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ताकत बनाम मूल्य

बीएस संपादकीय /  11 25, 2022

जैसा कि हमने इस स्तंभ में गत सप्ताह भी उल्लेख किया था, भारत इस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत अच्छी स्थिति में है। ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद वह सही मायनों में एक दशक के भीतर जर्मनी और जापान को पीछे छोड़ने की दिशा में बढ़ सकता है।

इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था भारत से क्रमश: 16 प्रतिशत और 24 प्रतिशत बड़ी है। ऐसा करने के लिए उसे बड़ी गलतियों से बचना होगा और अपनी गति बरकरार रखनी होगी। ऐसे में एक और सवाल का जवाब देना लाजिमी हो जाता है: क्या संस्थागत ढांचे समेत देश के अन्य गुण ऐसे हैं जैसे कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में होने चाहिए?

इसका उत्तर तलाशने के लिए इस बात पर विचार कीजिए: ऐसे में जब तथाकथित व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक के ताजा मसौदे में राज्य को अपनी मर्जी से नियम बनाने के असीमित अधिकार सौंपे जा रहे हैं तो क्या इससे भारत अधिक आकर्षक बनता है? एक कारोबारी केंद्र के रूप में देश की प्रतिष्ठा पर इसका क्या असर होता है जब घरेलू अदालतें मध्यस्थता के अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को लेकर गतिरोध की स्थिति बना देती हैं?

देश में सत्ता से जुड़े कारोबारी कुलीनों की बढ़ती मौजूदगी एक तरह से समान प्रतिस्पर्धी माहौल को खत्म करने का काम करती है। क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि सरकार मनमाने काम करती है। उदाहरण के लिए लोगों को बिना मामला अदालत में चलाए वर्षों तक जेल में बंद रखना?

ऐसे सवालों को अप्रासंगिक बताकर खारिज किया जा सकता है क्योंकि चीन ने एक दलीय शासन प्रणाली में और नागरिकों को दूरदराज इलाकों में लगभग बंधुआ बनाकर रखते हुए भी दशकों तक तेज वृद्धि और विकास हासिल किया है। इस दौरान कारोबारों के साथ भी उसका व्यवहार अच्छा नहीं रहा है। ऐसी दुनिया में जहां मध्यवर्ती शक्तियां लगातार उदार लोकतंत्र के मूल्यों की अवज्ञा करें और उसे कहें कि वह यूरोप से आई हुई कोई चीज है तो आशंकाएं बढ़ना लाजिमी है।

तब भी जब वे इसकी जगह अपनी तरह के राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान की राजनीति को बढ़ावा दें। इसे उस समय और ताकत मिलती है जब वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप उन देशों में भी अंतर्मुखी नीतियां नजर आएं जिन्होंने एक समय मुक्त बाजार की जमकर हिमायत की थी।

भारत को यह तय करना होगा कि वह सरकार-कारोबार के रिश्ते की शर्तों को और उससे जुड़े राज्य-नागरिक समीकरण को कैसा रखना चाहता है। ऐसा करते समय उसे यह पूछना चाहिए कि आखिर क्यों हजारों अमीर भारतीय सिंगापुर और दुबई जैसी जगहों की नागरिकता ले रहे हैं। उन्हें भारत में क्या कमी लग रही है? जाहिर है ऐसा केवल साफ हवा की कमी की वजह से या अच्छे स्कूलों और अस्पतालों की कमी के चलते नहीं हो रहा है। क्या इसकी वजह नियमों के पालन जैसी साधारण सी बात भी हो सकती है? 

चयन करते समय भारत को एक तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि वह चीन नहीं है। चीन के जटिल निवेश नियमों और परिचालन संबंधी अनिश्चितताओं को अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने कारोबारी सुगमता की कीमत के रूप में स्वीकार किया क्योंकि चीन का घरेलू बाजार बहुत बड़ा और जीवंत है तथा उसके एक विशाल उत्पादन केंद्र होने का श्रेय हासिल रहा है। इन बातों के चलते चीन से दूरी बनाना संभव नहीं था।

तुलनात्मक रूप से देखें तो भारत के प्रतिस्पर्धी वे देश हैं जो खुद को निवेश के विकल्प के रूप में पेश करते हैं। जरूरी नहीं कि उनके पास बड़े घरेलू बाजार का लाभ हो लेकिन वह बात भारत पर भी लागू नहीं होती। अभी उसे लंबा सफर तय करना है और चीन से बेहतर तरीके से आगे बढ़ना है। जाहिर तौर पर यह बात सच है कि जो देश खुद को अपने नागरिकों के साथ व्यवहार में उदाहरण बताते हैं वे अंतरराष्ट्रीय कारोबारों में वैसा नहीं करते जिन बातों के बारे में भाषण दिया करते हैं।

बिना शुल्कों वाले व्यापार गतिरोधों को लेकर जापान की विशेषज्ञता के बारे में सब जानते हैं, वैसे ही जैसे यह बात कि अमेरिका एकपक्षीय नियम बनाता है। मसलन शेष विश्व से यह कह देना कि वे किसके साथ व्यापार कर सकते हैं किसके साथ नहीं और विदेशों में रूस की वित्तीय संपत्तियां जब्त करना आदि। कारोबारियों को यह पता है कि जापान में किसी विदेशी के लिए स्थानीय कंपनी के खिलाफ मुकदमा जीतना बेहद मुश्किल है। यह भी कि यूरोप भी अन्य देशों की तरह ही संरक्षणवादी है।

बीते दिनों के नीति निर्माताओं के पाखंडों के प्रति ऐसी जागरूकता देश में बढ़ती राष्ट्रवादी भावना में योगदान करती है। इसके बावजूद आखिरकार, भारत को ही यह तय करना है कि वह किस तरह का देश बनना चाहता है- ऐसा देश जिसके उसके बाजार की ताकत की वजह से सराहा जाए या फिर ऐसा देश जो मनमाना व्यवहार करे और अपने नागरिकों-कारोबारियों से अपनी मर्जी का आचरण करे क्योंकि उसका आकार और गतिशीलता उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाव मुहैया कराते हैं। क्या भारत केवल ताकत का खेल खेलेगा या मूल्यों पर भी ध्यान देगा?
Keyword: अर्थव्यवस्था, जीडीपी, डेटा संरक्षण विधेयक,
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