता। इस मामले में अदालत ने करार में दी गई शर्तों को कानूनी प्रावधानों पर तरजीह दी। इसी आधार पर उसने गारंटी लेने वाले को बीच में ही गारंटी रद्द करने की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया।
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