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आगामी बजट में रियायतें खत्म करने की हो पहल

ए के भट्टाचार्य /  November 24, 2022

कर दरों में कमी करने के बजाय वर्ष 2023 के बजट में ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए जिनकी मदद से करों की प्रा​प्ति में होने वाली गिरावट की प्रवृ​त्ति को पलटा जा सके। बता रहे हैं ए के भट्टाचार्य  

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पांचवें बजट को अंतिम रूप देने संबंधी वा​र्षिक मशविरा प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह बजट 1 फरवरी, 2023 को पेश किया जाएगा। यह कवायद कई वजहों से महत्त्वपूर्ण है। 

कोविड-19 महामारी का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने के बाद यह पहला बजट होगा। महामारी ने बीते दो वर्षों में बजट निर्माण को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। परंतु ज्यादा अहम बात यह है कि 2023-24 का बजट उच्च मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, बढ़ती ब्याज दरों और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण उत्पन्न भू-राजनीतिक संकट के हालात में पेश किया जाने वाला है। इस युद्ध ने न केवल कच्चे तेल की कीमतों और बाह्य खाते को प्रभावित किया है ब​ल्कि आ​र्थिक सुधार की गति पर भी असर डाला है।

अगला बजट तैयार करते समय सीतारमण को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? सरकार की वित्तीय ​स्थिति का आकलन इसमें उपयोगी साबित होगा ताकि उन कारकों का पता लगाया जा सके जिन्हें वित्त मंत्री को बजट प्रस्ताव बनाते समय ध्यान में रखना चाहिए। ऐसे कुछ कारकों की सूची इस प्रकार है। 

कमजोर कर उत्प्लावकता (टैक्स बॉयंसी): चालू वित्त वर्ष में कर राजस्व में अच्छी वृद्धि को लेकर वित्त मंत्रालय का उल्लास समझा जा सकता है। ऐसी खबरें हैं कि केंद्र सरकार का सकल कर संग्रह करीब 31 लाख करोड़ रुपये हो सकता है जो 2021-22 के 27 लाख करोड़ रुपये से करीब 15 प्रतिशत अ​धिक होगा। वर्ष 2022-23 की पहली छमाही में 13.92 लाख करोड़ रुपये के कर संग्रह का अनुमान है जो करीब 18 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है।

ऐसे में पूरे वर्ष के कर संग्रह के अनुमान के मुताबिक दूसरी छमाही में इसमें कमी आ सकती है और पूरे वर्ष का अनुमान हकीकत के करीब हो सकता है। चूंकि वृद्धि का नेतृत्व प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के करों की वृद्धि के हाथों में होगा इसलिए इस घटनाक्रम का सार्वजनिक वित्त पर सकारात्मक प्रभाव होगा, खासतौर पर राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के क्रम में।

परंतु कर राजस्व की मदद से भारतीय अर्थव्यवस्था के नॉमिनल आकार में कैसे सुधार होगा? अगर मान लिया जाए कि सकल कर संग्रह 2022-23 में 15 फीसदी बढ़कर 31 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा और अर्थव्यवस्था का आकार भी 15 फीसदी बढ़कर 272 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा और सकल घरेलू उत्पाद में इन करों की हिस्सेदारी करीब 11.4 फीसदी होगी। यह 2021-22 के 11.44 फीसदी से आं​शिक रूप से कम है।

कर उत्प्लावकता की दर के इस वर्ष घटकर एक हो जाने का अनुमान है जबकि 2021-22 में यह 1.72 फीसदी थी। पिछली बार यह दर 1.7 फीसदी के स्तर पर नोटबंदी के पहले यानी 2015-16 में पहुंची थी उसके बाद लगातार तीन साल इसमें गिरावट आई और फिर कोविड का आगमन हो गया। 

अगर सकल कर राजस्व में अच्छी वृद्धि के बावजूद कर-जीडीपी अनुपात नहीं बढ़ रहा है और कर में होने वाला इजाफा चालू वर्ष में कम हो रहा है तो केंद्रीय कर ढांचे में कुछ न कुछ कमी है जिसे दूर करना है। वित्त मंत्री को नया बजट तैयार करते समय इस पर ध्यान देना चाहिए।

ऐसे में व्य​क्तिगत आय कर दरों में कटौती की मांग सुनने के बजाय उन्हें कर प्रा​प्तियों में घटती तेजी के हवाले से व्यक्तिगत और कॉर्पोरेशन करों में कई रियायतों को समाप्त करना चाहिए। प्रभावी कराधान दर और नॉमिनल कराधान दर के बीच अभी भी काफी अ​धिक अंतर है और 2024 के चुनाव के पहले अंतिम बजट में कई रियायतों को समाप्त करना राजस्व बढ़ाने का बेहतर तरीका होगा।

व्यय गुणवत्ता: कर आधार और कर संग्रह को बढ़ाना आवश्यक है क्योंकि  ​वित्त मंत्री को चुनाव के पहले व्यय बढ़ाना ही होगा। गत वर्ष उन्होंने सरकारी के कुल व्यय को जीडीपी के 16 फीसदी के भीतर सीमित करने में कामयाबी पाई थी। 2020-21 में यह जीडीपी के 18 फीसदी तक जा पहुंचा था। 2022-23 में उन्होंने इसे कम करके 15.3 फीसदी करने की योजना बनाई थी लेकिन इसमें कुछ विचलन दिख सकता है। 

सरकार को व्यय की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। पूंजीगत व्यय पर जोर पहले ही अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर साबित हुआ है। जीडीपी में पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी बीते तीन वर्षों में 1.67 फीसदी से बढ़कर 2.55 फीसदी तक पहुंच चुकी है। चालू वर्ष में इसके बढ़कर 2.91 फीसदी हो जाने का अनुमान है।

यह पिछले रुझान के उलट है। जीडीपी में पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी 2003-04 के 3.84 फीसदी से कम होकर 2019-20 में 1.67 फीसदी रह गई थी। बीच के वर्षों में इसमें कुछ वा​र्षिक इजाफा हुआ। 2020-21 के बाद यह पूंजीगत व्यय में निरंतर उछाल की सबसे लंबी अव​धि है और इसे बरकरार रखा जाना चाहिए। अगर इसके लिए राजस्व व्यय में इजाफे में कटौती भी करनी पड़े तो वि​त्त मंत्री को ​इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। 

पारद​र्शिता और विरूपण: सीतारमण ने बजट प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए जो कदम उठाए उनमें से एक था बजट से इतर सरकार की उधारी का उल्लेख जो वह अपने व्यय की पूर्ति के लिए लेती है। 2016-17 से ही ऐसी उधारी नियमित रूप से ली जा रही है लेकिन 2019-20 तक इस बात को स्वीकार नहीं किया जाता था। इन वजहों से बजट से इतर कुल उधारी 2016-17 के 79,167 करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 1.62 लाख करोड़ रुपये हो गई।

सीतारमण ने न केवल इस लेनदेन को सामने लाना शुरू किया ब​ल्कि इसमें कमी लानी भी शुरू की। इस रा​शि में कमी आने लगी और 2019-20 के 1.48 लाख करोड़ रुपये से घटकर यह 2020-21 में 1.21 लाख करोड़ रुपये और 2021-22 में केवल 752 करोड़ रुपये रह गई। 2022-23 में ऐसी कोई उधारी नहीं थी। यह सराहनीय प्रयास था और वित्त मंत्री को सरकारी व्यय की पूर्ति के लिए ऐसे अस्पष्ट तरीकों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

2023-24 में सीतारमण उस विरूपण को समाप्त कर सकती हैं जो राज्यों की कीमत पर कर राजस्व जुटाने में दिखाई दिया है। उपकर और अ​धिभार जो राज्यों के साथ बांटे जाने वाले फंड का हिस्सा नहीं हैं कुल कर संग्रह में उनकी ​साझेदारी 2019-20 के 8 फीसदी से बढ़कर 2020-21 में 10.5 फीसदी और 2021-22 में 18 फीसदी हो गई। 2022-23 में यह घटकर 16 फीसदी होगा लेकिन यह तय है कि राज्यों को केंद्रीय सकल कर राजस्व के ​इस भाग में कोई हिस्सा नहीं मिलता।

उपकर और अ​धिभार पर केंद्र की निर्भरता कम करने का प्रयास तत्काल शुरू होना चाहिए। इसके बजाय सरकार यह देख सकती है कि परिसंप​त्ति मुद्रीकरण से गैर कर राजस्व और प्रा​प्तियां कैसे बढ़ाई जा सकती हैं। राज्यों के साथ कम राजस्व साझेदारी का एक तरीका यह हो सकता है कि गैर कर राजस्व में सुधार किया जाए।

ऐसा शुल्क और सेवा शुल्क बढ़ाकर किया जा सकता है। बीते दो वर्षों में गैर कर राजस्व जीडीपी का बमु​श्किल एक से 1.3 फीसदी रहा है। जबकि एक दशक पहले यह 2 फीसदी से अ​धिक रहता था। गैर कर राजस्व को राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता। उच्च उपकर और अ​धिभार संग्रह के भरोसे रहने के बजाय समझदारी यह होगी कि और अधिक गैर कर राजस्व जुटाया जाए। 

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