बिजनेस स?टैंडर?ड - क्या दूरसंचार क्षेत्र में लाइसेंस फीस बढ़ाना रहेगा ठीक!
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क्या दूरसंचार क्षेत्र में लाइसेंस फीस बढ़ाना रहेगा ठीक!
पैनी नजर
सुनील जैन /  September 20, 2009

हर कोई जानता है कि दूरसंचार देश का सबसे तेज विकास करने वाला क्षेत्र है, लेकिन क्या हमें इसे समाप्त कर देना चाहिए?

यह क्षेत्र अपनी कमाई का औसतन 30 फीसदी सरकार को विभिन्न करों के जरिए देता है और सरकार लाइसेंस शुल्क के तहत राजस्व में हिस्सेदारी के जरिए इसे बढ़ाने की सोच रही है। वह भी भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) से संपर्क किए बिना, जबकि कानूनन ऐसा करना आवश्यक है।

सबसे पहले कर की ऊंची दरों की बात करते हैं। दूरसंचार मंत्रालय का तर्क है कि कंपनियां अपने वॉयस कॉल के राजस्व को डेटा ट्रैफिक के राजस्व के तौर पर दिखा रही है (डेटा पर कोई लाइसेंस शुल्क नहीं लगता), ऐसे में सभी राजस्व पर इकलौता लाइसेंस शुल्क मध्यस्थता को रोकने में कामयाब होगा। सिध्दांत रूप में यह अच्छा विचार है, लेकिन इससे दो मुद्दे उठ खड़े होते हैं।

पहला, प्रस्तावित 8.5 फीसदी के लाइसेंस शुल्क से कई ग्राहकों के शुल्क में बढ़ोतरी हो जाएगी - लंबी दूरी के कॉल और सी कैटिगरी के सर्कल के लिए छह फीसदी की दर, बी कैटिगरी के सर्कल के लिए 8 फीसदी और मेट्रो व ए कैटिगरी के सर्कल के लिए 10 फीसदी की दरें हैं।

ऐसे में ठीक ढंग से सरकार के काम नहीं करने की बदौलत कुछ ग्राहकों को ज्यादा भुगतान करने के लिए क्यों कहा जाएगा? साथ ही लाइसेंस शुल्क (यूएसओ वाला हिस्सा) के तौर पर 26200 करोड़ रुपये इकट्ठा करने वाली सरकार ने ग्रामीण टेलीफोनी पर अब तक 8 हजार करोड़ रुपये भी खर्च नहीं किए हैं।

दूसरा, अपने राजस्व की घोषणा करने वाली कंपनियों की मूल समस्या पर भी यह ध्यान नहीं देती। रिलायंस कम्युनिकेशंस के मामले में कोटक इंस्टीटयूशनल इक्विटी रिसर्च ने जुलाई 2008 में रेखांकित किया था कि आर. कॉम ने ट्राई के सामने जितना राजस्व घोषित किया था वह शेयरधारकों के सामने घोषित रकम से एक चौथाई कम थी। ऐसे में एकल दर हो या कई दरें, सरकार के पास इस बात की जांच करने के लिए अपना तंत्र होना चाहिए कि कंपनियां क्या कह रही हैं।

दूरसंचार मंत्रालय द्वारा स्थापित समिति का कहना है कि यह क्षेत्र जिस गति से रफ्तार पकड़ रहा है उस रफ्तार से लाइसेंस शुल्क के तौर पर मिलने वाले राजस्व में इजाफा नहीं हो रहा। यह बेतुकी बात है। यह साफ नहीं है कि सरकार को कितना राजस्व मिल रहा है।

दूरसंचार विभाग की सालाना रिपोर्ट में लाइसेंस शुल्क के तौर पर मिलने वाला राजस्व 3997 करोड़ रुपये और स्पेक्ट्रम शुल्क के तौर पर 3445 करोड़ रुपये के राजस्व का जिक्र किया गया है। लेकिन ट्राई ने इसे क्रमश: 9650 करोड़ और 3117 करोड़ रुपये बताया है। समिति स्पेक्ट्रम शुल्क के बारे में बात नहीं करती (आम तौर पर राजस्व का 2-4 फीसदी), लेकिन लाइसेंस शुल्क के तौर पर मिलने वाला राजस्व 9476 करोड़ रुपये बताती है।

निश्चित तौर पर जिस भी आंकड़े का इस्तेमाल किया जाएगा, उससे बड़ा बदलाव नजर आएगा। ज्यादातर लोग (समिति में शामिल बुध्दिजीवियों समेत) ग्राहकों की संख्या में होने वाली बढ़ोतरी पर नजर डालते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि राजस्व के साथ क्या हो रहा है।

अगर आप जून 2008 में समाप्त तिमाही से लेकर मार्च 2009 तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि ग्राहकों की संख्या में 32 फीसदी का इजाफा हुआ है, लेकिन राजस्व में सिर्फ 10 फीसदी का। लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल पर लगने वाले शुल्क में 9.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

ऐसे में समस्या कहां है, इस बाबत इंडस्ट्री के कुल स्तर पर बात की जाती है। निश्चित तौर पर अलग-अलग कंपनियों के स्तर पर बड़ी समस्या है, लेकिन सरकारी अंकेक्षण में शायद ही इस पर कोई बात होती हो। 2008-09 में 113011 करोड़ रुपये के राजस्व पर 11.3 फीसदी के कर के हिसाब से 12827 करोड़ रुपये की रकम स्पेक्ट्रम और लाइसेंस शुल्क केतौर पर सामने आती है।

इसमें 3-4 फीसदी विभिन्न सेल्स टैक्स को जोड़ें, 0.5 फीसदी माइक्रोवेव लिंक का टैक्स, 10 फीसदी सेवा कर और ट्रांसमिशन टावर से लेकर अन्य करों को जोड़ दें तो प्रभावी कर की दर करीब 30 फीसदी बैठती है।

दूसरा मुद्दा यह है कि अगर सरकार राजस्व में अपनी हिस्सेदारी और बढ़ाने की इच्छा रखती है तो उसे नई कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले काफी रियायती टैरिफ के ऑफर पर सोचना चाहिए? कुल मिलाकर ये कंपनियां नए ग्राहक बनाएंगी, उनके लाइसेंस की कीमत बढ़ेगी पर सरकार का राजस्व नहीं बढ़ेगा।

इसके बाद ट्राई से संपर्क का मुद्दा आता है। ट्राई के वर्तमान प्रमुख जब टीडीसैट में थे तब उन्होंने दूरसंचार मंत्रालय द्वारा बाजार कीमत के एक हिस्से के बराबर रकम की वसूली पर लाइसेंस देने को क्लीन चिट दे दी थी। आपको लगता होगा कि उस समय मंत्रालय ने ट्राई से संपर्क करने की कोशिश नहीं की होगी कि क्या ऐसे लाइसेंस शुल्क के साथ आगे बढ़ा जाए या नहीं।

कानून स्पष्ट तौर पर कहता है कि ऐसे मामलों में संपर्क अनिवार्य है। मंत्रालय का तर्क है कि ऐसा सिर्फ नए लाइसेंस के लिए आवश्यक है, न कि मौजूदा लाइसेंस के लिए। सेक्शन 11 (ए) (2) पर सरसरी तौर पर नजर डालने से भी साफ हो जाता है कि यह सही नहीं है।

स्पष्ट तौर पर खुद से प्रमुख चुनने वाला मंत्रालय कोई जोखिम मोल नहीं ले रहा - यह ट्राई की उपेक्षा करने की पुरानी परंपरा के हिसाब से है, जब यह मुकदमा दायर करता है और तब इसका इस्तेमाल करता है जब वह मुकदमा दायर करता है (जैसा कि प्रदीप बैजल के तहत हुआ था)।

इस मामले में सभी पक्षकारों की राय से अलग, ट्राई से संपर्क करने पर सरकार उस परेशानी से बच सकती है कि उसके पास (सरकार के पास) लाइसेंस शुल्क के सही आंकड़ों की जानकारी तक नहीं है।

Keyword: Will increasing license fees in telecom sector be fit?,
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