बिजनेस स?टैंडर?ड - पेंशन की राजनीति
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, November 27, 2022 10:03 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

पेंशन की राजनीति

बीएस संपादकीय /  11 22, 2022

गत सप्ताह पंजाब भी छत्तीसगढ़, राजस्थान और झारखंड की तरह उन राज्यों में शामिल हो गया जिन्होंने राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) को त्यागकर पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को बहाल करने की बात कही है। तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश के बारे में भी सूचना है कि वे भी ऐसा ही करने का विचार कर रहे हैं।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव लड़ रही कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने वादा किया है कि अगर वे सत्ता में आती हैं तो पुरानी पेंशन योजना को वापस लाएंगी। सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों द्वारा एक रैंक एक पेंशन (ओआरओपी) की मांग की तरह ही सरकारी कर्मचारी लंबे समय से पुरानी पेंशन की वापसी की मांग कर रहे हैं। ये कर्मचारी एनपीएस की तुलना में स्पष्ट लाभ वाली पुरानी योजना को तरजीह दे रहे हैं। 

ओआरओपी के रूप में भाजपा ने एक अहम चुनावी वादा 2014 में सत्ता में आने के एक साल के भीतर लागू किया था, ठीक उसी तर्ज पर ओपीएस की वापसी दीर्घाव​धि में राज्यों के लिए स्थायित्व वाली साबित नहीं होगी। हकीकत में इसी वजह के चलते प​श्चिम बंगाल को छोड़ देश के शेष राज्यों ने एनपीएस को अपना लिया था और 1 अप्रैल, 2004 के बाद सेवा में आने वाले कर्मचारियों के लिए उसे अनिवार्य कर दिया गया।

दोनों योजनाओं के कर लाभ हैं लेकिन ओपीएस में मुद्रास्फीति से संबद्ध महंगाई भत्ते की व्यवस्था है जो हर छह महीने पर दिया जाता है। सबसे अहम अंतर यह है कि सरकार ओपीएस भुगतान की पूरी लागत वहन करती है जबकि एनपीएस के तहत कर्मचारी अपने वेतन और महंगाई भत्ते का 10 फीसदी हिस्सा योगदान के रूप में देता है जबकि सरकार 14 फीसदी योगदान करती है। इस रा​शि को पेंशन फंड नियामक एवं विकास प्रा​धिकरण द्वारा स्वीकृत वि​भिन्न योजनाओं में निवेश किया जाता है।

इसके अलावा इस रा​​शि को इ​क्विटी और डेट बाजार में भी निवेश किया जाता है। यह सब दिशानिर्देशों के अनुरूप और कर्मचारी के चयन के मुताबिक किया जाता है। ऐसे में एनपीएस राज्यों के वित्तीय बोझ को काफी कम करती है। यह भी एक प्रमुख वजह है जिसके चलते संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने पिछली सरकार द्वारा पारित कानून को न केवल आगे बढ़ाया ब​ल्कि उसका प्रचार प्रसार भी किया।

नि:शुल्क उपहारों की तरह ओपीएस भी एक गैरजवाबदेह लोकलुभावन कदम होगा, वह भी ऐसे समय  जबकि अधिकांश राज्यों का राजस्व दबाव में है। भारी कर्ज में डूबा हुआ पंजाब इसका अच्छा उदाहरण है। चालू वित्त वर्ष के लिए उसका अनुमानित पेंशन आवंटन राज्य के कुल कर राजस्व का करीब एक तिहाई है। अगर वेतन और ब्याज भुगतान को शामिल कर दिया जाए तो देनदारियां राज्य के कर राजस्व का करीब 46 फीसदी हो जाएंगी।

गुजरात की वित्तीय ​स्थिति पंजाब से बेहतर है लेकिन पेंशन और वेतन भत्ते उसके कर राजस्व का करीब 72 फीसदी हिस्सा ले जाते हैं। शायद पंजाब की खस्ता वित्तीय हालत के कारण ही पुरानी पेंशन योजना को अपनाने की घोषणा तो कर दी गई है लेकिन इसकी तारीख नहीं बताई गई है।

यह भी संभव है कि कई अन्य राज्य जल्दी ही ओपीएस अपनाने की मांग शुरू करें। दरअसल नैशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम्स इसके लिए सक्रिय अ​भियान चला रहा है और उसने हर राज्य में अपनी शाखाएं बना रखी हैं। इन बातों से यही संकेत मिलता है कि राज्य सरकारें और पेंशन फंड नियामक एवं विकास प्रा​धिकरण कर्मचारियों के बीच एनपीएस को सही ढंग से व्याख्यायित कर पाने में नाकाम रहा है। अंतत: इसका बोझ देश के सीमित संख्या में मौजूद कर दाताओं को ही उठाना पड़ेगा।

Keyword: छत्तीसगढ़, राजस्थान और झारखंड, पेंशन की राजनीति,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या नियमों में संशोधन से बीमा क्षेत्र में बढ़ेगा निवेश
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.