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टाटा मोटर्स : कहानी जेएलआर की लागत की
दिशासूचक
शोभना सुब्रमण्यन /  September 01, 2009

जगुआर ऐंड लैंड रोवर (जेएलआर) में आक्रामक तरीके से लागत में कमी के उपाय किए जा रहे हैं जिसमें कर्मचारियों की संख्या करने करने के अलावा वेतन को कम करने जैसा कदम भी शामिल है।

कंपनी बाजार से सस्ते सामानों के विकल्प के ऑफर पर जोर  दे रही है। इन उपायों की वजह से मार्च की तिमाही के मुकाबले जून की तिमाही में कारोबार बेहतर हो गया है। बावजूद इसके जून की तिमाही में 1.12 अरब पाउंड राजस्व की वजह जेएलआर को 6.4 लाख पाउंड का घाटा हुआ।

मार्च की तिमाही का घाटा इस रकम का दोगुना है। मार्केटिंग, कर्मचारियों और कच्चे माल की लागत के कम खर्चों की वजह से उत्पाद में सुधार दिखा। फिलहाल अमेरिका और यूरोप के बाजार में मांग बढ़ना बाकी है। तिमाही के दौरान वाहनों के कारोबार में कमी आई।

दूसरी ओर डीलर के कारोबार में साल दर साल 52 फीसदी तक की गिरावट देखी गई जबकि खुदरा कारोबार में साल दर साल 35 फीसदी तक की गिरावट आई क्योंकि कंपनी ने मांग के साथ अपने उत्पादन को व्यवस्थित किया।

हालांकि उत्साहजनक बात यह है कि थोक कारोबार में 10 फीसदी का इजाफा हुआ और खुदरा कारोबार फ्लैट रहा। इसके अलावा भंडार में भी कमी थी। दूसरी खुशी की बात यह है कि जेएलआर ने 10 करोड़ पाउंड बैंक वित्त का प्रबंधन कर लिया है और इसे 34 करोड़ पाउंड और भी जुटाने हैं।

इस तरह के समझदारी भरे कदम से लागत में बचत हुई और विश्लेषकों को ऐसी उम्मीद है कि जेएलआर 2010-11 में ब्रेक इवन खत्म हो जाएगा। इसके साथ घाटा भी इस साल 20 करोड़ पाउंड हो सकता है जो 2008-09 में 30.7 करोड़ पाउंड था। कंपनी का कुल कर्ज 21,000 करोड़ रुपये रहा।

टाटा मोटर्स ने अपने बैलेंस शीट का फायदा उठाते हुए अपनी सहयोगी कंपनी के साथ ही समूह कंपनी की हिस्सेदारी को बेचने की योजना बना रही है। पिछली तिमाही में टाटा स्टील के शेयरों की बिक्री से इसे 320 करोड़ रुपये मिले।

घरेलू बाजार में व्यावसायिक वाहनों की मांग बढ़ रही है और मौजूदा साल में टाटा मोटर्स की बिक्री करीब 71,000 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है। हालांकि जेएलआर का कारोबार अब भी मंदा है और इससे मामूली घाटा हो सकता है।

टाटा पावर : कोयले की तपिश

जून की तिमाही में टाटा पावर का मुनाफा कोयले और ऊर्जा के कारोबार से कम या ज्यादा प्रभावित रहा। साल दर साल 22 फीसदी की दर से एबिटा मार्जिन में 5 फीसदी का इजाफा हुआ।

साल दर साल एबिटा 41 फीसदी बढ़कर 962 करोड़ रुपये हो गया। मुनाफे में 93 फीसदी का उछाल आई और 358 करोड़ रुपये हो गया। इसमें पहले की अवधि की आय और विदेशी मुद्रा से होने वाला मुनाफा शामिल है।

मुनाफे से पहले के कर में 38 फीसदी तक की उछाल आई और यह 358 करोड़ रुपये हो गया। कोयले के कारोबार से मिलने वाले राजस्व में 14 फीसदी साल दर साल बढ़ोतरी हुई और कारोबार की मार्जिन में 3 फीसदी तक का विस्तार हुआ। कोयले की कीमतें अब नीचे से ऊपर की ओर आ रही हैं। वहीं बूमी कोल माइंस की प्राप्तियां जिसमें टाटा पावर की 30 फीसदी हिस्सेदारी थी, इसे भी स्थायी होना चाहिए।

अगर कोयले से 60 डॉलर प्रति की कमाई होती है तो खदान काफी मुनाफे में रहेंगे। इसके अलावा लंबे समय तक के लिए औसत बिकवाली की कीमत 50 डॉलर प्रति टन है और इससे टाटा पॉवर को लगभग 75 करोड़ डॉलर कर्ज का फिर से भुगतान करने सक्षम होना चाहिए। इसे आमतौर पर खदान में हिस्सेदारी को बेचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

ज्यादातर रकम वर्ष 2014-15 में ही मिलेगा और उस वक्त तक मुंद्रा संयत्र में नकदी का प्रवाह बने रहना चाहिए। उद्योग पर निगाह रखने वालों का ऐसा अनुमान है कि मौजूदा साल में कोयले की प्राप्तियां 65 डॉलर प्रति टन है।

इसी बीच टाटा पावर ने हाल ही में जीडीआर के जरिये 1,090 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से लगभग 1,650 करोड़ रुपये की उगाही की है। अगले तीन सालों तक प्रोजेक्ट को फंड देने के लिए 3,000 करोड़ रुपये इक्विटी की जरूरत होगी।

बैलेंस शीट को मजबूत करने के अलावा इसकी 1,800 मेगावॉट क्षमता के परिचालन में भी तेजी आनी चाहिए। वहीं 4,000 मेगावॉट मुंद्रा यूएमपीपी बेहतर स्थिति में है और इसका पहला 800 मेगावॉट यूनिट की शुरुआत सितंबर 2011 में हुआ।

टाटा पावर की बिक्री के छोटे हिस्से में लगभग 5 फीसदी के करीब व्यापारिक बिक्री शामिल है और इसे बढ़ना चाहिए। जून की तिमाही में व्यापारिक बिक्री से लगभग 5-6 लाख रुपये प्रति केडब्ल्यूएच है। कंपनी की योजना 2014 तक 2785 मेगावॉ के मुकाबले 13,000 मेगावाट तक करने की है। विश्लेषक 1400 रुपये प्रति शेयर को स्टॉक के मूल्यांकन के तौर देखते हैं।

Keyword: Tata Motors : Story of JLR's cost,
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