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कठिन होता राजकोषीय प्रबंधन

बीएस संपादकीय /  11 17, 2022

भारत जैसे देश में सरकार से अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि सबकुछ वही करेगी। चुनावी राजनीति के दबाव को देखते हुए केंद्र और राज्य दोनों जगह की सरकारें लोकप्रिय दबावों के आगे प्राय: झुक जाती हैं और अपने हस्तक्षेप का आकार और दायरा बढ़ा देती हैं। इसके परिणामस्वरूप सरकारी वित्त की ​स्थिति और व्यय की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।

यह बात ध्यान देने लायक है कि महामारी के पहले भी भारत का आम सरकारी बजट घाटा समतुल्य देशों की तुलना में काफी ऊंचे स्तर पर था और वह घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा था। यकीनन महामारी ने हालात और खराब किए और अगर इस दिशा में लगातार ठोस प्रयत्न किए जाएं तो भी हालात को ठीक होने में कई वर्ष का समय लगेगा। 

कुछ हालिया घटनाएं इस बारे में व्यापक समझ पैदा करती हैं कि हालात किस दिशा में जा रहे हैं। जैसा कि इस समाचार पत्र ने हाल ही में प्रका​शित किया था, केंद्र सरकार ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए 25,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रा​शि आवंटित कर सकती है। यदि ऐसा हुआ तो इस वर्ष के लिए कुल आवंटन एक लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर जाएगा। इस योजना के अंतर्गत काम की लगातार मांग दर्शाती है कि अर्थव्यवस्था पर्याप्त रोजगार नहीं तैयार कर पा रही है।

यह बात भी ध्यान देने लायक है कि शहरी इलाकों में भी ऐसे ही कार्यक्रम की मांग उठ रही है और कुछ राज्य सरकारों ने इस दिशा में कदम भी बढ़ा दिया है। केंद्र सरकार ने हाल ही में नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण कार्यक्रम को दिसंबर तक तीन महीने के ​लिए आगे बढ़ा दिया है। ऐसा करने से 44,000 करोड़ रुपये से अ​धिक का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

इसके परिणामस्वरूप कुल खाद्य स​ब्सिडी जिसके बजट में 2.07 लाख करोड़ रुपये रहने की बात कही गई थी उसके अब बढ़कर 3.38 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। यह कहा जा सकता है कि चूंकि अर्थव्यवस्था पूरी तरह खुली हुई है तो ऐसे में इनमें से कुछ प्रकार के व्यय से बचा जा सकता था।

बहरहाल बात केवल इतनी ही नहीं है। सरकार कई क्षेत्रों में काफी कुछ कर रही है। उदाहरण के लिए सरकार से उम्मीद है कि वह किसानों को मूल्य समर्थन मुहैया कराए और उसने आय समर्थन देने का निर्णय भी लिया है। सरकार ने आबादी के एक तबके के लिए आवास बनाने तथा स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराने की जिम्मेदारी ली है।

अ​धिकांश राज्य सरकारों नि:शुल्क या भारी सब्सिडी पर बिजली उपलब्ध कराती हैं। इसके चलते राज्यों के बिजली बोर्ड घाटे में चल रहे हैं। इन व्ययों में से कुछ को उचित ठहराया जा सकता है और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गरीबों की मदद करे। लेकिन ऐसी योजनाएं बेहतर ढंग से ल​क्षित होनी चाहिए।

परंतु सरकारी कार्यक्रम केवल गरीबों या समाज के एक खास तबके की सहायता करने तक सीमित नहीं हैं। उदाहरण के लिए सरकार अब अपनी महत्त्वाकांक्षी उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना की मदद से विनिर्माण क्षेत्र की मदद कर रही है और उसे स​ब्सिडी प्रदान कर रही है। इसके अलावा सरकार न केवल बिजली से चलने वाले वाहनों को अपनाने वालों की मदद कर रही है ब​ल्कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के असर को भी कई तरीकों से कम करने का प्रयास कर रही है।

कुछ राज्य सरकारें पेंशन सुधारों को वापस लेकर पुरानी पेंशन योजना की वापसी कर रही हैं जिससे भविष्य में उन पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। समय के साथ सरकार की जिम्मेदारी में बढ़ोतरी के चलते राजकोषीय प्रबंधन कठिन होगा और यह बात न केवल वृद्धि के लिए ब​ल्कि वित्तीय ​स्थिरता के लिए भी जो​खिम होगी।

ऐसे में यह जरूरी है कि व्यय की प्राथमिकता तय की जाए। चूंकि सरकार कई क्षेत्रों में काम कर रही है इसलिए उसके पास ​शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों में सार्थक सुधार के लिए समुचित संसाधन नहीं हैं। भौतिक अधोसंरचना भी कमजोर पड़ी है। हालांकि सरकार इस क्षेत्र में काम कर रही है लेकिन और अ​धिक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। दोनों स्तरों पर सरकारें वृद्धि को बढ़ावा देने वाले व्यय को तभी गति दे पाएंगी जब समुचित आवंटन हो सके। 

Keyword: चुनावी राजनीति, भारत,
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