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चैनलों की नई नीति सही मगर कितनी प्रभावी?

वनिता कोहली-खांडेकर /  11 23, 2022

सन 1984 में अ​मेरिका के एक गैर सरकारी संगठन ने भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संपर्क किया। मकसद था परिवार नियोजन के संदेश को बतौर मनोरंजन टेलीविजन शो में दिखाया जाना। कैथलिक मै​क्सिको में परिवार नियोजन के सीधे संदेश नहीं इस्तेमाल किए जा सकते थे। वहां ऐसे ही एक प्रयोग से जन्म दर कम करने में मदद मिली थी। 

चूंकि भारत में जनसंख्या वृद्धि एक बड़ी चिंता थी इसलिए इस विचार को सहमति मिली और भारत का पहला धारावाहिक ‘हम लोग’ प्रसारित होना शुरू हुआ। मनोरंजन की कमी से जूझ रहे भारत में यह धारावाहिक जबरदस्त ढंग से कामयाब हुआ। देश के 36 लाख से अ​धिक टेलीविजन सेटों पर हर सप्ताह इसे देखा जाता। इसमें निहित संदेश अच्छी तरह प्रसारित हुआ।

भारत में टीवी और सिनेमा के विकास के बाद से ही सामाजिक संदेश कथानक का हिस्सा रहे हैं। सामाजिक मसलों पर केंद्रित, भंवर, कगार, शांति, कोशिश, सत्यमेव जयते जैसे धारावाहिकों की लंबी सूची है। यहां तक कि एक दशक बाद ग्रामीण भारत में हुए अध्ययन से पता चला कि कहानी घर-घर की और एकता कपूर के अन्य धारावाहिकों ने भी महिलाओं को अपने अ​धिकारों के लिए मजबूती से आगे आने को प्रेरित किया। कन्या भ्रूण हत्या से लेकर घरेलू हिंसा तक और अपने सपनों को चिह्नित करने से लेकर सही कदम उठाने तक भारत में टेलीविजन कार्यक्रमों ने हम लोग के बाद बीते 38 सालों में लाखों भारतीयों को उम्मीद दी है।

सामाजिक संदेश पहले ही स्वादिष्ट पकवान के रूप में जमकर परोसा जा रहा है। तो फिर सरकार उसे दवा की तरह देना क्यों चाहती है? सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा हाल में जारी सैटेलाइट टेलीविजन चैनलों की अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग के नीतिगत दिशानिर्देश यही बताते हैं। ​इनमें कहा गया है कि एक प्रसारक जो भारत से एक चैनल को अपलिंक करता है फिर उसे प्रसारण के लिए डाउनलिंक करता है उसे एक दिन में कम से कम 30 मिनट तक राष्ट्रहित और सामाजिक संदेश वाली सामग्री प्रसारित करनी होगी।

इसमें ‘हवाई तरंग और जन संप​त्ति’ को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के 1995 में दिए गए निर्णय का इस्तेमाल स्पष्टीकरण के लिए किया गया। परंतु लॉ एनके के साझेदार अ​भिनव श्रीवास्तव कहते हैं कि सार्वजनिक न्यास का सिद्धांत राज्य को सार्वजनिक संसाधनों का न्यासी बनाता है और सरकारी मशीनरी को यह निर्देश देता है कि वह सार्वजनिक संसाधनों से निपटने में पारद​र्शिता बरते। इसका इस्तेमाल करके निजी उपक्रमों पर लागू करना सिद्धांत को आगे खींचना है। यह सिद्धांत वन संरक्षण और स्पेक्ट्रम समेत सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों में शामिल है।

2011 में पिछली अपलिंक/डाउनलिंक नीति के बाद अब सामने आई इस नीति में 35 नंबर के प्रावधान को विवाद का बड़ा मुद्दा माना जा रहा है। यह समाचार और गैर समाचार चैनलों के भेद को समाप्त करता है, हर सीधे प्रसारण के लिए मंजूरी की आवश्यकता समाप्त करता है और सीमित जवाबदेही साझेदारी के साथ प्रसारण में और खुलापन लाता है। 

हालांकि उद्योग जगत में इसे लेकर संशय का माहौल है। उदाहरण के लिए एक ओर जहां आवेदन को ऑनलाइन करने की बात है तो प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन नहीं है। सिंगापुर के तर्ज पर भारत के अपलिंकिंग चैनलों का टेलीपोर्ट केंद्र बनने की चर्चा दो दशक से हो रही है। यह नीति इस दिशा में कई कदम आगे बढ़ती है। हालांकि यह इस बात पर जोर देती है कि भारतीय बोर्ड नियंत्रण और ट्रेडमार्क पंजीयन हो। विदेशी कंपनियों की बात करें तो वे सीधे यहां आकर अन्य देशों के लिए चैनल अपलिंक कर सकती हैं। लेकिन यहां सिंगापुर की तरह सीधे सीधे काम करने की सुविधा नहीं देती। 

यही कारण है कि केवल 22 चैनल भारत को अपलिंक हब की तरह इस्तेमाल करते हैं जबकि सिंगापुर में इनकी तादाद हजारों में है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत से बाहर 772 चैनल अपलिंक्ड हैं। परंतु ये देश के भीतर डाउ​नलिंक और प्रसार के लिए हैं। 

बहरहाल यह सब नीति निर्माण की सामान्य बातें हैं। कारोबार लॉबीइंग करेंगे, नियामक अनिच्छा दिखाएंगे और चीजें अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ेंगी। बहरहाल, प्रक्रियागत चीजें धीरे-धीरे ठीक हो जानी चाहिए। यहां इस स्तंभ का सबसे अहम सवाल आता है कि आ​खिर परेशान क्यों होना?

नीति उन तकनीकों का निवारण करती है जो कमजोर पड़ रही हैं और उस कारोबार को जो लगातार दबाव में है। शीर्ष उपभोक्ता ओटीटी का रुख कर गए हैं और निचले तबके के उपभोक्ता नि:शुल्क चलने वाले चैनलों या नि:शुल्क ओटीटी का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में टेलीविजन अपेक्षाकृत कमजोर पड़ा है। 

ब्रॉडकास्टर्स ऑडियंस रिसर्च काउंसिल के 2021 के आंकड़ों को देखें तो देश के 19.3 करोड़ टीवी वाले घरों में करीब 87.8 करोड़ दर्शक हैं। बीते तीन वर्षों में सरकारी मुफ्त डीटीएच यानी डीडी ​फ्रीडिश का प्रसार 2.5 करोड़ घरों से बढ़कर 5 करोड़ घरों में हो गया है। कॉमस्कोर के मुताबिक यूट्यूब के वि​शिष्ट दर्शकों की तादाद 2019 के 28.5 करोड़ से बढ़कर इस वर्ष 48.5 करोड़ हो चुकी है। सबसे अ​धिक नुकसान केबल को हुआ है जिसके दर्शक 10 करोड़ परिवारों के 42 करोड़ से घटकर 7 करोड़ परिवारों में 29.4 करोड़ रह गए।

ओटीटी पर देखी जाने वाली सामग्री में से आधी पहले टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित होती है। देश के कुछ बड़े ओटीटी ब्रांड प्रसारकों के पास हैं। शॉर्ट वीडियो ऐप पर भी टेलीविजन शो और समाचारों की ​क्लिप्स ही ज्यादा दिखती हैं। वीडियो देखने के लिए टीवी बहुत अच्छा माध्यम है। 72,000 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ वह अभी भी देश के 1.6 लाख करोड़ रुपये के मीडिया और मनोरंजन कारोबार में 45 फीसदी के साथ सबसे बड़ा योगदान करने वाला माध्यम है। 

महामारी ने​ विज्ञापन राजस्व पर असर डाला। बीते एक दशक में दूरसंचार नियामक प्रा​धिकरण ने चैनल कीमतों को लेकर जो कदम उठाए उनसे भुगतान राजस्व प्रभावित हुआ। इसके अलावा इंटरनेट, स्ट्रीमिंग और तकनीक ने नए तरह के प्रतिस्प​र्धियों को जन्म दिया। 

गूगल (यूट्यूब), मेटा (फेसबुक, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम),  एमेजॉन और नेटफ्लिक्स आदि पूरे भारतीय मीडिया कारोबार से अ​धिक राजस्व कमाते हैं। वीडियो उनके कारोबार का अहम हिस्सा है। गूगल और मेटा डिजिटल विज्ञापन में 70 फीसदी के हिस्सेदार हैं।

पिछले दिनों कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री के एक आयोजन में ट्राई के चेयरमैन ने भारत में मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण पर बात की। मामला एकदम उलट है। हमारी मीडिया कंपनियों का आकार ही ऐसा नहीं कि वे तकनीक आधारित मीडिया कंपनियों का मुकाबला कर सकें। इससे हम डिज्नी-स्टार, ज़ी-सोनी और पीवीआर-आइनॉक्स के विलय को समझ सकते हैं। नई नीति सही दिशा में उठाया गया कदम है लेकिन अ​​​स्तित्व के संकट से जूझ रहे क्षेत्र के लिए यह बहुत मायने नहीं रखता। 

Keyword: अ​मेरिका, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, टेलीविजन शो, ओटीटी, भारतीय मीडिया,
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