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दिल्ली तय करेगी दोहा दौर की कामयाबी
दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अब सिर्फ भारत और चीन ही ऐसे देश हैं जिनके हित में उदारवाद और मुक्त व्यापार है। ऐसे में भारत की जिम्मेदारी बढ़ गई है। बता रहे हैं
सुमन बेरी /  September 03, 2009

दोहा व्यापार वार्ता की बहाली के लिए नई दिल्ली में व्यापार मंत्रियों और अधिकारियों की बैठक शुरू हो चुकी है।

बैठक की मेजबानी करने के दौरान भारत के वाणिज्य मंत्री और उनके वरिष्ठ अधिकारी असामान्य रूप से अपने इरादों को लेकर स्पष्ट थे। दोहा व्यापार वार्ता को दोहा विकास चक्र या डीडीआर कहा जाता है।

इससे पहले जुलाई 2008 में हुई अंतिम लघु मंत्रिस्तरीय वार्ता की असफलता के लिए अमेरिका के साथ ही भारत को समान रूप से दोषी माना गया था। उस समय भारत की घरेलू राजनीतिक बाध्यताओं को देखते हुए शायद और कोई नतीजा निकल ही नहीं सकता था।

एक ऐसी सरकार जिसे एक साल के भीतर चुनावों का सामना करना हो और भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के कारण जिस पर देश की विदेश नीति को गिरवी रखने का आरोप लगाया जा रहा हो, उस सरकार के लिए एक सस्ता और प्रभावशाली तरीका यह था कि वह कृषि सब्सिडी के मुद्दो पर सख्त रुख अपनाकर घरेलू राजनीति में बढ़त हासिल करे।

त्वरित प्राधिकरणों की चूक, बुश प्रशासन के दौरान अनिश्चित राजनीतिक  दशाएं, एक छोटे द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते पर अनुमोदन पाने की उसकी अक्षमता के साथ ही कुछ अन्य कारण भी इसके लिए जिम्मेदार थे। इन वजहों को देखते हुए कहा जा सकता है कि दिल्ली के टिप्पणीकारों के बीच पनप रही यह राय कि असफलता के लिए मोटेतौर पर तत्कालीन वाणिज्य मंत्री कमलनाथ का व्यक्तित्व जिम्मेदार था, शायद सही नहीं है।

मौजूदा बैठक के आयोजन के पीछे भारत का एक प्रमुख उद्देश्य अपने बारे में बनी धारणा को सुधारना था। विकसित देशों ने डीडीआर की शुरुआत से ही भारत की भूमिका को हमेशा काम को बिगाड़ने वाला माना है। भारत के नए वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने बदलाव का संकेत देते हुए इस साल जून में बाली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रॉन क्रिक के साथ बैठक की।

यह बैठक उन्होंने नया पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद की। अधिक उच्च राजनीतिक स्तर पर प्रधानमंत्री ने जी-20 के नेताओं की बैठक (नवंबर 2008 और अप्रैल 2009) के साथ ही जी-8  पांच देशों की बैठक (बीते जुलाई को इटली में) में शिरकत की। इन बैठकों के दौरान डीडीआर को अंतिम रूप दिया गया। इसके साथ ही व्यापार मंत्रियों ने दोहा दौर को 2010 तक पूरा करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

यह एक अच्छा कदम है जो यह दर्शाता है कि 2001 को जब डीडीआर की शुरुआत हुई थी, उस वक्त के मुकाबले आज वैश्विक परिदृश्य कितना बदल गया है। वर्ल्ड टे्रड सेंटर और पेंटागन पर हमले के तुरंत बाद इस दौर की शुरुआत हुई थी। इस दौर का उद्देश्य यह संदेश देना था कि आतंकवादी घटनाओं के जरिए दुनिया को एक साथ आने से नहीं रोका जा सकता है।

इससे पहले करीब एक दशक के दौरान अमेरिका ने तेज विकास का दौर देखा था जबकि भारत और चीन सहित एशिया के ज्यादातर देश अभी भी एशियाई वित्तीय संकट से जूझ रहे थे। करीब आठ साल बात हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। पहले चीन और फिर भारत विश्व अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण विकास केंद्र के तौर पर उभर कर सामने आए।

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों में भारत के संगठित निजी क्षेत्र की भागीदारी में तेजी से इजाफा हुआ। इस दौरान उनके विदेश व्यापार और विदेशी निवेश दोनों में बढ़ोतरी हुई। वित्तीय संकट के कारण सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को ही मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि हमने संकट पर विजय हासिल कर ली है, और कुछ क्षेत्रों में अभी भी काफी दबाव बना हुआ है, खासकर निर्यात आधारित उद्योगों में।

लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो भारत का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा है। ऐसे में भारतीय बाजार में प्रवेश करना एक बार फिर मुनाफे का सौदा लगने लगा है। ऐसे हालात में बहुपक्षीय और द्विपक्षीय या क्षेत्रीय वार्ताओं के दौरान भारत का पलड़ा लगातार भारी होता जा रहा है।

हाल के लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी की भारी जीत से भी भारत की स्थिति मजबूत हुई है और इस बात का भरोसा कायम हुआ है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। भारत के सामने अब असल मुद्दा यह है कि वह किस तरह अपनी सबसे बेहतर भूमिका को निभाए।

कुछ लोगों (जैसे आदित्य मिट्टो और अरविंद सुब्रमण्यन) का कहना है कि डब्ल्यूटीओ बातचीत की प्रक्रिया और डीडीआर का विस्तार अब बोझिल और असाध्य हो गया है, और बाजार तक पहुंच का मुद्दा अब वार्ता के एजेंडे का मुख्य मुद्दा नहीं रह गया है, जबकि परंपरागत रूप से व्यापार वार्ताओं के दौरान इस मुद्दे का प्रभुत्व रहा है।

भारत के लिए पूरा मुद्दा अधिक व्यापक है। जैसा कि मैंने अपने पिछले लेखों में दलील दी है, दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अब सिर्फ भारत और चीन ही ऐसे देश हैं जिनके हित में उदारवाद और मुक्त व्यापार है। इन देशों में आज भी बड़ी संख्या में आबादी कृषि पर निर्भर है और उन्हें आधुनिक गतिविधियों में शामिल करने की जरुरत है।

चीन के मुकाबले भारत में अधिक बड़ी और युवा ग्रामीण आबादी है, इसलिए मैं यह दलील देना उचित समझता हूं कि व्यापार प्रणाली का सहयोग करने की भारत के ऊपर काफी अधिक जिम्मेदारी है। इसके अलावा व्यापार एजेंडा अब मोटेतौर पर जी-20 के कार्यक्रमों पर केंद्रित होता जा रहा है, जहां भारत को इस कारण बढ़त हासिल है कि वह वैश्विक असंतुलन के लिए जिम्मेदार नहीं है।

इसके अलावा व्यापक अर्थव्यवस्था तथा वित्तीय क्षेत्र के विवेकपूर्ण प्रबंधन के कारण भी भारत को बढ़त मिली है। ऐसे में व्यापार वार्ताओं के दौरान भारत के सामने दो प्रमुख लक्ष्य हैं। पहला यह कि सदस्यों के साथ मिलकर अमेरिका को एक बार फिर वार्ता में शामिल होने के लिए राजी करे। आर्थिक सुधार के संकेत मिलने के बाद इस दिशा में प्रगति की जा सकती है।

अगले साल अमेरिका में कांग्रेस के चुनाव से पहले इस लक्ष्य को पूरा कर लेना चाहिए। दूसरा, ऐसे वक्त में जब वैश्वीकरण को घक्का लगा है, ऐसे में अपने आप को बात बिगाड़ने वाले के रूप में नहीं बल्कि 'जिम्मेदार वैश्विक संगठक' के तौर पर पेश करना चाहिए।

यद्यपि मौजूदा बैठक कार्यक्रमों, समय सारणी और रूपरेखा के संबंध में है, लेकिन इस बैठक से यह भरोसा जरूर पैदा होना चाहिए कि इस महीने के अंत में पिट्सबर्ग में होने वाली बैठक के दौरान हम प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार कर लेंगे।

(लेखक एनसीएईआर के महानिदेशक हैं और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं। विचार उनके अपने हैं।)

Keyword: Delhi will decide success of Doha phase,
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