बिजनेस स?टैंडर?ड - कॉप दिखावे और निरर्थक वक्तव्यों का मंच बना
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, November 27, 2022 11:11 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कॉप दिखावे और निरर्थक वक्तव्यों का मंच बना

र​थिन रॉय /  11 17, 2022

कार्बनीकरण खपत से संचालित है। हम जितनी अ​धिक खपत करेंगे, उतना अ​धिक कार्बन उत्सर्जित होगा। लेकिन कॉप सम्मेलन का खाका  ही ऐसा है कि वे खपत की अनदेखी करते हैं। बता रहे हैं र​थिन रॉय

क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज (कॉप) एक मायने में कभी निराश नहीं करती। वहां वै​श्विक नेताओं के जुबानी जमाखर्च और कार्यकर्ताओं के दिखावे का ऐसा मंच सजता है जो उस खेल को ढक लेता है जो दरअसल एक ऐसी आ​र्थिक व्यवस्था का बचाव करता है जो मौजूदा विश्व व्यवस्था और श​क्ति संतुलन को कायम रखने के लिए जरूरी है। 

कार्बनीकरण खपत से संचालित है। हम जितनी अ​धिक खपत करते हैं, उतना ज्यादा कार्बन उत्सर्जित होता है। इस समस्या से निपटने के दो तरीके हैं। पहला है समग्र खपत को ऐसे स्तर पर रोकना जो अ​धिकतम कार्बन बजट के अनुरूप हो। दूसरा है तकनीक का इस्तेमाल करके कम कार्बन उत्सर्जन करना ताकि अधिकतम कार्बन बजट की सीमा का अतिक्रमण न हो।

औद्योगिक क्रांति के समय से ही कार्बनीकरण खपत में भारी असमानता से संचालित रहा है और इसके चलते अत्यधिक उत्पादन होता है जो जनता के लिए बरबादी का ही सबब बनता है। आज भी हालात ऐसे ही हैं। पर्याप्त भोजन, आश्रय स्थलों और ऊर्जा की उपलब्धता के बावजूद लोग भूखे हैं, बेघर हैं और ऊर्जा के बिना जीवन बिता रहे हैं जबकि किसी को इनके अभाव में नहीं रहना चाहिए।

असल समस्या असमान वितरण की है। अमीर भौगोलिक इलाके और अमीर व्य​क्ति हर जगह भारी खपत से मोटे हो रहे हैं, आलीशान माहौल में जी रहे हैं और वे वातानुकूलित जीवन जी रहे हैं जबकि गरीब भूखे हैं, वे झु​ग्गियों में रहते हैं और उनके पास ईंधन और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। ऐसे में इस समस्या का हल वास्तव में खपत में असमानता को कम करना है। परंतु कॉप में अथवा जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाले अन्य कार्यों के दौरान इसमें रुचि नहीं ली जाती है। यही कारण है कि इस समस्या को लेकर शोध कार्यों की फंडिंग में कोई रुचि नहीं ली जा रही है।

ऐसा इसलिए है कि यह अमीर देशों या गरीब इलाकों में रहने वाले अमीरों की समस्या है ही नहीं। अमीर विश्व का मार्ग चुना जा चुका है और गरीब विश्व उसका अनुसरण करने को विवश है। जलवायु परिवर्तन, जलवायु वित्त और जलवायु से जुड़ी हर चर्चा इसी रुख पर आयोजित होती है: पहला खपत की अनदेखी, दूसरा तकनीकी रूप से कम कार्बन के इस्तेमाल वाले तरीकों से ऊर्जा खपत पर ध्यान केंद्रित करना और खपत पर बात न करना और तीसरा नवीकरणीय ऊर्जा मुहैया कराने वाली आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर समता आदि के प्रभाव पर चर्चा न करना। कुल मिलाकर इस बारे में सवाल न करना कि ऊर्जा का इस्तेमाल कहां होगा और यह कैसे उत्पन्न हो रही है।

इसका अर्थ यही हुआ कि कॉप तथा जलवायु को लेकर होने वाली अन्य बातचीत में उन तरीकों का समर्थन होता है जो उपरोक्त मार्ग के पक्ष में होते हैं। भारतीय शोधकर्ताओं तेजल कानिटकर और अखिल मैत्री ने जलवायु परिवर्तन पर बने अंतरसरकारी पैनलों में से अ​धिकांश के भविष्य के परिदृश्य का अध्ययन किया जिनमें पेरिस समझौते के अनुसार ताप वृद्धि के लक्ष्यों को हासिल करने की बात शामिल थी। 

उन्होंने पाया कि सभी प्रस्तुत परिदृश्यों में बढ़ती असमानता और गरीब देशों में ऊर्जा खपत में गिरावट या बहुत कम बढ़ोतरी की बात शामिल थी लेकिन अमीर देशों में खपत और प्रति व्य​क्ति आय का स्तर बहुत ऊंचा रहने की बात कही गई। अमीर देशों को विशुद्ध शून्य स्तर पर भी वैश्विक कार्बन बजट का काफी हिस्सा मिलेगा। अमीर मुल्क वादे तोड़ते रहेंगे और जब सौदेबाजी में असहज होंगे तो तमाम वादे करेंगे। ऐसे में यूक्रेन संकट को लेकर यूरोप की प्रतिक्रिया शुद्ध शून्य उत्सर्जन के अनुरूप नहीं है। ब्रिटेन और जर्मनी ने हाल ही में जीवाश्म ईंधन स​ब्सिडी में इजाफा किया है।

जलवायु या समता को लेकर होने वाले तमाम शोध विकसित देशों में हुए क्योंकि जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाले शोध का अ​धिकांश फंड अमीर देशों के संस्थानों को जाता है। अफ्रीका में सन 1990 से 2020 के बीच जलवायु परिवर्तन संबंधी शोध पर 45.4 करोड़ डॉलर की रा​शि खर्च हुई। इसमें से 14 फीसदी रा​शि ही अफ्रीका में व्यय हुई जबकि बाकी पैसा अमेरिका और यूरोप में खर्च हुआ। 

अमीर देशों में जलवायु परिवर्तन को लेकर लिखे जाने वाले शोध ब्लॉग और आलेखों में समता शब्द का इस्तेमाल शायद ही होता है। जलवायु न्याय या बदलाव जैसे शब्दों पर विस्तार से बात होती है और यहां बात केवल उन लोगों और क्षेत्रों की मदद करने की होती है जो तकनीकी बदलाव से प्रभावित होते हैं। वे भविष्य के विशुद्ध शून्य मार्ग की असमान प्रकृति का जिक्र नहीं करते। गरीबों के जलवायु परिवर्तन से सबसे अ​धिक प्रभावित होने की बात इस अनुमान पर आधारित है कि गरीब आगे भी गरीब बने रहेंगे। ऐसे में गरीबी का उन्मूलन समताकारी होगा और इस प्रकार यह जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रभावी अनुकूलन होगा लेकिन उस पर चर्चा नहीं हो रही है। ब​ल्कि बीते वर्ष मेरे जीवन में पहली बार वै​श्विक गरीबी बढ़ी है। 

इसके बाद कई चीजें होती हैं। जीवाश्म ईंधन स​ब्सिडी की बात, कोयले के बारे में भाषण, जलवायु वित्त के क्षेत्र में मुनाफे और आकार की बात आदि और इस दौरान असमानता के प्रभाव, उत्सर्जन में कमी को लेकर चर्चा और शुद्ध शून्य आदि के बारे में कोई बात नहीं होती। उन आवाजों को खामोश कर दिया जाता है जो यह पूछती हैं कि गरीब देशों में कोबाल्ट और लि​थियम का उत्खनन क्यों किया जा रहा है जबकि उनकी मदद से बिजली की कारों को चलाने के लिए जो बैटरी बनती है वह अमीर देशों में इस्तेमाल होती हैं। यह भी कि ऐसे उत्खनन का आने वाले समय में क्या असर हो सकता है? 

कॉप का डिजाइन इस प्रकार तैयार किया गया है कि वे खपत की अनदेखी करती हैं। इसलिए समता पर भी उनकी नजर नहीं जाती। इस बात को अ​धिकांश शोधों से महसूस किया जा सकता है। जलवायु संकट संसाधनों तथा श​क्ति संतुलन के बारे में असहज करने वाले सवाल पैदा करता है जबकि अमीर देश ऐसे सवाल नहीं उठाना चाहते हैं।  जब तक सब नहीं बदलता है तब तक कॉप ऐसी जगह बनी रहेगी जहां वै​श्विक नेता बड़ी-बड़ी बातें भर करते हैं। इतिहास शायद इसे हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में दर्ज करेगा। 

Keyword: कॉप27, जलवायु परिवर्तन, कार्बनीकरण, विकसित देश,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या नियमों में संशोधन से बीमा क्षेत्र में बढ़ेगा निवेश
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.