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आर्थिक कूटनीति का किला जीतने की बारी
उम्मीद जताई जा रही है कि नई सरकार अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कूटनीति पर खासतौर से ध्यान देगी। बता रहे हैं
सुमन बेरी /  June 10, 2009

जैसा कि पहले ही उम्मीद की जा रही थी, बीते सप्ताह योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की उनके पद पर दोबारा नियुक्ति कर दी गई।

इसके साथ ही नई सरकार की 'आर्थिक टीम' की तैनाती पूरी हो चुकी है। लैटिन अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली में 'आर्थिक टीम' शब्द का व्यापक तौर से इस्तेमाल किया जाता है। जाहिर तौर पर मैं सभी संसदीय प्रणालियों के अलग-अलग संस्थागत स्वरूप से अच्छी तरह परिचित हूं, और खासकर अपने देश की व्यवस्था को अच्छे से समझता हूं।

जहां तक इंगलैंड की बात है वह इस बात को अच्छी तरह से दर्शाता है कि किसी भी संसदीय प्रणाली में मंत्री नीतिगत मामलों में प्रधानमंत्री के सहयोगी और राजनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी होते हैं। मौजूदा भारतीय व्यवस्था कहीं अधिक जटिल है क्योंकि यहां राजनीतिक और नीतिगत नेतृत्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में बंटा हुआ है।

इसके अलावा एक अतिरिक्त जटिलता सहयोगी दलों के तौर पर छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को संभालने से जुडी हुई है। कैबिनेट के उत्तरदायित्व के पूरक के तौर पर मंत्री समूह और सचिवों की समिति जैसी नई संस्थागत शुरुआत से ये जटिलताएं कई गुना बढ़ गई हैं। मंत्रियों को उनका कामकाज सौंपने से पहले काफी लंबा विचार-विमर्श किया गया।

हालांकि सरकार में दोबारा वापसी करने के बाद यह एक स्वाभाविक कवायद थी, लेकिन मंत्रियों की हाल में नियुक्ति की समीक्षा के दौरान, कोई भी इस बात का आभास पा सकता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय आर्थिक मुद्दों में अधिक गंभीरता और दृढ़ता के साथ शामिल होगा।

वित्त मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय और पर्यावरण तथा वन मंत्रालय में मंत्रियों की नियुक्तियों को गौर से देखने पर पता चलता है कि इसमें पेशेवर रवैया और उन राजनीतिक निर्देश तथा चुनौतियों का पूरा ख्याल रखा गया है, जिनका सामना कांग्रेस पार्टी कर रही है। इन राजनीतिक आदेशों को परंपरागत रूप से एक अवरोध की तरह देखा गया है।

चुनौतियों का सामना कर रहे मंत्री समूह घरेलू राजनीतिक खुलासों को पुनर्व्यवस्थित करते रहे और इस कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई ऐसी रचनात्मक गतिविधि देखने को नहीं मिली जो भारत के बुनियादी हितों की बात उठाते। वैश्विक पटल पर तीन ऐसे मंच हैं जहां अपनी बात जोरदार ढंग से रखने की जरूरत है।

ये मंच हैं जी-20 के नेताओं की बैठक, विश्व व्यापार संगठन में दोहा दौर की बहाली और इस साल के अंत में जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहैगन वार्ता। समूह की मनमानी, बोझिल और गैर-प्रतिनिधित्ववादी संरचना के बावजूद जी-20 देशों के नेताओं का जमावड़ा महत्त्वपूर्ण है।

संकट की गहराई, व्यापकता और स्तर को देखते हुए शायद यह आश्चर्यजनक नहीं होगा कि समूह की पिछली बैठकों (बीते नंवबर के दौरान वाशिंगटन में और अप्रैल के दौरान लंदन में) में तैयार हुआ एजेंडा लक्ष्य से भटक गया है।

व्यापक तौर से देखा जाए तो अनिवार्य कार्य योजनाएं आर्थिक राहत, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और नियामक संरचना में सुधार और संरक्षण की निगरानी तथा उसे बनाए रखने तक सीमित रह गई है। इससे पहले मैंने कहा था कि क्या भारत इस स्थिति में हैं कि वह इन वैश्विक मुद्दों में अपना योगदान कर सके।

चीन के विपरीत हम वैश्विक असंतुलन के बड़े भागीदार नहीं है। यहां तक कि आज भी हम चालू खाता घाटे के साथ मांग में बढ़ोतरी करके वैश्विक अर्थव्यवस्था की बहाली के लिए मामूली सा योगदान कर रहे हैं। आम तौर पर वैश्विक बैंकिंग की खुली पहुंच से घरेलू बैंकिंग प्रणाली को संरक्षण देने के लिए भारतीय वित्तीय नियमन प्रणाली की प्रशंसा की जाती है।

हालांकि इस बढ़त के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के बीच व्यापक तौर से यह धारणा है कि ब्रिक समूह के देशों में भारत की आवाज को निराशाजनक ढंग से दबा दिया गया है। इसकी वजह क्या हो सकती है? और क्या अब तस्वीर बदलनी चाहिए? एहतियात की एक वजह आम चुनाव भी थी। सरकार की पूरी कोशिश थी कि समेकित विकास के चुनावी संदेश से किसी भी दशा में न भटका जाए।

यह कम्युनिस्टों के व्यवहार से उपजी अनिश्चितता को भी दर्शाता है। पिछले कुछ सप्ताह के दौरान मुझे कई बार उस समय आश्चर्य हुआ जब मुझे बताया गया कि वैश्विक समुदाय चाहता है कि सृजनात्मक वैश्विक एजेंडे में भारत के विचारों और उसकी आवाज की भागीदारी बढ़े।

तार्किक रूप से सरकार के भीतर के मुकाबले बाहर अधिक कमी है। इसका अर्थ है कि वैश्विक वित्तीय और नियामक संरचना के मुद्दे पर बौद्धिक समुदाय की थोड़ी सी भागीदारी ही है। इन क्षेत्रों में हमारे अधिकारी हमारे बुद्धिजीवियों के मुकाबले काफी आगे हैं। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि हमारी एक महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है और हम वैश्विक वित्तीय और मौद्रिक प्रणाली को पुनर्गठित करने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।

भारत की घरेलू वित्तीय प्रणाली को लगातार वैश्विक वित्तीय प्रणाली के साथ जोड़ने की जरूरत है, लेकिन ऐसा तभी करना चाहिए जबकि इस बात का पक्का भरोसा हो कि विदेशी ताकतें नवाचार और सुरक्षा के बीच एक उचित संतुलन बनाकर चलेंगी। वैश्विक वित्तीय सेवाओं के मामले में भारत को भी जोरदार बढ़त हासिल है, और भारतीय वित्तीय सेवा उद्योग को इसका फायदा मिल सकता है।

राजनीतिक चुनौती यह है कि इन गतिविधियों को घरेलू विकास दर के लक्ष्यों और गरीबी उन्मूलन के साथ कैसे जोड़ा जाए। व्यापार और पर्यावरण के क्षेत्र में मिल रही चुनौतियों से हम परिचित हैं और उन्हें अच्छी तरह से समझते हैं, लेकिन हमें अपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वाकपटुता को नया आकार देने की तत्काल आवश्यकता है। हमें अविश्वास की भावना से निकलकर एक सक्रिय वार्ताकार बनना है।

इन तीनों क्षेत्रों में कठिन अवधारणात्मक बदलावों के जरिए इस बात की जरूरत को महसूस किया जा सकता है कि सक्रिय बातचीत के जरिए हम तेजी से विकास कर रही दुनिया को एक बेहतर आकार दे सकते हैं। आखिरकर चीन हमारी मनोदशा पर छाया रहेगा। व्यापार में, पर्यावरण में और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना में चीन अब एक विश्व शक्ति है।

हमारे सामने विकल्प यह हैं कि क्या हम अमेरिका और चीन, जिसे अक्सर जी-2 कहा जाता है, वैसे आकार वाले मॉडल में शामिल होंगे, या फिर हम अपने मुख्य हितों के अनुसार एक दूसरे के साथ गठजोड़ करते रहेंगे।

इस बात हमें तय करनी होगी और हमें अपनी विशाल आबादी के हितों को ध्यान में रखते हुए फैसला करना होगा। यह एक ऐसा बड़ा काम है जो प्रधानमंत्री और उनके साथियों के जिम्मे है। भविष्य में भारत का स्थान निश्चित तौर से इनकी सफलता पर निर्भर करेगा।

(लेखक नैशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनॉमिक्स रिसर्च के महानिदेशक हैं। विचार उनके अपने हैं।)

Keyword: time of winning fort of economic policy,
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