बिजनेस स्टैंडर्ड - 'अगरिया' पर रोजी-रोटी का संकट
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'अगरिया' पर रोजी-रोटी का संकट
मौलिक पाठक /  August 21, 2009

गुजरात में 45,000 से अधिक नमक मजदूरों, जिन्हें अगरिया भी कहा जाता है, की रोजी-रोटी पर संकट पैदा हो गया है।

कच्छ के छोटा रन में जंगली जानवरों के लिए एक अभयारण्य बनाए जाने की बात कही जा रही है जिससे इन लोगों के भविष्य पर खतरा मंडरा गया है। इन मजदूरों ने अपने इस 'पारंपरिक अधिकार' की रक्षा के लिए सेटलमेंट ऑफिसर (एडीशनल कलेक्टर) से भी गुहार लगाई थी, लेकिन उनके इस अधिकार को खारिज कर दिया गया है।

सेटलमेंट ऑफिसर की एक रिपोर्ट के मुताबिक नमक मजदूरों के 2398 दावों की जांच की गई जिनमें से 397 को मंजूरी दे दी गई है। छोटा रन में छोटे और सीमांत नमक मजदूर देश के कुल नमक उत्पादन में 30 फीसदी का योगदान करते हैं। गुजरात सालाना लगभग 150 लाख टन नमक का उत्पादन करता है जो देश के कुल उत्पादन का लगभग 70 फीसदी है।

अगरिया हितरक्षक संघ नामक व्यापार यूनियन द्वारा दायर किए गए सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन के जवाब में इंडस्ट्रीज कमिश्नर ने कहा है कि कच्छ के छोटा रन में लगभग 48 हजार नमक मजदूर हैं।

लगभग 5000 वर्ग किलोमीटर के दायरे वाले और पाटन, सुरेन्द्रनगर, राजकोट और कच्छ जिले में फैले कच्छ के छोटा रन को 1973 में वाइल्ड बर्ड ऐंड वाइल्ड एनिमल प्रोटेक्शन ऐक्ट के तहत राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया और इस ऐक्ट को बाद में 2004 में समाप्त कर दिया गया।

अजीतगढ़ के एक नमक मजदूर भरत देवीसिंह पटादिया ने कहा, 'हालांकि अब तक हमें अभयारण्य इलाके से बाहर नहीं किया गया है, लेकिन अधिकारियों ने हमसे अपनी मर्जी से चले जाने को कहा है।' इसके अलावा पिछले कई वर्षों से नमक मजदूरों के लीज को भी नवीकृत नहीं किया गया है।

सुरेन्द्रनगर जिले में हिम्मतपुरा के एक नमक मजदूर ठक्करसिंह धरमसिंह महालिया कहते हैं, 'इस इलाके में लगभग 10-12 हजार परिवार या 40,000 नमक मजदूर हैं। प्रत्येक परिवार एक क्यारी से हर साल औसतन रूप से 500-600 टन नमक उत्पादित कर सकता है।

'अगरियाज' 300-400 वर्षों से भी अधिक समय से नमक की खेती से जुड़े रहे हैं। समुद्र के किनारे खेतों में क्यारी बना कर नमक उत्पादित करना दशकों से इनकी रोजी-रोटी का जरिया रहा है।' उन्होंने कहा कि अब हम रोजी-रोटी के लिए कहां जा सकते हैं?

नमक की खेती का सत्र सितंबर से जून तक चलता है। इस दौरान लगभग 10,000 अगरिया परिवार रोजी-रोटी की तलाश में रेगिस्तान में तीन किलोमीटर तक पैदल निकल पड़ते हैं। एक श्रमिक लगभग 140 रुपये प्रति टन की कमाई करता है।

कुदा अगर कामदार महामंडल के सदस्य जीतू जाला ने कहा, 'सरकार ने पिछले 10 वर्षों से नमक मजदूरों के लीज को रिन्यू करना या नया लीज जारी करना बंद कर दिया है। उसके बाद से कुछ कंपनियां छोटा रन में श्रमिकों से सीधे तौर पर नमक की खरीद नहीं कर सकती हैं। वे व्यापारियों और ठेकेदारों के जरिये नमक खरीदती हैं।'

एक अन्य श्रमिक ने बताया कि सरकार ने कुछ बड़ी कंपनियों के साथ लंबे समय के लिए समझौता किया है, क्योंकि इन कंपनियों की गतिविधि अवैध नहीं समझी जाती है। अगरिया समुदाय के नेता भीमानी जरेसा के मुताबिक, 'हालांकि मोबाइल राशन दुकान और टैंकरों के जरिये पेयजल आपूर्ति जैसे कुछ उपायों की पहल की गई है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। हमारी मांग है कि सरकार हमारे द्वारा उत्पादित नमक के लिए उसी तर्ज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करना चाहिए जैसा कि कृषिगत उत्पादों के लिए किसानों को दिया जाता है।'

Keyword: Hazardous of earn-eat on 'Agria',
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