बिजनेस स्टैंडर्ड - प्राधिकरणों के कामकाज की समीक्षा बेहद जरूरी
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प्राधिकरणों के कामकाज की समीक्षा बेहद जरूरी
किसी भी समस्या के समाधान का सरकारी रास्ता किसी एजेंसी का गठन कर देना या नया कानून बना देना होता है। ये कदम हर बार प्रभावी साबित हों ही, ऐसा जरूरी नहीं है। ऐसे में क्या किया जाना चाहिए, सुझाव दे रही हैं
सुनीता नारायण /  September 28, 2009

अगर व्यवस्था में खोट हो तो उसे क्यों ठीक किया जाए? इस बारे में सरकारी नीति तो यही है कि विस्तृत जानकारी हासिल किए बगैर उस व्यवस्था की जगह नया प्राधिकरण गठित कर दिया जाए।

यह प्राधिकरण का दौर है। प्राधिकरण मतलब एक ऐसी व्यवस्था जो बगैर किसी विभागीय दबाव के काम करे और जो किसी खास प्रक्रिया या व्यक्ति के दबाव में नहीं हो। इसे किसी खास योजना या नियमन के कदमों को लागू करने के लिए गठित किया जाता है। पर मेरा मानना है कि यह समय इस शासन प्रणाली की समीक्षा का है।

एक प्राधिकरण का उदाहरण लेते हैं। इसका गठन तेजी से विकास के मकसद से किया गया था। यह प्राधिकरण है पेट्रोलियम एवं गैस नियामक बोर्ड। दूसरे क्षेत्रों में बोर्ड के काम के बारे में मैं बहुत कुछ नहीं कह सकती। पर हरित विकास के क्षेत्र में इस प्राधिकरण को देशव्यापी सीएनजी नेटवर्क विकसित करना था लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है।

ऐसा हो जाने पर खतरनाक वायु प्रदूषण से शहरों में रहने वाले लोगों को मुक्ति मिलेगी। प्राधिकरण इस काम को अंजाम नहीं दे पा रही है। इसे थोड़ा विस्तार से समझना चाहिए। जब वायु प्रदूषण से निपटने के मकसद से सीएनजी की अवधारणा दिल्ली में आई थी, उस वक्त यह बेहद नई अवधारणा थी।

जब हम लोग सीएनजी के पक्ष में बोल रहे थे तब हमें बताया गया था कि दुनिया में इतने बड़े पैमाने पर कहीं भी बदलाव नहीं हुआ है। इस परियोजना को पटरी से उतारने के लिए कई तरह के आंकड़े दिए गए। बताया गया कि अभी तक की सबसे बड़ी सीएनजी परियोजना अमेरिका के लॉस एंजलिस में लागू की गई है और वहां सिर्फ 800 गाड़ियां ही सीएनजी से चलती हैं।

कहा गया कि दिल्ली में सीएनजी सफल नहीं हो सकती है। इसके बावजूद हमने सीएनजी इस्तेमाल करने की बात को आगे बढ़ाया। क्योंकि हमें पता था कि दिल्ली के वायु प्रदूषण को जल्दी से जल्दी और प्रभावी तरीके से कम करने के लिए सबसे वैज्ञानिक और तकनीकी तौर पर तार्किक कदम सीएनजी ही है।

हालांकि, हमारे हस्तक्षेप से ही डीजल को साफ बनाया गया था लेकिन उस समय भी वह बेहद विषैला था। डीजल को और ज्यादा शुध्द बनाने के बजाए ईंधन को बदलना ही ज्यादा समझदारी वाला फैसला था। हालांकि, डीजल को अभी तक भारत में शुध्द नहीं बनाया गया है और 2010 के अप्रैल शुरू होने वाले यूरो 4 चरण (भारत चरण 4) के शुरू होने से पहले यह काम पूरा नहीं हो पाएगा।

ईंधन के बदलाव से बड़ा फायदा हुआ। उत्सर्जन मानकों के मामले में हम यूरोपीय देशों से 15 साल पीछे थे लेकिन इससे हम उनके बराबर आ पाए। इस बदलाव का अमलीकरण उस वक्त असंभव लग रहा था। गैस संपीड़न और उसके वितरण के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी नहीं थी। वाहन निर्माता इस बात से अनजान थे कि सुरक्षित और क्षमतावान वाहन कैसे तैयार किए जाएं।

इसे एक सफल सीएनजी योजना के तहत ही लागू किया जा सकता था। इसका विरोध वही लोग कर रहे थे जिनके निहित स्वार्थ थे या फिर वैसे लोग थे जिनके पास इस बाबत कोई अनुभव नहीं था। सीएनजी को लागू करना वायु प्रदूषण से निपटने के लिए जरूरी था। उस समय इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था कि लागू करके सीखा जाए और अनुभवों के आधार पर फौरी सुधार किया जाए।

सीएनजी के पक्ष में अभियान चलाने वाले के नाते हमारे पास इसके बारे में विस्तृत और सही-सही जानकारी का होना बेहद जरूरी था। हमारे लिए गैस संपीड़न और गैस वितरण की तकनीक से लेकर वितरण नेटवर्क और अदालत के निर्देशों पर चलने वाले बाजार में मूल्य निर्धारण की जानकारी का होना बेहद जरूरी था। हाल के सालों में दिल्ली के सीएनजी कार्यक्रम से कई फायदे हुए हैं।

वायु प्रदूषण के मोर्चे पर फायदे तो हुए ही, साथ ही साथ प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए प्रयोग हुए और वाहन निर्माताओं ने गाड़ियों में नए सुरक्षा बंदोबस्त किए। बाजार परिपक्व हुआ है और सीएनजी में देश के कई शहरों की बसों का ईंधन बनने की संभावना है। इससे दोहरा फायदा होगा। सार्वजनिक वाहन शुध्द ईंधन से चलेगा और इससे हवा की शुध्दता भी बढ़ेगी।

इस बीच सुधार को आगे ले जाने के लिए सरकार ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड का गठन किया। बहुत अच्छा। पर तेजी से और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ने की बजाए हम पीछे की ओर ही जा रहे हैं। यह खबर सामने आई है कि देश ने बड़े गैस भंडार खोज लिए हैं। ऐसे समय में इस बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि क्या गैस से जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े फायदे हो सकते हैं।

यही वजह है कि पिछले तीन साल में देश के किसी शहर में कोई नई सीएनजी परियोजना नहीं शुरू हुई। इसमें सबसे बुरी बात यह है कि कुछ योजनाओं को पटरी से उतारने की कोशिशें भी होती महसूस हो रही हैं। बोर्ड ने पहला कदम यह उठाया कि उसने मौजूदा एजेंसियों के अधिकार को चुनौती दी।

जिन एजेंसियों को चुनौती मिली उसमें सार्वजनिक क्षेत्र की गैस कंपनियों, दिल्ली सरकार और कर्ज देने वाली संस्थागत एजेंसियों की संयुक्त उद्यम इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड प्रमुख है। कुछ महीने के विवाद और खींचतान के बाद मामला सुलझा लिया गया लेकिन इस वजह से काफी देर हुई।

अभी का मामला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बेहद प्रदूषित शहरों में गैस के वितरण से संबंधित है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली और आसपास के शहरों के बीच हर रोज 12 लाख गाड़ियों की आवाजाही होती है। इस बात को जानने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है कि सार्वजनिक वाहनों को चलाने के लिए हमें स्वच्छ ईंधन की आवश्यकता है।

लंबी वार्ता के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली की सरकारों के बीच परिवहन को लेकर एक समझौता हुआ है। इसके तहत इन राज्यों में इस बात को लेकर सहमति बनी है कि ये सभी राज्य एक-दूसरे की यहां के सार्वजनिक वाहनों को अपने यहां आने की खुली छूट देंगे बशर्ते वे सीएनजी से चलने वाले होने चाहिए।

यह कार्यक्रम अमलीकरण के बेहद करीब है लेकिन इसके राह में भी रोड़े आ गए हैं। इस काम में भी बोर्ड ने प्रतिस्पर्धा और कॉरपोरेट दबदबे की आशंका से आपत्ति जता दी है। अभी यह मामला अदालत में है। समय नष्ट हो रहा है और जन स्वास्थ्य का नुकसान हो रहा है। मेरे मन में यह सवाल है कि क्या हमने प्रभावी निष्पादन, नियमन और विकास के लिए सही तरह की संस्थाओं का गठन किया है? क्या इस व्यवस्था में नियमन सरल है?

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