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जमीन अधिग्रहण बिल से बंगाल को ग्रहण!
पश्चिम बंगाल सरकार का मानना है कि अगर संप्रग सरकार के भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक को उसके मौजूदा स्वरूप में पास किया जाता है तो इससे राज्य में औद्योगीकरण के रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाएंगे।
इशिता आयान दत्त / कोलकाता July 09, 2009

संप्रग सरकार का भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण की राह बंद कर सकता है।

पश्चिम बंगाल के वाणिज्य और उद्योग मंत्री निरूपम सेन ने बताया कि अगर इस बिल को मौजूदा स्वरूप में पास किया जाता है तो इसका मतलब होगा कि राज्य में औद्योगीकरण का पहिया रुक जाएगा।

सेन ने कहा कि यह बिल व्यावहारिक नहीं है और इसका विरोध किया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे राज्यों में जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है जहां लोगों के पास ज्यादा जमीन है, पर पश्चिम बंगाल में यह मुमकिन नहीं है।

पश्चिम बंगाल में एक परिवार के पास औसतन 5 से 7 एकड़ जमीन है और कुल जमीन का एक फीसदी से भी कम हिस्सा गैर कृषि जमीन का है। अगर सिंगुर की ही बात करें तो वहां नैनो के संयंत्र के लिए 14,000 किसानों से 997 एकड़ जमीन ली गई थी।

इस बिल (संशोधन) में मौजूद एक और खामी का जिक्र करते हुए सेन ने बताया कि इस बिल में निवेशकों को यह छूट दी गई है कि वे 70 फीसदी जमीन खुद लोगों से खरीद लें और बाकी की जमीन के लिए वे सरकार से मदद ले सकते हैं। सेन ने इस प्रावधान पर भी ऐतराज जताया।

उन्होंने कहा कि अगर सरकार लोगों से सीधे जमीन खरीदती है तो उसे उन्हें ज्यादा मुआवजा देना पड़ता है। सरकार को जमीन के बदले में किसानों को 60 फीसदी मुआवजा देना पड़ता है। सेन ने कहा कि जब जमीन मालिकों को यह पता चल जाएगा कि अगर उनकी जमीन का अधिग्रहण सरकार करती है तो उन्हें ज्यादा पैसे मिलेंगे तो फिर वे निवेशकों को सीधे अपनी जमीन क्यों बेचेंगे।

सिंगुर और नंदीग्राम में विरोध के बाद पश्चिम बंगाल सरकार नहीं चाहती कि निवेशक जमीन मालिकों से सीधे जमीन खरीदें। सेन ने कहा कि यह तरीका सही नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसा करना किसानों के हित में नहीं होगा। उन्होंने कहा कि निवेश जमीन खरीदने के लिए बिचौलियों को नियुक्त कर देंगे और इससे किसानों का भला नहीं हो सकेगा।

सिंगुर का उदाहरण देते हुए सेन ने कहा कि जमीन अधिग्रहण करते वक्त राज्य सरकार को यह ध्यान देना चाहिए कि जमीन सौंपने वालों को न केवल पर्याप्त मुआवजा मिल रहा है बल्कि उनके रोजगार, पुनर्वास और समुदाय विकास परियोजनाओं का ध्यान रखना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है।

ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि पश्चिम बंगाल सरकार और विपक्षी तृणमूल कांग्रेस किसी मसले पर एक सी राय रखती हो। पर संप्रग सरकार के भूमि अधिग्रहण (संशोधन) बिल का दोनों ही पक्ष विरोध कर रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस इस बिल का विरोध इसलिए कर रही है क्योंकि पार्टी का मानना है कि अगर बिल के अनुसार ही निवेशक सीधे किसानों से जमीन खरीद लेते हैं ऐसे में किसानों को फायदा नहीं होगा। पार्टी का मानना है कि जमीन मालिकों पर जोर जबरदस्ती कर भी उनसे जमीन खरीदी जा सकती है।

याद रहे कि तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विरोध को देखते हुए टाटा मोटर्स को सिंगुर छोड़कर जाना पड़ा था। पश्चिम बंगाल सरकार को भूमि अधिग्रहण को लेकर हाल में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था और इसका वाम मोर्चे को लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला था। इसी से सबक लेते हुए पश्चिम बंगाल सरकार पुनर्वास और पुनर्स्थापना नीति तैयार करने में जुटी हुई है।

इसे लेकर विभागीय मसौदा तैयार किया जा चुका है, पर इस पर आम बहस किए जाने को लेकर विचार चल रहा है। इस नीति की कुछ खास बातें होंगी जैसे कि जमीन के बदले में जमीन, प्रशिक्षण, तकनीक का विकास और रोजगार सृजन।

पश्चिम बंगाल को रास नहीं

इस बिल के अनुसार राज्य में भूमि अधिग्रहण कर पाना मुमकिन नहीं होगा
कम पैसे के कारण जमीन मालिक नहीं बेचना चाहेंगे सीधे निवेशकों को जमीन
तृणमूल कांग्रेस भी संप्रग सरकार के इस बिल के पक्ष में नहीं है
राज्य सरकार जुटी है पुनर्वास नीति तैयार करने में

Keyword: Eclipse to Bengal from land acquistion bill!,
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