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कांग्रेस में 'गद्दारों' की क्या है खासियत

आदिति फडणीस /  11 25, 2022

भारतीय राजनीति के विद्वानों के लिए पॉल ब्रास एक बड़ी शख्सियत थे  जिनका इस साल जून में 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह चरण सिंह पर किए गए अपने गहन शोधपरक कार्यों के लिए जाने जाते थे। लेकिन कांग्रेस पार्टी पर किए गए उनके शोध से यह अंदाजा मिलता है कि देश की इस सबसे पुरानी पार्टी में कैसे गुटबाजी बढ़ी और मतभेदों का समाधान कैसे निकाला गया। 

उन्होंने पार्टी के गुटों की विध्वंसकारी क्षमता का विश्लेषण ही नहीं किया बल्कि इस बात का भी आकलन किया कि किस तरह इन गुटों ने पार्टी में नई जाति और हित समूहों को जोड़ने में मदद की। एक बाहरी खतरे ने गुटबाजी की रफ्तार धीमी कर दी (उदाहरण के तौर पर स्वतंत्रता संघर्ष में सभी गुट और प्रतिद्वंद्वी एक साथ शामिल हुए) जिसमें एक नेता की 'बॉस' बनने की इच्छा वाली प्रवृत्ति ने गुटबाजी को जन्म दिया था। 

ब्रास कांग्रेस के गुट वाले नेता की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इनमें किसी भी और सभी परिस्थितियों में अपने अनुयायियों के प्रति वफादार रहने की खासियत होती है। ब्रास ने कहा कि कांग्रेस में किसी गुट के नेता से संयम बरतने की उम्मीद नहीं की जाती है। वह कहते हैं, ‘नेता से उम्मीद की जाती है कि वह हरसंभव तरीके से खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा।

शर्त केवल इतनी है कि उनके समर्थक भी इस पर जोर देंगे और कि जब नेता खुद आगे बढ़े तब उसे अपने अनुयायियों को भी अपने साथ आगे ले जाना चाहिए।’ब्रास का शोध कार्य मुख्य रूप से 1960 और 1970 के दशक में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के गुटों पर आधारित है। लेकिन पार्टी के काम करने के तरीके को लेकर उनकी समझ और दूरदर्शिता न केवल उत्तर प्रदेश में बल्कि सभी जगह आज भी मान्य है।

राजस्थान में कांग्रेस की मौजूदा स्थिति को ही ले लीजिए। अशोक गहलोत ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बजाय राजस्थान का मुख्यमंत्री बने रहने का फैसला किया। जिस गुट का वह नेतृत्व कर रहे थे, वह एक व्यक्ति के रूप में उभरा और जब ऐसा लगा कि उन्हें राजस्थान से हटा दिया जाएगा तब उन्होंने इस्तीफा देने की धमकी दी। 

गहलोत का मजबूत पहलू यह है कि उनकी अपने गुट पर अच्छी पकड़ है। वह भले ही प्रतिभाशाली वक्ता नहीं हैं, लेकिन आम जनता से जुड़े रहने वाले नेता के रूप में अपने संपर्क और संबंधों का लाभ उठाते हैं। उन्होंने एक बार सार्वजनिक रूप से राजनीति में अपनी शुरुआत का जिक्र किया था कि उनके पिता नगरपालिका अध्यक्ष थे और उन्हें जोधपुर के पास एक छोटे से शहर पीपर में खाद  बेचने के लिए पैसे दिए थे। इसके बजाय युवा गहलोत ने अपना हिस्सा बेच दिया और राजनीति में शामिल हो गए। 

उनके गुरु परसराम मदेरणा थे, जो एक जाट नेता थे। उन्होंने शुरू में सोचा था कि गहलोत इतने मुखर हैं कि सफलता पाना मुश्किल हो सकता है लेकिन फिर भी उन्हें नामांकन करने का मौका दिया। उन्होंने आपातकाल के बाद जनता पार्टी की लहर के बीच पहला चुनाव लड़ा और जीत गए। उन्होंने कभी भी कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा और उनके सबसे बड़े गुट प्रतिद्वंद्वी सीपी जोशी ने 2008 में खुद ब खुद ही अपनी हार स्वीकार कर ली थी।

वह कहते हैं, 'मैं अशोक गहलोत का अनुयायी था। अब मैं उनका सहयोगी हूं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए उन्हें किसी पड़ाव पर निर्णय लेना होगा। पहले हमारे बीच नेता-अनुयायी का संबंध था और अब यह नेता-सहयोगी का संबंध है।’

लेकिन इसके बाद फिर सचिन पायलट आए। वर्ष 2007-08 में नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लिए गुर्जर आंदोलन हुआ जिसमें पुलिस गोलीबारी में 50 से अधिक लोग मारे गए थे। उन दिनों वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार सत्ता में थी। यह समुदाय तब शांत हुआ जब गहलोत सरकार ने उन्हें अति पिछड़ी जाति (एमबीसी) श्रेणी के तहत पांच प्रतिशत आरक्षण दिया। 

हालांकि उन्होंने कोई जातिगत दावा नहीं किया, लेकिन गुर्जर जाति से ताल्लुक रखने वाले पायलट ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए इतना जरूर सुनिश्चित कर दिया कि 2018 के विधानसभा चुनावों में राज्य भर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक भी गुर्जर उम्मीदवार नहीं चुना गया। पायलट और उनके गुट का मानना है कि उन्होंने ही कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाया था। यह समूह गहलोत की 'बॉस' बनने की प्रवृत्ति से नाराज है और वे सीपी जोशी की तरह पीछे हटने वाले मिजाज में आते नहीं दिख रहे हैं। 

दरअसल इससे पहले भी जब पायलट ने देखा कि कांग्रेस में उनकी तरक्की की संभावना कम है, तब 2020 में उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया। कांग्रेस प्रवक्ता आर एस सुरजेवाला ने उन दिनों दिए गए अपने बयान से काफी कुछ स्पष्ट कर दिया था। उन्होंने कहा, ‘हमने सचिन पायलट का बयान देखा है कि वह भाजपा में शामिल नहीं होंगे।

मैं उनसे कहना चाहूंगा कि अगर आप ऐसा नहीं करना चाहते हैं, तब भाजपा की हरियाणा सरकार का सुरक्षा कवर छोड़ दें, उनके साथ सभी बातचीत बंद करें और जयपुर में अपने घर वापस आ जाएं।’कांग्रेस विधायक दल की बैठक में इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया कि किसका पलड़ा भारी है।

200 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 107 विधायकों में से 100 ने गहलोत का समर्थन किया। पार्टी के करीबी सहयोगियों से गहलोत ने कहा कि पायलट पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और वह ‘गद्दार’ हैं। उन्होंने इस सप्ताह के शुरुआत में एक समाचार चैनल को दिए गए साक्षात्कार में  सार्वजनिक रूप से यह बात दोहराई थी।

लेकिन अब पायलट धैर्य भी खत्म होता दिख रहा है। उन्होंने इस तथ्य पर जोर दिया है कि जब गहलोत के लिए मुख्यमंत्री पद और कांग्रेस अध्यक्ष पद के बीच चयन करने का समय था तब बड़ी संख्या में विधायकों ने उनका उत्तराधिकारी चुनने के लिए आने से इनकार कर दिया जो अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा है और जिसके लिए उन्हें कोई सजा नहीं दी गई। हाल ही सरकार की स्थिरता पर ताजा खतरा गुर्जर आंदोलन के आह्वान के चलते मंडरा रहा है जो निश्चित रूप से पायलट के इशारे पर नहीं बल्कि गहलोत सरकार को घेरने की तैयारी से जुड़ा है। 

पॉल ब्रास की नजर में इसका आकलन किस तरह होता? मुमकिन है कि कांग्रेस में गुट सक्रिय हों और उनका अस्तित्व विरोधाभासी तरीके से पार्टी को कमजोर करता हो लेकिन यह भी संभव है कि पार्टी इससे मजबूत भी होती है क्योंकि गुट के नेता खुद को मजबूत करने के लिए नए समूहों को पार्टी में शामिल करते हैं।

पायलट ने अब तक जातिगत नेता के रूप में पहचाने जाने के लोभ का विरोध किया है। लेकिन अगर उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है तब सवाल यह उठता है कि क्या वह खुद को मजबूत करने के लिए एक समुदाय को मजबूत करेंगे?

Keyword: कांग्रेस, राजस्थान,
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