बिजनेस स?टैंडर?ड - व्यापार के जरिये वृद्धि
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व्यापार के जरिये वृद्धि

बीएस संपादकीय /  November 23, 2022

ऑस्ट्रेलिया की संसद ने भारत के साथ आ​​र्थिक सहयोग एवं विकास समझौते (ईसीटीए) को मंजूरी दे दी है और इसके आगामी 1 जनवरी से लागू होने की उम्मीद है। इस घटनाक्रम को भारत के मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने की लंबे समय से लंबित प्रक्रिया में एक अहम कदम माना जा सकता है। ईसीटीए से ठीक पहले भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापक आ​र्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए थे।

भारत के तीसरे सबसे बड़े व्यापार साझेदार के साथ हुआ यह सौदा इस वर्ष के आरंभ में लागू हो गया। भारत ने इससे पहले 2011 में जापान के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में लंबे अंतराल के बाद हुए ये दोनों समझौते महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे भारत के रुख में एक अहम बदलाव को रेखांकित करते हैं।

नौ वर्ष के अंतराल के बाद यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते को लेकर वार्ता में कुछ प्रगति हुई है और भारत खाड़ी सहयोग परिषद के साथ भी ऐसा ही समझौता करना चाहता है। ऑस्ट्रेलिया के साथ ईसीटीए पर बातचीत मई 2011 में शुरू हुई थी लेकिन 2016 में नौ दौर के बाद यह वार्ता स्थगित हो गई।

ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौते की व्यापक रूपरेखा अ​धिक समायोजन वाले रुख को दर्शाती है। ऑस्ट्रेलिया 98 प्रतिशत कारोबारी वस्तुओं  पर सीमा शुल्क समाप्त कर देगा और अपनी टैरिफ लाइंस को पूरी तरह समाप्त कर देगा। भारत भी 40 फीसदी आयात टैरिफ को तत्काल समाप्त करेगा और 10 वर्ष में 70.3 फीसदी आयात शुल्क को समाप्त करेगा। दोहरे कराधान से बचने के समझौते को लेकर एक संबद्ध समझौता भी ऑस्ट्रेलिया में काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों को फायदा पहुंचाएगा।

भारतीय छात्रों और पेशवरों (योग ​शिक्षकों और खानसामों सहित) के लिए वीजा और यात्रा पहुंच आसान होने को एक बड़ी कामयाबी माना जाना चाहिए क्योंकि हाल के समय में वहां नस्लीय तनाव राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। यूएई के साथ समझौता भी ऐसा ही है जहां वह सीमा शुल्क समाप्त करने पर राजी हो गया है। भारत के निर्यात के मूल्य के मुताबिक यह करीब 90 फीसदी है।

उदारीकृत व्यापार समझौतों की दिशा में एक अहम बदलाव मौजूदा भूराजनीतिक दबावों तथा इस तथ्य की वजह से भी हो सकता है कि भारत ऐसे समय में अपेक्षाकृत तेज गति से​ विकसित होती अर्थव्यवस्था वाला देश हो सकता है जबकि प​श्चिम मंदी की ओर बढ़ रहा है। परंतु इसे लेकर भी कई सवाल उत्पन्न होते हैं।

प्रमुख चिंता यह है कि उदारीकृत व्यापार को लेकर किए जाने वाले ये समझौते भारतीय आ​र्थिक नीति में बढ़ते संरक्षणवाद की दिशा को लेकर किस तरह आगे बढ़ते हैं। 2017 से वि​भिन्न वस्तुओं के सीमा शुल्क में जो इजाफा हुआ है और मेक इन इंडिया से जुड़े वि​भिन्न क्षेत्रों में उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजनाओं को लेकर जिस तरह बात की गई है वह सब मुक्त व्यापार समझौतों में इजाफे की इस प्रक्रिया से एकदम विरोधाभासी है।

इससे जुड़ा हुआ एक प्रश्न यह है कि क्या भारत ए​शिया प्रशांत देशों के बीच होने वाली क्षेत्रीय व्यापक आ​र्थिक साझेदारी को लेकर अपना पुराना रुख बदलेगा। भारत ने 2019 में इससे दूरी बना ली थी। उस वक्त अनकही वजह यही थी कि चीन इस समूह में भागीदार है। लेकिन चूंकि चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है इसलिए व्यावहारिक बात यही है कि भारत आरसेप को लेकर अपना रुख बदले। आरसेप भारत के लिए बड़े आर्थिक लाभ ला सकता है।

आ​खिर में, और अ​धिक मुक्त व्यापार समझौतों को अंजाम देने की बात करें तो सरकार को वि​भिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय निवेश संरक्षण समझौतों की स्थगित प्रक्रिया को पूरा करने के बारे में भी सोचना चाहिए। ये समझौते विदेशी निवेश जुटाने की दृ​ष्टि से अहम हैं। आने वाले कठिन वर्षों में भारत उदारीकरण और नियम आधारित आर्थिक रिश्तों पर दांव लगा सकता है। 

Keyword: ऑस्ट्रेलिया की संसद, आ​​र्थिक सहयोग, भारत,
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