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अधिकतम खुदरा दाम के खिलाफ रिटेल का गान
मंदी के दौरान तगड़ा नुकसान झेलने वाले भारतीय रिटेलर काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। अब वे चाहते हैं कि एमआरपी समाप्त कर दिया जाए। आखिर ऐसा क्यों, विस्तार से बता रही हैं
शोभना सुब्रमण्यम /  September 25, 2009

पिछले सप्ताह खुदरा कारोबारियों की वार्षिक बैठक इंडियन रिटेलर फोरम का आयोजन किया गया। बैठक के दौरान कारोबारियों का मूड काफी बेहतर था और वे काफी उत्साहित नजर आए।

हालांकि पिछली बैठक के दौरान ऐसा नहीं था। पिछली बार बैठक उस समय हुई थी जब लीमन ब्रदर्स ढहने के कगार पर पहुंच चुका था। साफ है कि खुदरा कारोबारियों का मानना है कि बुरा वक्त बीत चुका है।

उनमें से ज्यादातर ने पिछले दिनों तगड़ा नुकसान झेला है, लेकिन इसके बावजूद वे अपने आप को इस बात के आधार पर दिलासा दिला रहे हैं कि हालात और भी बुरे हो सकते थे। जाहिर तौर पर बैठक के दौरान कई विषयों पर चर्चा हुई लेकिन एक विचार जिस पर दोबारा चर्चा की गई वह एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) को खत्म करने से संबंधित है।

रिलायंस रिटेल के सीईओ (वैल्यू फार्मेट) के राधाकृष्णन का मानना है कि खुदरा विक्रेताओं के लिए एमआरपी खत्म करने का वक्त आ गया है। उनका कहना है कि अगर ऐसा होता है तो इससे पोर्टफोलियो मूल्य निर्धारण की शुरुआत होगी। इसका अर्थ है कि अगर उपभोक्ता किसी उत्पाद के लिए अधिक भुगतान करना चाहता है तो उससे एमआरपी से अधिक मूल्य लिया जा सकता है।

ठीक इसी तरह अगर खरीदारी काफी अधिक मात्रा में की जा रही है तो उनसे कम मूल्य भी लिया जा सकेगा। इसे एक उदाहरण के जरिए समझते हैं। प्योर मैजिक बिस्कुट की कीमत एमआरपी से अधिक की जा सकती है, जबकि टाइगर बिस्कुट की कीमत एमआरपी से कम हो सकती है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि मुश्किल से केवल 20 प्रतिशत ग्राहक ही प्योर मैजिक खरीदते हैं जबकि बाकी 80 प्रतिशत की पसंद टाइगर है। इस तरह पोर्टफोलियो मूल्य निर्धारण के जरिए अधिक संख्या में लोग दुकान में आते हैं।

राधाकृष्णन की दलील है कि अगर फल और सब्जियों पर एमआरपी होता तो वह प्रतिदिन 1,000 टन की खरीद नहीं कर सकते थे, लेकिन कीमतें तय न होने से वह बड़ी मात्रा में इनकी खरीद कर सकते हैं जिससे प्रति किलोग्राम या ग्राम कीमत को कम किया जा सकता है। उनकी इस दलील में कुछ दम तो है। लेकिन जरा देखते हैं कि एमआरपी क्यों है।

जाहिर तौर पर सरकार आम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए एमआरपी लागू करती है। खासतौर से उन लोगों को दुकानदारों की लूट-खसोट से बचाने के लिए जो उनके दाम झेल पाने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन इस सामाजिक-आर्थिक वर्ग द्वारा खरीदी जाने वाली ज्यादातर वस्तुओं का एमआरपी के साथ कोई संबंध नहीं है, क्योंकि वे ज्यादातर कच्चा माल ही खरीदते हैं।

वास्तव में किसी भी उपभोक्ता की खाद्य और परचून बास्केट में आटा, चावल, दाल और चानी जैसे उत्पादों की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी होती है, जिसके लिए दुकानदार जो चाहे वह कीमत वसूल सकता है। और अगर गौर से देखा जाए तो पिछले एक साल के दौरान इन वस्तुओं की कीमत में ही सबसे अधिक इजाफा हुआ है।

तो ऐसे में अगर सरकार वास्तव में समाज के पिछड़े तबके की मदद करना चाहती है तो उसे कच्चे माल और सब्जियों की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी को नियंत्रित करना चाहिए। यह एक ऐसा मोर्चा है जहां सरकार पूरी तरह से असफल नजर आती है। जाहिर तौर पर सरकार को कर संग्रह की चिंता होगी और सच्चाई यह है कि उसे राजस्व का नुकसान हो सकता है लेकिन अर्नेस्ट एंड यंग में पिनाकी रंजन मिस्त्री का मानना है कि यह कोई

ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान नहीं तलाशा जा सकता है। कीमतों की निगरानी के कई तरीके हो सकते हैं, जिनके आधार पर उत्पादन और बिक्री के सही आंकड़े पता किए जा सकते हैं। मिस्त्री का कहना है कि जीएसटी के आने के बाद ऐसा कर पाना और भी आसान हो जाएगा।

तो क्या रिटेलर कीमतों को इतना बढ़ा देंगे कि वस्तुओं को खरीदना ही मुश्किल हो जाए। जवाब है नहीं। कोई भी खुदरा कारोबारी बिक्री को खोना नहीं चाहता है, खासकर अधिक मात्रा वाली वस्तुओं के मामले में, क्योंकि यहां मार्जिन काफी आकर्षक है। इसके अलावा प्रतिस्पर्धी कारोबारी के हाथों वह अपने ग्राहक को खो सकता है।

प्रतिस्पर्धा के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि उपभोक्ताओं से अधिक मूल्य न लिया जाए। प्रत्येक नुक्कड़ पर एक या दो किराने की दुकानें हैं। ऐसे में किसी भी खुदरा कारोबारी के लिए यह संभव नहीं है कि वह अधिक कीमत वसूल सके। सच पूछिए तो कई ऐसी श्रेणियां हैं जहां कारोबारी एमआरपी से कम कीमत पर समान बेचते हैं।

और यह बात बड़े ब्रांडों के मामले में भी सही है। अब वो दिन भी लग गए हैं जब दुकानदार किसी उत्पाद की कमी होने की स्थिति में अधिक कीमत वसूल करता था। आजकल सिर्फ कच्चे माल की किल्लत होती है और दुकानदार कीमतों को बढ़ा देते हैं। ब्रांडों की अधिकता के कारण आज उपभोक्ताओं के पास पर्याप्त विकल्प हैं और संगठित खुदरा कारोबारियों के निजी लेबलों ने बाजार को और भी प्रतिस्पर्धी बना दिया है।

ऐसे में एमआरपी का विचार काफी हद तक अप्रासंगिक हो गया है जबकि पोर्टफोलियो मूल्य निर्धारण के जरिए अधिक लोकप्रिय उत्पादों की कीमतों को घटाने की संभावनाएं भी बनी हुई हैं। ऐसे देश जहां एमआरपी का प्रावधान नहीं है, वहां सुविधा स्टोर वास्तव में कई उत्पादों पर भारी प्रीमियम वसूल करते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि ये वस्तुएं बेहतरीन सुविधाओं के साथ मुहैया कराई जाती हैं।

ये दुकानें काफी समय तक खुली रहती हैं, पड़ोस में होती हैं और आपकी पसंद के मुताबिक उत्पादों को अपने यहां रखती हैं। इस तरह सुविधा स्टोर में किसी उत्पाद की कीमत के मुकाबले हाईपर मार्केट में कीमत 25 से 30 प्रतिशत तक कम होती है। लेकिन सुविधा स्टोर का खर्च भी हाईपर मार्केट के मुकाबले अधिक होता है।

उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं मिलती हैं, इसलिए वह अधिक कीमत चुकाने में किसी तरह की झिझक महसूस नहीं करते हैं। तो अगर खुदरा कारोबारी भारी किराया देकर किसी अच्छी जगह दुकान खोलते हैं, तो उन्हें कीमत निर्धारण के मामले में थोड़ी ढील देने की जरूरत है।

Keyword: togetherness of retail against maximum retail price,
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