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रक्षा उपकरण : निवेश के अचूक औजार
बाजार नजरिया : सरकार की नई सैन्य नीति से रक्षा उपकरण बनाने वाली भारतीय कंपनियों के फिर सकते हैं दिन
देवांग्शु दत्ता /  September 07, 2009

दूसरा विश्वयुध्द ठीक 70 साल पहले 3 सितंबर 1939 को शुरू हुआ था। इस युध्द के दौरान तकरीबन 5 करोड़ 50 लाख से लेकर 8 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। सबसे कम मौत का आंकड़ा भी वैश्विक जनसंख्या का लगभग तीन प्रतिशत है।

ब्रिटेन, जर्मनी और सोवियत रूस ने अपने जीडीपी का 50 प्रतिशत से अधिक रक्षा के लिए आवंटित किया जबकि अमेरिका ने जीडीपी का एक तिहाई इस हेतु आवंटित किया। अधिकांश सैन्य उपकरणों की डिजाइनिंग और उत्पादन निजी स्तर पर किया जाता था।

प्रमुख शक्तिशाली देश, सोवियत रूस को छोड़ कर, विशिष्टता निर्धारित करने के बाद निविदा के माध्यम से निजी निर्माताओं को सैन्य उकरणों का ऑर्डर देते थे। द्वितीय विश्वयुध्द के दौरान नाभिकीय शक्ति, जेट इंजन, रॉकेट, एंटिबायोटिक्स, कीमोथेरेपी, राडार, ऑटोपायलट इत्यादि की खोज की गई थी।

अमेरिका की हिस्सेदारी 21 वीं सदी के रक्षा खर्च में 40 प्रतिशत से अधिक है जो इसकी जीडीपी का लगभग 5 प्रतिशत है। अमेरिका अभी भी विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में सैन्य शोधों में जुटा हुआ है। वह अभी भी विशेषताएं तय करता है और फिर निजी निर्माताओं को इसकी आपूर्ति करने देता है। कई अन्य देशों में भी निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी रक्षा के मामले में महत्वपूर्ण है।

दुर्भाग्यवश, भारत निजी क्षेत्र को दरकिनार करके चल रहा है। वैसे सैन्य उपकरण जो सरकारी कंपनियों में डिजाइन नहीं किए जा सकते या नहीं बनाए जा सकते, उनका आयात किया जाता  है। रक्षा परियोजनाओं में वक्त के साथ लागत बढ़ रही है। खरीद से जुड़े कई घोटाले सामने आए हैं।

सैन्य उपकरणों की खरीद पर भारत सालाना 55,000 करोड़ रुपये खर्च करता है। लगभग 70 प्रतिशत का आयात किया जाता है और 22 प्रतिशत की खरीदारी सरकारी कंपनियों से की जाती है। लगभग 4,000 छोटी कंपनियां छोटे-मोटे कल-पुर्जों की आपूर्ति करती हैं और इनकी हिस्सेदारी कुल खर्च में लगभग 8 प्रतिशत की है।

26/11 की घटना के बाद गठित होमलैंड सिक्योरिटी क्षेत्र में सरकार साल 2010 से 2015 के बीच 10 अरब डॉलर प्रति वर्ष उपकरणों की खरीद पर खर्च करने वाली है। इनमें कम्युनिकेशन गियर, पुलिस वालों के लिए साजो-सामान, तट पर पहरेदारी करने वाली बोट, राडार आदि शामिल हैं। इनकी खरीद का 70 प्रतिशत हिस्सा घरेलू निजी क्षेत्र से होना है।

एसोचैम के अनुसार, 2012 तक रक्षा खरीदारी 30 अरब डॉलर से अधिक की होगी। इसके अनुसार खरीद में 170 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। होमलैंड सिक्योरिटी की खरीद लगभग 2,00,000 करोड़ रुपये की होगी। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा भारतीय उद्योगों के पास आना चाहिए। यहां भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) की धारणा लागू होगी। बुनियादी ढांचा और अंतरिक्ष के मामलों में पीपीपी का परिणाम बेहतर रहा है।

दूसरी महत्वपूर्ण धारणा ऑफसेट की है। हथियारों का निर्यात करने वाली विदेशी कंपनियों को ऑर्डर की कीमत के 30 प्रतिशत का ऑर्डर भारतीय निर्माताओं को देना होगा। इसका सीधा मतलब है संयुक्त उद्यम और तकनीकों का हस्तांतरण। चालू वित्त वर्ष में 7,500 करोड़ रुपये के ऑफसेट अनुबंध पहले ही किए जा चुके हैं।

ऑफसेट की सबसे बड़ी हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को मिल सकती है। भारतीय रक्षा संयुक्त उद्यम में विदेशी इकाइयों की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत तक हो सकती है। इस क्षेत्र में अच्छे खासे विदेशी निवेश की उम्मीद है। अगर ऑफसेट की वजह से भारतीय रक्षा उद्योग प्रतिस्पर्ध्दी बना तो निर्यात की संभावनाएं भी बन सकती हैं।

कई सूचीबध्द सरकारी कंपनियां जैसे की बीईएल और बीएचईएल रक्षा क्षेत्र की बड़ी खिलाड़ी हो सकती हैं। निजी क्षेत्र में कई कंपनियां पहले ही रक्षा क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी हैं या रक्षा क्षेत्र में उतरने वाली हैं जिनमें लार्सन ऐंड टुब्रो, टाटा ग्रुप, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, भारत फोर्ज, इन्फोटेक एंटरप्राइजेज आदि शामिल हैं।

आईएनएस अरिहंत के निर्माण में लार्सन ऐंड टुब्रो की भी भूमिका रही है। आईएनएस अरिहंत पहली परमाणु पनडुब्बी है। इन्फोटेक एंटरप्राइज दसॉल्ट एयरोस्पेस के साथ संयुक्त उद्यम विकसित करने में जुटी है जो मिराज विमान बनाती है।

छोटे कंपोनेंट की आपूर्तिकर्ता जैसे एस्ट्रा माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स जो माइक्रोवेव राडार के लिए कंपोनेंट बनाती है और एनकोर सॉफ्टवेयर जिसने सेना के लिए साथी कंप्यूटर बनाया है, को भी इससे लाभ होने की संभावना है। निजी कंपनी एमकेयू जो सेना के लिए कवच बनाने के साथ-साथ मानव रहित विमान के उपकरण बनाती है, भी फायदे में आ सकती है।

एक विशाल नया बाजार होने के साथ-साथ रक्षा खर्च अन्य उच्च तकनीक उद्योगों की तुलना में कम चक्रीय है। वित्तीय विश्लेषण में हमारी समस्या यह होगी कि रक्षा संयुक्म उद्यम की संरचना काफी जटिल होती है। हालांकि ऐसी इकाइयों को शेयर बाजार किस नजरिये से लेगा, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है।

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