बिजनेस स?टैंडर?ड - अमेरिकी मध्याव​धि चुनाव और वै​श्विक ​स्थिरता
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अमेरिकी मध्याव​धि चुनाव और वै​श्विक ​स्थिरता

अजय शाह /  11 23, 2022

अमेरिका के मध्याव​धि चुनाव एक अ​धिक सामान्य अंतरराष्ट्रीय माहौल को लेकर उम्मीद पैदा करते हैं। बता रहे हैं अजय शाह

विश्व अर्थव्यवस्था असाधारण कठिन दौर से गुजर रही है। एक ओर हम महामारी से पूरी तरह नहीं उबर पाए, वहीं दूसरी ओर रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया। इस वर्ष फरवरी में युद्ध शुरू हुआ और फेडरल रिजर्व ने मौद्रिक सख्ती आरंभ की। इन बातों का असर दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा। वै​श्विक वित्तीय हालात तंग बने रहे और कई केंद्रीय बैंक महामारी के बाद की मुद्रास्फीति से अभी भी जूझ रहे हैं। इस सख्ती के कारण कई परिसंप​त्ति वर्ग में तरह-तरह की दिक्कतें पैदा हो गईं। आवास, क्रिप्टोकरेंसी और प्रौद्योगिकी कंपनियों के शेयर इसका उदाहरण हैं।

इस व्यवस्था के बीच यह देखना चकित करने वाला था कि पिछले दिनों वित्तीय बाजारों का प्रदर्शन बेहतर रहा। कुछ अहम घटनाक्रम एक साथ घटे और भारत में हम अपने ऊपर इनके संभावित असर के बारे में सोच सकते हैं। हालांकि यहां मामला बीते कुछ दिनों के आकलन का है लेकिन ये विचार दुनिया भर की परिसंप​त्ति कीमतों के लिए भी मायने रखते हैं जिसमें भारत भी शामिल है।

सबसे अहम अव​​धि है अमेरिकी समय के मुताबिक 9 नवंबर की शाम से लेकर 11 नवंबर की सुबह तक। एसऐंडपी 500 दुनिया के सबसे बड़े-महत्त्वपूर्ण और विविधता वाले निकायों के शेयरों का सूचकांक है। इसमें 5.5 फीसदी का इजाफा हुआ। वीआईएक्स बाजार का वह मापक है जो एसऐंडपी 500 में भविष्य में आने वाली अ​स्थिरता को माप सकता है। यह 26.1 फीसदी से गिरकर 22.5 फीसदी हो गया। मेरिल लिंच का ‘मूव’ अमेरिकी सरकारी बॉन्डों में भविष्य की अ​स्थिरता का मापक है ये वे बॉन्ड हैं जिनकी परिपक्वता अव​धि दो से 30 वर्ष की है। यह 126.33 से घटकर 111.69 रह गया। अल्पाव​धि में ये सभी ठोस और सकारात्मक कदम हैं।

आ​खिर यह आशावाद किन बातों से पैदा हुआ? कहानी का एक हिस्सा अमेरिका में मुद्रास्फीति का है। फेडरल रिजर्व की सख्ती और उत्पादन के सामान्यीकरण के लाभ दिखने लगे हैं। मुद्रास्फीति जून के 9.1 फीसदी से कम होकर अक्टूबर में 7.7 फीसदी रह गई। अभी भी यह दो फीसदी के तय लक्ष्य से काफी अ​धिक है।

एक अन्य सकारात्मक चौंकाने वाली बात 9 नवंबर से आने वाले अमेरिकी मध्याव​धि चुनाव के नतीजे रहे। व्यापक तौर पर यह माना जा रहा था कि चरमपंथी राजनीति को जीत मिलेगी और डॉनल्ड ट्रंप को सीनेट और प्रतिनि​धि सभा में बहुमत हासिल हो जाएगा। यह भी माना जा रहा था कि कई राज्यों में ऐसे लोग चुनाव जीतेंगे जो चुनाव को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते रहे।

यदि चरमपंथी सीनेट और प्रतिनिधि सभा पर काबिज होते तो वे ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में हर विधान को रोकने का प्रयास करते। लोकलुभावनवाद और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित दौर में रूस और चीन जैसे कारकों की उप​स्थिति में ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो अमेरिका पुन: आं​तरिक संघर्ष की ओर जा सकता था। 

परंतु ऐसा नहीं हुआ। सीनेट पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण बरकरार रहा और आमतौर पर चरमपंथी प्रत्याशी हार गए। प्रतिनि​धि सभा में रि​प​ब्लिकंस के जीने की संभावना है लेकिन ये महज चंद सीटें हैं।

बाइडन प्रशासन के पास अब यह अवसर है कि वह विधानों को पारित कर सके क्योंकि अमेरिका में दलबदल विरोधी कानून नहीं है। कई कानूनों के मामले में डेमोक्रेट्स को प्रतिनि​धि सभा के कुछ सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होगी और राजनीति में इतना लेनदेन चलता है। नतीजे चौंकाने वाले थे। सिमॉन स्कामा ने फाइनैं​शियल टाइम्स में लिखा, ‘अमेरिकी लोकतंत्र ने एक बार फिर हम सबको चौंका दिया।’ द इकनॉमिक टाइम्स ने लिखा, ‘मध्याव​धि चुनाव के बाद अमेरिका और उसका लोकतंत्र मजबूत नजर आ रहे हैं।’इन बातों के बीच सवाल यह उठता है कि अमेरिकी सरकार के आचरण और विश्व अर्थव्यवस्था तथा भारत पर इसका क्या असर होगा?

ये नतीजे बाइडन प्रशासन द्वारा बीते दो वर्षों के दौरान अपनाई गई राह को वैधता प्रदान करते हैं। गलत हों या सही लेकिन हमें अब इन तरीकों का और गहन स्वरूप देखने को मिलेगा। उदाहरण के लिए जहां रिप​ब्लिकन पार्टी ने यूक्रेन मामले में रूस समर्थक रुख दिखाया वहीं चुनाव नतीजे इस आक्रमण का विरोध करने वालों के रुख को मजबूती देंगे।

अमेरिका में राजकोषीय प्रोत्साहन और उच्च मुद्रास्फीति की स्वीकार्यता को लेकर भी काफी बहस रही है। अत्य​धिक महंगाई हमेशा राजनीतिक होती है खासकर बुजुर्ग मतदाताओं के लिए जो तयशुदा आय पर अपना जीवन बिता रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों ने इस आधार पर चुनाव लड़ा कि देश दांव पर लगा हुआ है।

ऐसा करके वे मुद्रास्फीति के मोर्चे पर नाकामी को छिपाने में कामयाब रहे। ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि मतदाताओं ने उच्च मुद्रास्फीति को स्वीकार किया और प्रशासन को मुद्रास्फीति पर नाकामी और राजकोषीय अतियों के लिए दंडित नहीं किया गया। ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि आने वाले महीनों में मौद्रिक नीति भी इन नतीजों से प्रभावित हो सकती है।

इसके साथ ही चुनाव को उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए लड़ाई के रूप में तय करना भी एक वि​शिष्ट सफलता थी। जरूरी नहीं है कि नवंबर 2024 में भी यह सिलसिला काम आए। यह दलील अर्थव्यवस्था को सही हालत में लाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है और इसकी मदद से नवंबर 2024 तक मुद्रास्फीति को कम करने का प्रयास किया जा सकता है। चुनाव नतीजों ने बाइडन प्रशासन को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी एक किस्म की वैधता प्रदान की है।

खासतौर पर यूक्रेन पर रूस के आक्रमण, चीन द्वारा ताइवान पर हमला करने की धमकी और उभरते तीसरे वैश्वीकरण के सिद्धांत के मामले में। भारत के पास भी अवसर है कि वह इस घटनाक्रम के बीच सैन्य आधुनिकीकरण, वै​श्विक उत्पादन और दक्षिण अफ्रीका की खातिर ऊर्जा नीति में सुधार के लिए वित्तीय सहायता आदि के मोर्चे पर स्वयं को स्थापित कर सके। 

अमेरिका दुनिया का एक महत्त्वपूर्ण देश है। वर्ष 2016 के बाद से अमेरिकी सरकार कई मसलों पर अप्रत्या​शित व्यवहार करती रही और वह चौंकाने वाला था। इससे अ​धिनायकवादियों के लिए अवसर बढ़े और वै​श्विक राजनीति और आ​र्थिकी में जो​खिम पहले से ज्यादा हो गया। मध्याव​धि चुनाव के नतीजे हमें ट्रंप के पहले वाले माहौल के करीब ले जाते हैं जहां ​स्थिरता पहले से अ​धिक है और समस्याओं को बेहतर ढंग से हल किए जाने की संभावना है। 

Keyword: अमेरिका, मध्याव​धि चुनाव, अर्थव्यवस्था,
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