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आर्थिक आधार पर आरक्षण के गहरे निहितार्थ

आदिति फडणीस /  11 18, 2022

यह 2019 की बात है। द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) की सांसद कनिमोझी ने संसद में एक भावोत्तेजक भाषण दिया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाले संविधान के 103वें संशोधन से जुड़े विधेयक पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था कि यह कदम आरक्षण के मूल उद्देश्य पर प्रहार करेगा। 

उन्होंने कहा, ‘इसका आर्थिक सरोकार नहीं है। उन्हें (दलित) शिक्षा, रोजगार और शासन से जुड़े तंत्र का हिस्सा बनने से इसलिए वंचित नहीं रखा गया कि वे गरीब थे। इसकी वजह उनकी जाति थी...यदि आप दलित, या ओबीसी हो तो आप अभी भी भेदभाव झेल रहे हो। आप अपना धर्म-पंथ बदल सकते हैं। आप अपना आर्थिक दर्जा बदल सकते हैं, लेकिन आप अपनी जाति नहीं बदल सकते।’

वहीं सरकार ने यह कहते हुए संशोधन को जायज ठहराया कि इससे वे लोग लाभान्वित होंगे, जो अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को पहले से ही प्रदान किए गए आरक्षण का लाभ नहीं उठा सकते। सरकार ने उच्च जाति वर्ग के उन लोगों को ईडब्ल्यूएस के रूप में परिभाषित किया, जिनकी वार्षिक पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से कम हो या जिनके पास पांच एकड़ से कम कृषि भूमि हो। 

यह नया कोटा सभी सरकारी नौकरियों और निजी एवं सरकारी वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में लागू है। हालांकि, अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों को इस आरक्षण से अलग रखा गया है। कांग्रेस के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सहित कुछ अन्य पार्टियों ने इस मसले पर सरकार का समर्थन किया। लेकिन उच्चतम न्यायालय में इस संशोधन के विरोध में तमाम याचिकाएं दाखिल हुईं। याचियों ने दलील दी कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन के बजाय केवल आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर सीटें आरक्षित करता है। 

मूल ढांचे से आशय संविधान के उन आधारभूत पहलुओं से है, जिन्हें न तो हटाया जा सकता है और न ही उनमें बदलाव किया जा सकता है। यहां तक कि संविधान संशोधन के माध्यम से भी नहीं। वहीं, उच्चतम न्यायालय ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। इस मुद्दे पर भाजपा की उपाध्यक्ष उमा भारती ने ट्वीट में लिखा, ‘सभी गरीब लोगों की एक ही जाति होती है कि वे गरीब हैं। यह आरक्षण देश में एकता का भाव बढ़ाएगा। मेरी अपील है कि दुनिया में सभी जरूरतमंद लोग एकजुट होकर अपने बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करें।’ 

दूसरी ओर तमिलनाडु इस निर्णय की समीक्षा का दांव चलेगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि यह फैसला ‘सामाजिक न्याय के शताब्दी भर लंबे संघर्ष’ के लिए झटका है। उन्होंने आह्वान किया, ‘समान विचारों वाले सभी सियासी दल ईडब्ल्यूएस के नाम पर सामाजिक अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर इस संघर्ष को आगे बढ़ाएं।’ 

हालांकि यह राह आसान नहीं रहने वाली। एमके स्टालिन के विरुद्ध सबसे मुखर आवाज तमिलनाडु से ही उठी। भाजपा अखिल भारतीय महिला मोर्चा की अध्यक्ष वनती श्रीनिवासन ने कहा, ‘ब्राह्मण समुदाय को निशाना बनाने से जुड़े अपने नफरती अभियान में द्रमुक करीब 60 समुदायों को बलि का बकरा बनाने पर आमादा है। ईडब्ल्यूएस आरक्षण से केवल ब्राह्मणों को ही लाभ नही पहुंचेगा। तमिलनाडु में ही वेल्लालर, मुदलियार, रेड्डियार और नायडू सहित 60 से अधिक समुदाय इस आरक्षण के दायरे में आएंगे।’ 

बात केवल तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में सामान्य या खुली श्रेणी के अंतर्गत करीब 97 जातियां और सामाजिक समूह आते हैं। इनमें मराठा, ब्राह्मण, सारस्वत, कायस्थ, चंद्रसेनिया कायस्थ प्रभु (सीकेपी) के साथ ही मुस्लिम, ईसाई और लिंगायत समुदाय की उप-जातियां शामिल हैं। भाजपा नेता और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, ‘उच्चतम न्यायालय के आदेश के आलोक में हम मराठा आरक्षण को लेकर अपने पक्ष की संभावनाएं तलाशेंगे। जब तक मराठा आरक्षण बहाल नहीं होता, तब तक मराठा समुदाय के आर्थिक रूप से पिछड़े लोग ईडब्ल्यूएस कोटे के माध्यम से आरक्षण का लाभ उठाएंगे।’ 

ईडब्ल्यूएस से जुड़े फैसले के कुछ अन्य राज्यों में भी राजनीतिक निहितार्थ होंगे। हरियाणा में 2019 में पारित हुए एक कानून में इसी सिद्धांत को अपनाया गया कि नौकरियों में आरक्षण सामाजिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के साथ ही गरीबों को भी मिले। इस प्रकार एमएल खट्टर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने जाट और जट सिख, रोड़, बिश्नोई, त्यागी और मुल्ला जाट/मुस्लिम जाट, जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण दिया गया है, वे तब तक ईडब्ल्यूएस का भी लाभ उठाएंगे, जब तक कि अदालत में उनके ओबीसी दर्जे से जुड़े मामले का फैसला नहीं हो जाता। 

इस प्रकरण ने दलित और ओबीसी अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को भी उद्वेलित कर दिया है, जिन्हें उच्चतम न्यायालय का निर्णय रास नहीं आ रहा। नैशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित ऑर्गेनाइजेशंस (नैक्डोर) के चेयरमैन अशोक भारती ने कहा, ‘सभी लोगों के बीच गरीबी को दूर करने के लिए व्यापक रूप से कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, लेकिन आरक्षण कभी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम न रहा और न हो सकता है।’ 

अपने पक्ष को उन्होंने विस्तार से समझाया, ‘हमारा संविधान और परंपराएं यह स्वीकार करती हैं कि भारतीय समाज में जातियों और वर्गों का बड़े पैमाने पर बहिष्कार हुआ है। और इसका आधार गरीबी नहीं था। भारत लंबे समय से गरीब रहा है। परंतु अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग का बहिष्कार गरीबी के आधार पर नहीं था। वास्तविकता तो यही है कि भारत में गरीबी को सम्मान दिया गया है। ऐसे में कोई भी अनुपूरक-प्रतिपूरक कार्यक्रम कभी गरीबी पर आधारित नहीं हो सकता।’ 

भारती के अनुसार ईडब्ल्यूएस आरक्षण से जितना भला नहीं होगा, उससे कहीं ज्यादा इससे क्षति पहुंचेगी। उनका मानना है, ‘यह (आदेश) भारतीय समाज को दो भागों में विभक्त कर देगा। इसके संकेत पहले से ही दिखने भी लगे हैं, जो भविष्य में और ज्यादा प्रभावी होंगे। इससे सवर्ण और गैर-सवर्ण जातियों में सामाजिक विभाजन और गहरा हो जाएगा। ईडब्ल्यूएस आदेश बात तो गरीब की करता है, लेकिन यह सभी जातियों, समुदायों और वर्गों के गरीबों की सुध नहीं लेता।’ 

हालांकि, वह भारतीय राजनीति या समाज पर ईडब्ल्यूएस आरक्षण के तात्कालिक प्रभाव नहीं देखते, लेकिन इसके दूरगामी परिणामों के संकेत देते हैं। वह कहते हैं, ’50 साल या उसके बाद के दौर में यह सवर्णों को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाएगा, क्योंकि धीरे-धीरे वंचित वर्ग, जो पहले से ही उनके प्रति द्वेष-दुराव रखता है, वह और मुखर हो जाएगा।’ 

Keyword: आर्थिक, आरक्षण, सरकार द्रमुक, सांसद कनिमोझी,,
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