बिजनेस स?टैंडर?ड - बजट घाटे की कसौटी पर पुनर्विचार का समय
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बजट घाटे की कसौटी पर पुनर्विचार का समय

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  11 22, 2022

यह 1986 की बात है। मैंने एक आलेख लिखा, जिसमें बजट घाटे के विचार पर चर्चा की गई थी। कारण यही था, क्योंकि राजीव गांधी सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से उधारी लेकर वृद्धि के वित्तीय बंदोबस्त का विचार स्वीकार किया था। इसका मतलब था कि केंद्रीय बैंक को नोट छापने पड़ते। यह विचार एलके झा के माध्यम से आया था, जो भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी रहे और 1960 के दशक के अंत में आरबीआई गवर्नर का दायित्व भी उनके पास रहा। 

भारत और विदेश में तमाम अर्थशास्त्री इस रणनीति से जुड़े जोखिमों की ओर संकेत कर रहे थे। विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) इसे लेकर बहुत चिंतित था, जो कुछ समय पहले ही लातिन अमेरिकी ऋण संकट से सफलतापूर्वक निपटने की अपनी कामयाबी के खुमार में था। कुछ समय पहले ही उसने राजकोषीय घाटे के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन प्रतिशत के स्तर को तय किया था। मुद्रा कोष के हिसाब से यह घाटे का वांछित या वास्तव में पूर्णता से परिपूर्ण स्तर था।

मैंने लेख की शुरुआत इसी हैरानी के साथ की थी कि आखिर एक ही प्रकार का पैमाना सभी के लिए कैसे मुफीद हो सकता है। वैसे भी, सरकारें घाटे को यूं ही बेमतलब नहीं बढ़ातीं। वे तो कल्याणकारी योजनाओं और निवेश दोनों के लिए पैसों का इंतजाम करने की कोशिशों में ऐसा करती आई हैं।

अपने तर्कों में मैंने जनसंख्या के आकार को एक प्रासंगिक निर्धारक के रूप में पेश किया। इस कवायद में मैंने सुझाव दिया कि केवल जीडीपी का अनुपात ही घाटे पर दृष्टि डालने का उचित तरीका नहीं, बल्कि इसमें प्रति व्यक्ति पैमाने को भी शामिल किया जाए। मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि कुछ साल यही विचार कार्बन उत्सर्जन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। मुझे इसका कोई श्रेय नहीं, लेकिन प्रति व्यक्ति मापने का यही विचार किसी अन्य के मन में भी कौंधा था। 

बहरहाल, मेरे एक बहुत करीबी अर्थशास्त्री मित्र, जिन्होंने बाद में कई उल्लेखनीय पेशेवर उपलब्धियां अपने नाम कीं, ने फोन करके मुझे कहा कि मैं इस प्रकार की वाहियात बातें न लिखूं। उनकी नजर में मैं खुद को बेवकूफ बना रहा था। मैंने उनसे पूछा कि इस विचार में क्या खामी थी। उनके पास कोई कारगर जवाब नहीं था। हालांकि, यह बात अलग है कि बाद में उन्होंने प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वाले विचार का समर्थन किया। 

वैयक्तिक रूप मैं यही सोचता हूं कि हर किसी को मेरी दाद देनी चाहिए थी, लेकिन जैसा कि अखबार के आलेखों के साथ होता है तो यहां तक कि मैं भी जल्द ही भुला देता हूं। अब मैं सोचता हूं कि उस विचार को पुनर्जीवित करने का समय आ गया है। बुनियादी रूप से सवाल यही है कि सभी सर्वविदित कारणों के चलते यदि निवेश और कल्याणकारी व्यय के बीच संतुलन का पलड़ा निश्चित रूप से कल्याणकारी व्यय के पक्ष में झुके तो आप जनसंख्या के आकार को कैसे देखते हैं? आखिर, क्या पश्चिमी देशों की हालिया आय समर्थित योजनाएं देश में लोगों की संख्या पर आधारित नहीं थीं?

मैं एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं कह रहा हूं कि जीडीपी के अनुपात में घाटे वाली कसौटी के विचार को पूरी तरह तिलांजलि दे देनी चाहिए। मेरे कहने का यही आशय है कि केवल यही एक पहलू नहीं हो सकता। वास्तव में, कम जीडीपी के साथ जनसंख्या का आकार और अधिक प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि केवल करों के माध्यम से निवेश व्यय और कल्याणकारी खर्च की पूर्ति नहीं हो सकती। चूंकि मामला ऐसे खर्च का है तो कहीं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के झमेले में न फंस जाए, ऐसे में कोई मध्यमार्ग भी निकालना ही होगा। 

ऐसे किसी भी मध्यमार्ग के अभाव में सरकारों के स्तर पर न केवल निवेश व्यय, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च में निश्चित रूप से कटौती देखने को मिलेगी। हमने दोनों मोर्चों पर ऐसा घटित होते देखा है। यह छोटी आबादी के लिए चल सकता है। लेकिन बड़ी आबादी, 30 करोड़ से अधिक लोगों के लिए यह बहुत अव्यावहारिक होगा, क्योंकि यह लोकतांत्रिक रूप से या अन्यथा किसी प्रकार से चुनी हुई सरकारों की जिम्मेदारियों की पूरी तरह अवहेलना करता है। 

ऐसे में क्या बेहतर तरीका होगा? क्या सकल घरेलू उत्पाद और जनसंख्या के भारांश का औसत उपयुक्त होगा? क्या इस प्रकार का औसत प्राप्त करना संभव भी हो सकेगा? मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं कोई सांख्यिकीविद् नहीं हूं। लेकिन मैं सोचता हूं कि हमारे पास एक अवसर है कि हम 40 साल पहले किसी प्रकार तय करके हम पर थोप दिए गए पैमाने के बजाय घाटे की उचित कसौटी को तैयार करें। मेरे ख्याल से तीन प्रतिशत की कसौटी के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। यदि कोई आधार था तो मुझे बताएं, मैं इससे जुड़ी अपनी शिकायतें वापस ले लूंगा। 

बहरहाल, 40 वर्षों के अवलोकन के बाद मैं एक बात समझता हूं कि कि बजट घाटे के सुरक्षित स्तर का आकलन करने में केवल जीडीपी ही पर्याप्त मानक नहीं है। जनसंख्या को भी इस पद्धति में जोड़ना होगा। यह सामान्य समझ की बात है। आखिरकार, हमारे पास 15 करोड़ भूमिहीन श्रमिक हैं, जिनके पास कोई कौशल नहीं और उनके पोषण की स्थिति भी बेहद खराब है, जो कम से कम किसी भी तरह उपलब्ध कराना ही होगा। इस मामले में ‘मात्र जीडीपी’ वाली पद्धति खरी नहीं उतरती। 
Keyword: बजट घाटे, आरबीआई, अर्थशास्त्री,
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