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काबुल की नई कहानी
काबुल में शीतयुध्द की खामोश निशानियों और दहशत के बीच ज्योति मल्होत्रा के अनुभव।
ज्योति मल्होत्रा /  August 28, 2009

काबुल के बाग-ए-बाबर में जीवन की एक झलक दिखाई देती है। बाग के बीचोंबीच एक नहर है जिसमें जल का अनवरत प्रवाह हो रहा है। पास में ही बाबर का मकबरा है, जहां पर गोलियों के निशान 15 साल पहले हुए गृह युध्द की याद ताजा कराते हैं।

यह नहर इस बाग को दो हिस्सों में बांटती है, एक तरफ का हिस्सा परिवारों के लिए है और दूसरा सिर्फ युवा पुरुषों के लिए। इनमें से कुछ सलवार सूट पहने बाबर की कब्र के बाहर ही घूमते हुए अपना वक्त बिताते हैं।

वहीं दूसरी तरफ दरियों पर बैठे परिवारों के लिए हरी-हरी घास के ये बाग पिकनिक की जगह है। घूमती-फिरती काबुली महिलाएं बेशक काले हिजाब को ओढ़े रहती हैं, बावजूद इसके उनके चेहरे आसानी से पहचाने जा सकते हैं। यहां के नजारे देखते हुए एकदम से मेरी नजर एक युवा जोड़े पर पड़ी, जो बीच में चल रहा था।

इनके हाथ एक-दूसरे के हाथ में तो कतई नहीं थे, लेकिन एक दूसरे से सिर्फ कुछ इंच की दूरी पर ये चले जा रहे थे। शायद काबुल पूरी दुनिया में सबसे खतरनाक जगहों में शामिल हो, लेकिन रोजाना होने वाले बम धमाकों, अपहरणों तथा तालिबान और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बलों के बीच दोबारा छिड़ी जंग के बावजूद यहां नई शुरुआत का आभास होता है।

शहर के नए हवाई अड्डे का निर्माण जापानियों ने किया है, शहर-ए-नौ (नया शहर) में होटल साफी लैंडमार्क का कॉफी बार, युवक-युवतियों से भरा रहता है (मानना पड़ेगा कि ज्यादातर पुरुष) और इसके अलावा शहर में एक बार भी है जो सिर्फ विदेशियों को शराब पेश करता है वह भी स्टार-स्पैंगल्ड स्काई के टुकड़े के साथ।

लेबनानी कामिल के पास विदेशी सैलानियों को शराब पेश करने वाले पांच बार में से एक टावेर्ना है। वह काबुल में पांच साल से हैं और नई दिल्ली में भी कारोबारी मौकों की तलाश में हैं। उन्होंने इस जगह की सुरक्षा और खतरे से जुड़े सभी सवालों की धूल को छांटते हुए कहा, 'मैं बगदाद से आया हूं।' इसके साथ ही उन्होंने एक नया शब्द जोड़ा- 'टेरर-टूरिज्म'।

अफगानिस्तान किसी बॉलीवुड फिल्म की तरह है, जिसकी कहानी टेढ़ी-मेढ़ी चलती है। यहां यह भी तय करना काफी मुश्किल है कि कौन अच्छा है और कौन बुरा। आज का तालिबान, जिसमें ज्यादातर पख्तून हैं, रवींद्र नाथ ठाकुर की लघु कहानी 'काबुलीवाला' के नायक जैसे ही हैं।

जहां पूरा देश लगातार विस्फोटों से हिल रहा है और लोगों की हत्या और अपहरण (काबुल में हर दूसरे-तीसरे रोज) हो रहे हैं, वहां यह जानकर हैरत होती है कि अफगानी समझते हैं कि आखिर क्यों तालिबान की संख्या बढ़ रही है।

एक अफगानी अधिकारी का कहना है, 'ज्यादातर अफगानी तालिबान में इसलिए शामिल हो गए, क्योंकि उनके परिवार या दोस्त अंतरराष्ट्रीय बलों की ओर से हो रहे हवाई हमलों में खत्म हो गए और अब वे बदला लेना चाहते हैं।'

दक्षिणी प्रातों कंधार, ओरुजगन और पक्तिका की तरफ इशारा करते हुए उनका कहना है कि गेंहू या बाजरे की फसल को अफीम की फसलों ने निगल लिया है। क्योंकि तालिबान उन्हें सरकार के मुकाबले काफी अधिक वेतन (अगर सरकार एक दिन के लिए 2 डॉलर देती है तो तालिबान 6 डॉलर और नशीले पदार्थ बनाने वाले 12 डॉलर) देते हैं।

दूसरे राष्ट्रपति चुनावों की उम्मीद में, हर तरफ ऊंचे-ऊंचे दांव लगाए जा रहे हैं। जब अमेरिका ने नवंबर 2001 में तालिबान को बेदखल कर दिया था, तब से अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक नए देश के निर्माण की उम्मीद लगाए हुए अफगानिस्तान पर पैसे की बारिश कर रहा है (कुछ अनुमानों के मुताबिक 500 अरब डॉलर से अधिक)।

बेशक इसके विपक्ष में भी तर्क दिए जाते हैं कि अमेरिकियों ने बमुश्किल ही अफगानिस्तान को सहायता दी है, इसके बजाए वे इराक पर अपना ज्यादातर पैसा लगा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सलाहकारों के जरिये सहायता राशि आने का नतीजा यह है कि कुल राशि के बेहद छोटे हिस्से, 5 अरब डॉलर से भी कम, को अफगानियों ने इस्तेमाल किया है।

इन आंकड़ों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या सैकड़ों सलाहकार अपनी बातों पर अमल कर रहे हैं? दिसंबर 2001 में हुए बॉन करार के तहत दुनिया ने अफगानिस्तान के सबसे गंभीर मुद्दों की जिम्मेदारी ली थी जिसके तहत अमेरिका को सेना को प्रशिक्षित करना था और जर्मनी को पुलिस को।

इसी तरह जापान को अनधिकृत हथियारों को इकट्ठा करना था और इटली को न्यायपालिका को प्रशिक्षण देना था। लेकिन सच तो यह है कि दुनिया की ताकतें काबुल में एक दूसरे पर नजर बनाए रखने का काम कर रही हैं। कोई किसी पर विश्वास नहीं करता, यहां कोई हमेशा के लिए दोस्त या दुश्मन नहीं है, अगर वे यहां हैं तो सिर्फ अपने-अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए।

हिंदुकुश से आने वाली ठंडी हवाएं और सुर्ख लाल शहतूत की खुशबू के बीच आसानी से भारत में गंगा के मैदानों की तपती धूप और धूल को भुलाया जा सकता है और तबाह हुए शहर में एक नए महाखेल के पत्तों को खुलते हुए देख सकते हैं। सबसे बढ़िया राजनयिकों को यहां भेजा गया है और ठीक ऐसे ही हैं उनके सलाहकार।

इस नाटक के मुख्य कलाकार जो सैकड़ों साल साल से जीवित हैं और पहाड़ों और एशिया के बीच में पठारों में अब भी खेल रहे हैं, इनमें अमेरिकियों से लेकर पाकिस्तानी और यूरोपीय और रूसी से लेकर भारतीय शामिल हैं। ज्यादातर अफगानियों का मानना है कि अमेरिका और नाटो बलों को यहां इतना नापसंद किया जाता है कि उन्हें बीते हुए समय में ही यह जगह छोड़ देनी चाहिए थी।

अफगानियों का पाकिस्तानियों से खट्टा-मीठा रिश्ता है, वह इसलिए कि वे मानते हैं कि पाकिस्तान ने तालिबान को बनाने में मदद की है, पर साथ ही पाकिस्तान कई साल से 30 लाख अफगान शरणार्थियों को छत भी दे रहा है।

भारत को अफगान के राष्ट्रीय नायक अहमद शाह मसूद का दोस्त माना जाता है, जिसे 9/11 से ठीक दो दिन पहले अल-कायदा के दो आदमियों ने मोरक्को पत्रकारों का वेश धर कर मार दिया था, भारत के लिहाज से बॉलीवुड और युध्द के बाद सड़क निर्माण, बिजली ट्रांसमिशन लाइनों, नदी बांध चलाने, स्कूल और सेवा (सीईडब्ल्यूए) प्रशिक्षण सभी काफी लोकप्रिय हैं।

सच तो यह है कि हिंदी फिल्में और भारतीय टेलीविजन धारावाहिक कट्टरपंथियों के खिलाफा अफगानियों के तरकश में नए तीर बन गए हैं। कई अफगानी हिंदी और उर्दू काफी आसानी से बोल लेते हैं। हिंदी इसलिए क्योंकि बॉलीवुड फिल्में रिलीज होने के साथ ही बाजार में रौनक आ जाती है और उर्दू-पाकिस्तान के साथ अंतरंग रिश्तों की वजह से।

काबुल में कुछ लोगों को हैरत हुई जब संयुक्त राष्ट्र ने खरा-खरा बोलने वाली अभिनेत्री शबाना आजमी को हाल में ही महिलाओं के साथ गलत व्यवहार के खिलाफ रिपोर्ट लॉन्च कराने और उनके अभियान 'साइलेंस इज वायलेंस' का प्रचार कराने के लिए आमंत्रित किया।

करजई सरकार ने स्त्री-पुरुष समानता को लेकर अपनी तरफ से कोशिशें की हैं, जिनमें संसद में महिलाओं को अनिवार्य रूप से 27 प्रतिशत कोटा देना शामिल है (इनमें फरहा प्रांत से मललई जोया, जिनकी सार्वजनिक निंदा की गई, को भी निर्वाचित किया गया)। हालांकि कुछ का मानना है कि यह नाकाफी है।

सच तो यह है कि अफगानिस्तान में पुरुषों को चार बीवियां रखने की मंजूरी है और देश में बेहद उन्नतिशील महिलाओं को भी आदमियों की गलत नजरों को मजबूरन अपनाना पड़ता है, जिसमें उनके खुद के शौहर शामिल होते हैं।

अफगानिस्तान में शायद वह बचपन अब भी मौजूद है, जिसने 19 साल की शिंकाई स्तेनेक्जई को इस साल 2000 डॉलर का अफगान कंटेम्परेरी प्राइज जिता दिया। 'फोर्टी वुमन' में उनकी यह शानदार जीत अफगान के पुराण में 40 वशीभूत करने वाली महिलाओं की कहानियों को आधुनिक युग जोड़ती दिखती है, जिनमें पश्तो और दारी दोनों शामिल हैं।

शिंकाई का कहना है, 'मैं यह दिखाना चाहती हूं कि आज भी अफगानिस्तान में महिलाओं की हत्या उनके माता-पिता, भाइयों या शौहरों या किसी और के हाथों से होती है।' शिंकाई ने काली टयूनिक और तंग पैंट तो पहनी हुई है, पर अपनी आंखों को छोड़ कर अपना पूरा चेहरा काले स्कार्फ से ढका हुआ है। उनका कहना है, 'चीजें इतनी नहीं बदल पाई हैं।'

वर्ष 2004 में राहरौ उमरजाद ने अपनी एक निजी कला अकादमी खोली थी। उनका मानना है कि अब तक के लिए इतना काफी है कि अफगानी युवाओं ने पेंट करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है, 'कई दशकों बाद, वे बाकी की दुनिया के साथ संपर्क में वापस आ रहे हैं।'

माहौल सामान्य होने की यह भावना काबुल में जीवन के चक्र को पूरा कर देती है: जिंदगी सिर्फ एक रॉकेट हमले भर की दूरी पर है, लेकिन तब तक, जिंदगी अनिश्चित और खूबसूरत दोनों ही है।

Keyword: New Story of Kabul,
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