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भारत के समक्ष मौजूद है एक सीमित अवसर

नीलकंठ मिश्र /  11 22, 2022

थाईलैंड और चीन के समक्ष यह खतरा है कि वे कहीं समृद्ध होने के पहले ही बुजुर्ग न हो जाएं। भारत को इस ​स्थिति से बचने के लिए 8-9 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल करनी होगी। बता रहे हैं नीलकंठ मिश्र

ए​शिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं उम्रदराज हो रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दुनिया में औद्योगिक कर्मियों की कमी हो जाएगी? क्या बचत का स्तर भी कम होगा जिसके बारे में लोग मानते रहे हैं कि हाल के दशकों में दुनिया भर में रिकॉर्ड कम ब्याज दर के लिए यही कारण उत्तरदायी रहा है? क्रेडिट सुइस के 28 शोधकर्ताओं ने ए​शिया की 10 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं चीन, भारत, इंडोने​शिया, जापान, फिलिपींस, वियतनाम, थाईलैंड, कोरिया, मले​शिया और ताइवान का अध्ययन किया।

2010 से 2019 के बीच वै​श्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान करीब 50 फीसदी था, वस्तु निर्यात में 60 फीसदी और ये बाकी दुनिया में पांच लाख करोड़ रुपये की रा​शि भेजते थे। हमने 6,000 से अ​धिक लोगों पर सर्वेक्षण, द्वितीयक शोध और विश्लेषण किया ताकि इन प्रश्नों के जवाब तलाश कर सकें। इस स्तंभ में हम बड़े नतीजों में से सबसे पहले और उसमें से भारत के लिए निकले सबक को देखेंगे: ए-10 में जनांकीय परिवर्तन न केवल आर्थिक बदलाव से तेज है ब​ल्कि उसकी गति लगातार बढ़ रही है। 

देशों की समृद्धि के साथ ही आबादी में वृद्धि का धीमा पड़ना और औसत आयु का बढ़ना स्वाभाविक है। महिलाओं के लिए बेहतर ​शिक्षा श्रम श​क्ति में उनकी अच्छी भागीदारी और बढ़ता हुआ शहरीकरण आदि सभी बढ़ती राष्ट्रीय आय तथा घटती प्रजनन दर से ताल्लुक रखते हैं। उदाहरण के लिए ग्रामीण इलाकों में बच्चे बहुत कम उम्र में आ​र्थिक योगदान देना शुरू कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर पशुओं को चराना या खेती में मदद करना। शहरी इलाकों में बच्चों के लिए रोजगार उपलब्ध नहीं होते।

अचल संप​त्ति की महंगाई का असर ​शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। शहरों में बच्चों को पालने की लागत अ​धिक होती है। आय में बढ़ोतरी के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं में भी सुधार होता है जिससे जीवन संभाव्यता बढ़ती है।

परंतु उर्वरता और आय को प्रभावित करने वाले कारक उन्हें अलग-अलग गतियों से प्रभावित करते हैं। ए-10 अर्थव्यवस्थाओं का आकार समान आय स्तर पर यूरोपीय संघ तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था के विकास की तुलना में दो से चार गुना तेजी से बढ़ा। ए-10 देशों ने कई दशक तक उच्च आ​र्थिक वृद्धि बरकरार रखी और 3000 डॉलर प्रति व्यक्ति जीडीपी को 15,000 डॉलर प्रति व्य​क्ति डॉलर तक पहुंचने में 20 से 45 वर्ष का समय लगा।

भारत को ऐसा करने में 30 वर्ष का समय लगेगा जबकि विकसित बाजारों ने ऐसा 80 से 110 वर्षों में किया। हालांकि यह अभी भी जनांकीय बदलाव की तुलना में धीमी गति वाला है। अ​धिकांश ए-10 देश कम प्रतिव्य​क्ति आय के स्तर पर ही कम उर्वरता स्तर पर पहुंचे। अमेरिका में कुल उर्वरता दल यानी टीएफआर (एक महिला द्वारा अपने जीवन में पैदा किए गए बच्चे) उस समय 2.5 से कम हो गई जब उसकी प्रतिव्य​क्ति जीडीपी 24,000 डॉलर थी जबकि ब्रिटेन में जीडीपी के 17,000 डॉलर रहते ऐसा हुआ।

परंतु ए-10 देशों ने 3,000 से 7,000 डॉलर की प्रति व्य​क्ति जीडीपी के स्तर पर ही ऐसा कर लिया। वे तेजी से उम्रदराज हो रहे हैं: अमेरिका और यूरोपीय संघ में जहां औसत आयु आधी सदी में 30 से बढ़कर 40 वर्ष हुई वहीं द​क्षिण कोरिया में ऐसा केवल 17 वर्ष में और जापान, चीन तथा थाईलैंड में केवल 22-24 वर्ष में हो गया।

जनांकीय बदलाव की गति पूरी दुनिया में तेज हुई है। उर्वरता को प्रभावित करने वाले कारक श्रेष्ठ आ​र्थिक व्यवहार की तुलना में कहीं अ​धिक तेजी से प्रसारित हो रहे हैं। 19वीं सदी में मृत्यु दर में सार्थक गिरावट करीब एक सदी में आई। अगली बार ऐसा केवल 60 वर्ष में और फिर महज 35 वर्ष में हो गया। जन्मदर में गिरावट की गति और तेज रही। 19वीं सदी की पहली छमाही में जो गिरावट 100 वर्ष में आई, वह 20वीं सदी की दूसरी छमाही में महज 10 वर्ष में आ गई। 

इससे दो चुनौतियां तैयार होती हैं: धीमी वृद्धि और समय से पहले उम्रदराज होती आबादी। आ​खिरकार जनांकिक ने आर्थिक विकास को भी प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए घटती टीएफआर वृद्धि की मदद करती है क्योंकि आ​र्थिक रूप से उत्पादक कार्यों के लिए अ​धिक समय मिलता है। साथ ही उन्हें उत्पादित आय की खपत का भी अवसर मिलता है। कम संतानों वाले माता-पिता उनके भौतिक और मानसिक विकास में अ​धिक मददगार साबित हो सकते हैं।

बहरहाल अर्थव्यवस्था के उम्रदराज होने के साथ ही कर्मचारियों की तादाद में कमी आती है और बुजुर्गों की देखभाल के लिए और अधिक कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। समेकित मांग के वाहक मसलन आवास और बुनियादी ढांचा आदि में भी धीमापन आता है।

वि​भिन्न देशों को एक खास स्तर की संपदा तैयार करनी होती है ताकि आबादी के उम्रदराज हो जाने के बाद भी एक खास किस्म का जीवन स्तर बरकरार रखा जा सके। इसके लिए जरूरी होने पर श्रमिकों और प्रतिभाओं को आयात भी किया जा सकता है जैसा कि यूरोपीय देश कर रहे हैं। इस संप​त्ति से युवाओं पर बोझ कम होता है।

अगर सेवानिवृ​त्ति के फंड अपर्याप्त हों तो उन पर अत्य​धिक कर लग सकता है ताकि बुजुर्ग आबादी का ध्यान रखा जा सके। ए-10 अर्थव्यवस्थाओं में से कई आयु बनाम प्रति व्य​क्ति संप​त्ति के मोर्चे पर पीछे हैं, हालांकि इसमें काफी विविधता है। जापान और कोरिया में जनांकीय बदलाव तेज हो रहा है जबकि इंडोने​शिया और फिलिपींस में इसमें कमी आ रही है। चीन और थाईलैंड पर यह खतरा मंडरा रहा है कि वे संपन्न होने के पहले ही उम्रदराज न हो जाएं। भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह अपनी बढ़ती श्रम श​क्ति को उत्पादक ढंग से काम दिला सके।

चीन और थाईलैंड में माध्य उम्र अ​धिक है और वहां प्रति व्य​क्ति संप​त्ति पूर्वी यूरोप के बाहर सभी देशों में कम है। जापान और द​​क्षिण कोरिया में जन्म के मामले तेजी से घटे हैं क्योंकि वहां प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की तादाद में तेजी से कमी आ रही है। 

भारत की टीएफआर जहां घटकर 2.1 रह गई है, वहीं जिस स्तर पर आबादी में ​स्थिरता आती है उस पर आबादी कई वर्षों तक बढ़ती रह सकती है। टीएफआर के 2.1 के नीचे आने के बाद भी आबादी दो से तीन दशक तक बढ़ती रह सकती है। परंतु 2053 तक इस वृद्धि की गति एक बड़ा अंतर पैदा कर देगी। यही वह सन है जब भारत की औसत आयु 40 वर्ष पार कर जाने का अनुमान है। 

डॉलर के संदर्भ में 7 फीसदी की औसत वृद्धि के साथ प्रति व्य​क्ति जीडीपी 2053 में भी 20,000 डॉलर से कम रहेगी। परंतु 8 फीसदी वृद्धि के साथ यह 25,000 डॉलर और 9 फीसदी के साथ 33,000 डॉलर तक पहुंच सकती है। एक मध्य आय वाले देश तथा समृद्ध देश में यही अंतर होगा और केंद्र और राज्य सरकार जब देश की आजादी की सौवीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रही होंगी तब उन्हें इस बात को ध्यान में रखना होगा।

(लेखक एपैक स्ट्रैटजी, क्रेडिट सुइस के सह-प्रमुख हैं) 

Keyword: थाईलैंड, चीन, ए​शिया, अर्थव्यवस्थाएं,
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