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किसानों के लिए जटिल है भूमि अधिग्रहण कानून
अनसुनी आवाज
श्रीलता मेनन /  August 17, 2009

भारत में मौलिक अधिकारों की संख्या में इजाफा हो रहा है। देश के नागरिकों को मूल रूप से सात मौलिक अधिकार मिले हुए थे, पर इसमें दो अधिकार और जोड़े गए हैं।

पहला है काम और शिक्षा का अधिकार, जो मिल चुका है जबकि दूसरा खाद्य सुरक्षा के अधिकार का इंतजार है। लेकिन क्या इसके कोई मायने हैं? दूसरा अधिकार शायद सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

विभिन्न मकसदों के लिए किया जाने वाला जमीन अधिग्रहण एक चुनौती है, अगर इस अधिकार को वास्तविकता में बदलना है तो इससे निबटने का इंतजाम करना होगा। अन्यथा दोगुना आयात बिल के भुगतान के जरिए गरीबों को सब्सिडी वाला अनाज मुहैया कराना होगा और इसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

भूमि अधिग्रहण कानून के सेक्शन-55 का नियम-4 कहता है कि कंपनी के नियम तिनके की तरह हैं जिससे कई किसान नासमझ सौदों से अपनी उपजाऊ जमीन बचाना चाहते हैं क्योंकि यह वैसी वैकल्पिक जमीन की मौजूदगी को नकारता है जो कृषि के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय अगले हफ्ते एक ऐसे मामले की सुनवाई करेगा जिसका खाद्य सुरक्षा के अधिकार से महत्त्वपूर्ण संबंध है। पूरन सिंह और 400 किसानों ने उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ याचिका दाखिल की है। याचिका के माध्यम से अनिल अंबानी घराने द्वारा दादरी में गैस आधारित बिजली संयंत्र लगाने के लिए 2500 एकड़ जमीन अधिग्रहीत करने को चुनौती दी गई है।

जनवरी 2008 में इस अधिग्रहण पर रोक लगी थी और नियम-4 के तहत ही यह काम हुआ था। नियम-4 कहता है कि अगर कोई कंपनी सार्वजनिक मकसद के लिए भी खेती की जमीन का अधिग्रहण करती है तो हर सरकार के लिए यह बाध्यकारी है कि वह उस जमीन की उर्वरता की जांच करे।

इस मामले में कहा गया था यह सार्वजनिक मकसद के लिए है क्योंकि यह बिजली संयंत्र का मामला है। लेकिन जमीन अधिग्रहण के समझौते पर फरवरी 2004 में मुलायम सिंह सरकार और रिलायंस पावर ने हस्ताक्षर किए थे और कहा गया था कि बिजली संयंत्र के जरिए 3250 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होगा।

यह निवेदन कंपनी द्वारा और कंपनी के लिए किया गया था जो कि पूरी लागत वहन करेगी। बाद में सरकार ने जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी कर दी थी। याचिका दाखिल करने वाले लोगों ने तर्क दिया है कि अगर यह परियोजना सार्वजनिक मकसद के लिए स्थापित की जा रही थी तो फिर इसमें समझौते की दरकार ही नहीं थी।

और अगर कंपनी के साथ हुआ यह समझौता नियम-4 के तहत हुआ है तो फिर जांच अवश्य की जानी चाहिए थी। यह कंपनी को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वह सीधे किसानों के साथ बातचीत करे। यह जमीन दोआब इलाके में है जहां दो नदियां गंगा व यमुना मिलती है और इस जमीन को काफी उपजाऊ माना जाता है।

आज के दौर में अंबानी बंधुओं के बीच उस संयंत्र में इस्तेमाल की जाने वाली गैस की खातिर लड़ाई हो रही है जिसकेलिए कानूनी तौर पर अब तक न तो जमीन मिली है और न ही इसका अधिग्रहण हुआ है। अक्टूबर 2007 के एक मामले देवेंद्र सिंह बनाम पंजाब राज्य की मिसाल के आधार पर यह मामला चलेगा जिसमें नियम-4 के तहत जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगा दी गई थी।

सिंगुर में खेती की 1000 एकड़ उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन विरोध के चलते टाटा को वापस जाना पड़ा, पर आज भी यह जमीन किसानों को वापस नहीं मिली है। सिंगुर में किसानों को जमीन वापस दिलवाने के लिए चल रहे आंदोलन की अगुआई कर रही अनुराधा तलवार का कहना है कि उच्च न्यायालय ने नियम-4 के तहत जांच की मांग को खारिज कर दिया है।

उच्चतम न्यायालय में यह मामला फिलहाल लंबित पड़ा हुआ है जहां किसानों ने नियम-4 को लागू करने की मांग की है। डाबरी के मामले में याचिका दाखिल करने वाले लोगों  का कहना है कि सोनभद्र में 1000 मेगावाट वाला गैस आधारित पावर प्लांट लगाने के लिए टाटा ने 110 एकड़ जमीन के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसी सरकार ने टाटा को जमीन देने से इनकार कर दिया जिसने रिलायंस पावर के 3250 मेगावाट के प्लांट के लिए 2500 एकड़ जमीन देने के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए।

कानून खुद भी हमेशा अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाता। वह सिंगुर के किसानों की मदद नहीं कर पाया, लेकिन संभवत: वह डाबरी के किसानों की सहायता कर रहा है। उत्तर प्रदेश में सत्ता बदलने की वजह से यह अंतर देखने को मिल रहा है। इसी वजह से भूमि अधिग्रहण कानून या इसका नियम-4 किसानों के लिए अस्पष्ट है।

Keyword: land acquistion act is hard for farmers,
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