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एंकर निवेशकों की जरूरत है एक्सचेंजों को
सवाल-जवाब : आर एच पाटिल, अध्यक्ष, क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया
राजेश भयानी /  July 28, 2009

भारतीय एक्सचेंज उद्योग में सबसे पुराने और समूह में सबसे वरिष्ठ आर एच पाटिल, जिन्हें ऋण बाजार विकसित करने वाली समिति के अध्यक्ष के रूप में किए गए यादगार कामों के लिए जाना जाता है,  एक्सचेंजों में एंकर निवेशकों की उपस्थिति के पक्षधर हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि जिस उद्देश्य के साथ नैशनल स्टॉक एक्सचेंज स्थापित किया गया था उसकी पूरी तरह प्राप्ति नहीं हो पाई है क्योंकि एक्सचेंज इक्विटी बाजार को अर्ध्द शहरी और ग्रामीण भारत के मध्यवर्गीय निवेशकों तक पहुंचाने में पूरी तरह सक्षम नहीं रहा है।

राजेश भयानी को दिए साक्षात्कार में डॉ. आर एच पाटिल, जो क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं, ने कहा कि उनका संस्थान गारंटी के साथ फॉरेक्स फॉरवर्ड सौदे शुरू करेगा।

नैशनल स्टॉक एक्सचेंज स्थापित करने के साथ ही भारतीय स्टॉक एक्सचेंज उद्योग में बदलाव का श्रेय आपको गया है। लगभग डेढ़ दशक बाद अभी कारोबार कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित हैं। क्या बढ़ती प्रतिस्पर्धा से इक्विटी कारोबार के विस्तार में मदद मिलेगी?

लेन-देन की लागत कम रखने से निवेशकों को बाजार की तरफ आकर्षित किया जा सकता है। इस उद्देश्य को पूरा कर लिया गया है लेकिन इन दिनों भारतीय शेयर बाजार विदेशी सटोरिये निवेशकों की ज्यादा संख्या, खास तौर से हेज फंडों और पी-नोट्स में दी गई रियायतों, की वजह से काफी अस्थिर है।

औसत मध्यवर्गीय निवेशक बाजार में उतरने और निवेश करने से डर रहे हैं क्योंकि बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखे जा रहे हैं। स्टॉक एक्सचेंजों के बीच प्रतिस्पर्धा निवेशकों के लिए अच्छी है लेकिन अस्थिरता की वजह से निवेशक दूर रह सकते हैं। निवेशकों को शिक्षित किए जाने की जरूरत है।

एक्सचेंज उद्योग में एनएसई भारी बदलाव लाया है। यह प्रतिस्पर्धा का नतीजा था। उच्च स्तर पर प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है क्योंकि एनएसई को आभासी एकाधिकारी माहौल में परिचालन नहीं करना चाहिए। वास्तव में एनएसई की स्थापना इक्विटी बाजार को ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचाने के लिए किया गया था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और इसीलिए जिस उद्देश्य के साथ इसकी स्थापना की गई उसके संतोषजनक परिणामों को प्राप्त करना अभी बाकी है।

डीम्युचुअलाइजेशन के बाद भी बंबई स्टॉक एक्सचेंज काफी पिछड़ा हुआ है। क्या किसी एंकर, जैसे किसी कंपनी में प्रवर्तक होते हैं, का न होना इसकी वजह है?

एंकर निवेशक वे होते हैं जो संस्थान की ग्रोथ में पमुख भूमिका निभाते हैं और जिन्हें कंपनियों की विफलता और सफलता से पहचाना जाता है। मेरा मानना है कि बीएसई ही नहीं ग्रोथ के लिए सभी एक्सचेंजों और एंटरप्राइज में एंकर निवेशक होना चाहिए।

लेकिन ऐसे निवेशकों को कुछ नियमों के तहत काम करना चाहिए जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये अपनी जिम्मेदारियों को पूरी कर रहे हैं। सरकार या सेबी इनका नियमन कर सकते हैं। एनएसई की स्थापना संस्थागत निवेशकों से हुई थी और उन्होंने ही आईडीबीआई की पहचान लीडएंकर निवेशक के तौर पर की।

कार्पोरेट ऋण बाजार के विकास के बारे में आपका क्या ख्याल है क्योंकि हाल ही में इस दिशा में कई कदम उठाए गए हैं?

मेरा मानना है कि स्टांप-डयूटी का बोझ अभी भी अधिक है खास तौर से तब जब हमें बाजार में ज्यादा सुरक्षित कार्पोरेट ऋण उपकरण की जरूरत है। जहां तक सेकंडरी बाजार का प्रश्न है तो वहां डिपॉजिटरी प्रणाली होने से स्टांप डयूटी का नकारात्मक असर नहीं है।

लेकिन बाजार में लाने योग्य कॉर्पोरेट ऋण निर्गम के स्तर पर स्टांप डयूटी काफी अधिक है। राज्य स्तर पर स्टांप डयूटी संरचना में भारी बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि स्टांप डयूटी की दरें काफी ज्यादा हैं। इस मुद्दे को सरकार को तरजीही तौर पर देखना चाहिए।

ऐसी चर्चा चल रही है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई ) को जी-सेक बाजार में अनुमति दी जा सकती है। इस घटनाक्रम से ऋण बाजार किस प्रकार प्रभावित होगा?

प्रथम दृष्टया, एफआईआई के पैसों के प्रवाह से सरकार को और अधिक धन जुटाने में मदद मिलेगी। लेकिन, एफआईआई स्वभाव से सटोरिये होते हैं। अगर सरकार जी-सेक बाजार को इक्विटी बाजार की तरह खुला छोड़ देती है तो यह दुखद हो सकता है और सरकार की उधारी योजनाएं प्रभावित होंगी।

Keyword: Exchanges need anchor investors,
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