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आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाता सऊदी अरब

श्याम सरन /  11 25, 2022

पितृसत्तात्मक, सामंती और मध्यकालीन परंपराओं के लिए पहचाना जाने वाला सऊदी अरब किस प्रकार स्वयं को आधुनिकता के रंग में ढाल रहा है। बता रहे हैं श्याम सरन 

वैश्विक साइबर सुरक्षा सम्मेलन को  संबोधित करने के लिए कुछ दिन पहले सऊदी अरब की राजधानी रियाद जाना हुआ। पश्चिम एशिया के इस महत्त्वपूर्ण देश की यह मेरी पहली यात्रा थी, जिसके साथ पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत के संबंधों का व्यापक विस्तार हुआ है। सऊदी अरब न केवल भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता है, बल्कि वहां बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी आबादी भी रहती है, जो पेशेवर और श्रमिक दोनों श्रेणियों में कार्यरत है। चूंकि इसी देश में मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थल हैं तो यह भारतीय मुस्लिमों के लिए हमेशा से एक पाक जगह रही है और वे हज के लिए निरंतर वहां जाते रहे हैं। 

हाल के वर्षों में संबंधों के स्तर पर उसने एक भू-राजनीतिक बढ़त हासिल की है, क्योंकि यह देश तेल से इतर अपनी अर्थव्यवस्था के विविधीकरण की संभावनाएं तलाशने पर जोर दे रहा है, पश्चिम एशियाई क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव बढ़ा रहा है और अधिक प्रगतिशील एवं आधुनिक देश बनने की राह पर है।

यह एक एकाकी, द्वीपीय, गहन रूढ़िवादी और यहां तक कि एक कट्टरपंथी इस्लामिक देश की अपनी छवि से तेजी से पीछा छुड़ा रहा है। मध्यकालीन प्रथाओं, सख्त पितृसत्तात्मक प्रावधानों से बनने वाली वह सामंती राज्य की धारणा जो सशंकित एवं उल्लासरहित परिवेश बनाती है, उससे मुक्ति के सचेत प्रयास जारी हैं। 

सम्मेलन में सत्रों के दौरान और उसकी संचालन गतिविधियों में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी देखकर अचरज हुआ। हालांकि, उनमें से अधिकांश ने हिजाब पहना हुआ था तो तमाम ऐसी भी थीं, जिन्होंने हिजाब नहीं पहना था। सऊदी साइबर सुरक्षा मंत्री और संचार मंत्री दोनों ने इस बात पर गर्व किया कि इस हाइ-टेक क्षेत्र में सऊदी महिला पेशेवरों की संख्या लगातार बढ़ने पर है। उन्होंने दावा किया कि यह उनकी नीति का हिस्सा है कि महिलाओं को इनमें और ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में बराबर भागीदारी के लिए प्रोत्साहन दिया जाए।  

सम्मेलन के दौरान जिन सऊदी प्रतिभागियों से मेरी जान-पहचान हुई, उन्होंने स्वीकार किया कि देश में बड़े बदलाव मौजूदा युवराज और अब प्रधानमंत्री बन चुके मोहम्मद बिन सलमान (जो आम तौर पर एमबीएस के उपनाम से लोकप्रिय हैं) के दौर में हुए हैं, जिन्होंने 2017 में अपने पिता किंग सुलेमान से सत्ता संभाली।

उन्होंने कहा कि सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन महिलाओं के दर्जे में आया है। बुर्का या हिजाब पहनने की कोई अनिवार्यता नहीं रह गई और परिधान को लेकर सख्ती बरतने वाली बेहद डरावनी मॉरल पुलिस इकाई को भंग कर दिया गया है। न ही किसी महिला के लिए यह आवश्यक रह गया है कि सार्वजनिक स्थल पर वह किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ ही नजर आए। सऊदी महिलाएं शहर में गाड़ी चलाते हुए रेस्तरां और कॉफी शॉप में अकेले या अन्य महिला और पुरुष साथियों के साथ जा रही हैं।

सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में लैंगिक आधार पर कोई अलगाव नहीं रह गया है। शहर को मनोरंजन एवं सुकूनदेह गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापित करने के सुनियोजित-सुविचारित प्रयास हो रहे हैं। मैं बुलवार्ड भी गया। यकीनन यह दुनिया के सबसे बड़े मनोरंजन पार्कों में से एक होगा। वहां डिजाइनर दुकानें, रेस्तरां एवं गेम और ओपन-एयर पॉपुलर म्यूजिक कंसर्ट्स की व्यवस्था थी। वहां सऊदी परिवारों का भारी जमावड़ा था।

महिलाओं और पुरुषों के उत्साही समूह थे, जो वहां उपलब्ध गतिविधियों का पूरा लुत्फ उठा रहे थे, जैसा कि दुनिया में कहीं भी देखने को मिल सकता है। अब सालाना रियाद फेस्टिवल भी आयोजित होने लगा है, जिसमें तमाम अंतरराष्ट्रीय सितारे और कलाकार-फनकार भाग लेते हैं, जिनमें हमारे देसी सलमान खान भी शामिल हैं। पुराने घिसे-पिटे तौर-तरीकों से सोच-समझकर पीछा छुड़ाया जा रहा है। 

वैश्विक साइबर सुरक्षा सम्मेलन भी देश को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए एक मंच के रूप में प्रस्तुत करने का पड़ाव था। सम्मेलन का बुनियादी ढांचा आधुनिक एवं सक्षम था, जिसमें अद्यतन ऑडियो-विजुअल एवं डिजिटल तकनीक का उपयोग किया गया। सऊदी अरब साइबर सुरक्षा में एक अनपेक्षित अग्रणी देश के रूप में उभरा है। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) के वैश्विक साइबर सुरक्षा सूचकांक में अमेरिका के बाद दूसरा स्थान उसी का है।

सऊदी अरब ने भारी पैमाने पर वित्तीय एवं मानव संसाधन इस दिशा में लगाए हैं, विशेषकर अपने महत्त्वपूर्ण तेल उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला पर हुए हैकिंग और मैलवेयर हमलों के बाद उसने इस मोर्चे को और मजबूत बनाया है। आईटीयू के जिस सूचकांक में सऊदी अरब दूसरे पायदान पर है, उसमें भारत अभी दसवें स्थान पर है।

मुझे उद्घाटन पैनल में बोलने के लिए कहा गया। उसमें मेरे साथ सुविख्यात भौतिकशास्त्री एवं विज्ञान को लोकप्रियता दिलाने वाले मिशियो काकू और एक साइबर मनोवैज्ञानिक मैरी ऐकेन भी मौजूद रहे। मैरी ऐकेन ने ‘द साइबर इफेक्ट’ नाम से बहुप्रशंसित किताब भी लिखी है। 

मिशिओ काकू को सुनना बड़ा दिलचस्प था, जिन्होंने तर्क दिया कि सिलिकन एवं डिजिटल तकनीकों का दौर अब अंत के पड़ाव की ओर है और हम कहीं रोमांचक एवं अथाह शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटिंग की दहलीज पर हैं। उन्होंने भविष्यवाणी की कि एक दशक के भीतर अमेरिका में सिलिकन वैली बिल्कुल उसी प्रकार से अपनी आभा खो देगी, जैसे नए डिजिटल दौर के उभार में औद्योगिक विनिर्माण की गति हुई। आधुनिक कंप्यूटर पुराने जमाने की डिवाइस जैसे हो जाएंगे। 

दूसरी ओर प्रोफेसर ऐकेन ने अत्यंत भाव-प्रवण अंदाज में कहा कि कैसे सम्मेलन में तकनीक के संचालन को लेकर तो बात हुई, लेकिन इस पर बमुश्किल ही कोई चर्चा हुई कि तकनीक कैसे उन पहलुओं का अवमूल्यन एवं विरूपण कर रही है, जो मूलभूत रूप से मानवीय हैं।

उन्होंने कहा कि तीन से पांच वर्ष की आयु में सोशल मीडिया और वर्चुअल संसार तक पहुंच से एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण हो रहा है, जो मानव से मानव संपर्क एवं संवाद करने में अक्षम है। अधिकांश मामलों में अभिभावक ही बच्चों को नई डिवाइस एवं मीडिया को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिसके पीछे यही मिथ्या धारणा होती है कि ऐसा करके वे अपने बच्चों को नए दौर के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करने की दिशा में उनका सशक्तीकरण कर रहे हैं। उन्होंने मनोवैज्ञानिक प्रभावों की तुलना महामारी से की। 

सम्मेलन में साइबर क्षेत्र से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। स्पष्ट है कि यह एक अराजक क्षेत्र बना हुआ है और जो फिलहाल इससे जुड़ी क्षमताओं में अग्रणी हैं, उनकी भी इसमें अनुरूपता स्थापित करने की तैयारी कम है। इसमें किसी कानूनी ढांचे को तो छोड़ ही दीजिए प्रावधान बनाने और आचार-संहिता निर्माण पर भी सहमति कम है।

साइबर क्षेत्र में तकनीक उद्दीपित होकर असंगत परिणामों के साथ प्रभावों की गति बढ़ाती है। राजनीति धीरे-धीरे पीछे छूट रही है। नीति-निर्माताओं और नीति-नियंताओं के स्तर पर पर्याप्त साइबर साक्षरता का अभाव है और मानवता के समक्ष इस चुनौती के अनुपात में जागरूकता की कमी को केवल वैश्विक सामूहिक प्रयासों से दूर किया जा सकता है। अफसोस की बात है कि हम अभी भी एनालॉग लड़ाई लड़ रहे हैं, वह भी तब जबकि डिजिटल क्वांटम की राह प्रशस्त करता है। 

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और संप्रति सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में मानद फेलो हैं) 

Keyword: साइबर सुरक्षा, सऊदी अरब,
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