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दोहा दौर की ताजा प्रगति
संपादकीय /  August 27, 2009

भारत अगले सप्ताह विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख सदस्यों की 'अनौपचारिक मंत्रिस्तरीय' वार्ता की मेजबानी करेगा। इस दौरान दोहा दौर की व्यापार वार्ता में जारी गतिरोध को दूर करने के लिए ताजा कोशिश की जाएगी।

पिछले साल के मुकाबले थोड़ी प्रगति हुई है, लेकिन अब कुछ प्रमुख मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए एक सम्मिलित प्रयास की जरूरत है। डब्ल्यूटीओ में विभिन्न वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों के समूह नई दिल्ली में मौजूद रहेंगे।

बैठक को इस तरह तैयार किया गया है कि भागीदार तैयार बयानों से परे जाकर चर्चा कर सकेंगे। जबकि इन बयानों में दोहा दौर की वार्ता की सफलता के लिए प्रतिबद्धता जताने और राष्ट्रों की स्थिति से अवगत कराने के अलावा कुछ नहीं कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो भागीदार इस बात के संकेत देंगे कि वे क्या, कहां और कितना दे सकते हैं। अगर भागीदार वार्ता को फिर से बहाल करने के लिए पर्याप्त ताजा जमीन तैयार कर पाते हैं तो वार्ता को सफल कहा जा सकता है। लेकिन, व्यापार वार्ताएं काफी कूटनीतिक होती हैं कि अगर सब कुछ ठीक चलता रहा तो भी 2010 के अंत से पहले कोई नया बहुपक्षीय व्यापार समझौता नहीं हो सकता है।

पिछले साल कई देशों ने भारत को अवरोध पैदा करने वाले खलनायकों में से एक माना था। एक नए वाणिज्य मंत्री के आने के बाद पिछले तीन महीनों के दौरान अमेरिका सहित कुछ बड़े कारोबारी राष्ट्रों के साथ एक बार फिर भरोसा बहाली की कोशिश तेज की गई है। इस दौरान कुछ ऐसे बयान भी जारी किए गए ताकि सभी को भारत के रुख के बारे में पता चल सके।

दक्षिण कोरिया और दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संघ (आसियान) के साथ जिस तेजी के साथ द्विपक्षीय व्यापार वार्ता पूरी की गई और समझौते किए गए उससे कारोबारी वार्ताओं के दौरान भारत की विश्वसनीयता बढ़ी है। हालांकि वार्ता का मतलब सौदेबाजी होता है, और देश को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वार्ता के दौरान उसे क्या मिल रहा है।

भारत के ऊपर 'बाध्य' दरों और वास्तविक तटकर दरों में भारी अंतर को कम करने का दबाव है। डब्ल्यूटीओ की पिछली वार्ताओं के दौरान इसके लिए प्रतिबद्धता जताई गई थी। प्रमुख औद्योगिक समूहों को तत्काल वार्ता की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए ताकि तय किया जा सके कि सौदेबाजी की प्रक्रिया के दौरान किस से कितना लेनदेन किया जा सकता है।

आमतौर पर माना जा रहा है कि यूरोपीय संघ दोहा दौर की वार्ता को समाप्त करना चाहता है, क्योंकि उसकी बहुवर्षीय बजटीय प्रक्रिया ने पहले ही महाद्वीप के साझा कृषि कार्यक्रम और सब्सिडी को घटाने के लिए समय सीमा तय कर दी है। ऐसे में अगर यूरोपीय संघ चाहता है कि आंतरिक अनिवार्य सब्सिडी कटौती दूसरे प्रमुख कारोबार समूहों द्वारा दी जा रही छूट के अनुरूप हो तो ऐसा करने के लिए उसके पास वक्त नहीं है।

एक डेमोक्रैटिक राष्ट्रपति लेकिन कम आक्रामक व्यापार प्रतिनिधियों के साथ अमेरिका अगर असफल दौर में एक हारा हुआ पक्षकार नहीं बनना चाहता है तो उसे काफी कुछ करना होगा। यह भी देखना होगा कि आवश्यक छूट कहां से मिलती हैं। इस बीच आस्टे्रलियाई व्यापार मंत्री ने कहा है कि वार्ता के दौरान आक्रामक रणनीति से इनकार नहीं किया जा सकता है।

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