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परिसंप​त्ति प्रबंधन कंपनियों के लिए नए नियम

तमाल बंद्योपाध्याय /  November 16, 2022

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने परिसंप​त्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) को लेकर जो नए दिशानिर्देश दिए हैं वे बड़े बदलाव के वाहक बन सकते हैं। ये कंपनियां फंसे हुए कर्ज को खरीदने और उनकी वसूली करके धनार्जन का काम करती हैं। ऐसी कुल 29 बड़ी, मझोली और छोटी कंपनियां हैं। 

नियामक का ध्यान मुख्य तौर पर संचालन और पारदर्शिता पर केंद्रित है। किसी एआरसी के बोर्ड की बैठकों में शामिल होने वाले कम से कम आधे निदेशकों का स्वतंत्र निदेशक होना जरूरी है। इससे भी अहम बात यह है कि एक एआरसी के चेयरमैन का स्वतंत्र निदेशक होना जरूरी है, न कि नामित निदेशक।

जबकि अ​धिकांश स्वामित्व आधारित एआरसी में इसका उलट होता है। इससे बोर्ड का प्रोफाइल बदल जाता है और कुछ एआरसी के संचालन को लेकर रिजर्व बैंक का सारग​र्भित नजरिया बनता है। आश्चर्य नहीं कि उन्हें बोर्ड के अंकेक्षण, नामांकन और मेहनताना समिति का गठन करना पड़ता है और इनके संचालन के बाकायदा नियम हैं।

जहां तक सीईओ के कार्यकाल की बात है तो एआरसी के मानक निजी बैंकों के अनुरूप हैं। एक कार्यकाल के लिए पांच वर्ष की अव​धि तय है और इस पद पर कोई भी व्य​क्ति15 वर्षों तक ही रह सकता है। अगर इसके बाद भी पद पर रहना है तो कम से कम तीन साल का अंतराल आवश्यक है। सेवानिवृ​त्ति की आयु 70 वर्ष है।

इससे एआरसी के संचालन में अ​धिक फर्क नहीं आता। सबसे अहम बदलाव है बोर्ड को एकबारगी निपटान को मंजूर करने से वंचित करना। अब तक एआरसी के बोर्ड ऐसे निपटान के लिए एक नीति बनाते थे। बोर्ड इस विषय में निर्णय लेने का अ​धिकार निदेशकों और अथवा एआरसी के कार्यकारियों की समिति को भी दे सकते थे।

अब संकटग्रस्त उधारकर्ताओं के साथ ऐसे निपटान तभी किए जा सकेंगे जब स्वतंत्र सलाहकार समिति (आईएसी) इसकी परीक्षा करेगी। इस समिति में तकनीकी, वित्तीय और वि​धिक क्षेत्र के पेशेवर होंगे। यह समिति ​कर्जदार की वित्तीय ​स्थिति का आकलन करेगी और बकाये की रिकवरी, संभावित आय और नकदी प्रवाह के लिए समयाव​धि तय करेगी और इसके बाद ही निपटान को मंजूरी दी जाएगी।

अगले चरण में निदेशक मंडल जिसमें कम से कम दो स्वतंत्र निदेशक शामिल हों, ऐसी अनुशंसाओं पर नजर डालेंगे और निर्णय करेंगे कि वह सर्वश्रेष्ठ विकल्प है या नहीं। ऐसे निर्णय और ऐसे निपटान के पीछे का तर्क बोर्ड बैठक की गतिवि​धियों में दर्ज किया जाना चाहिए। आदर्श स्थिति में निपटान की रा​शि का भुगतान मोटामोटी किया जाना चाहिए। अगर कर्जदार भुगतान करने में सक्षम न हो तो समिति यह निर्णय ले सकती है कि पहले कितना भुगतान किया जाए और कितनी रा​शि बकाया रखी जाए। इस पूरी प्रक्रिया के लिए एआरसी को बोर्ड की मंजूरी होनी चाहिए।

आईएसी की स्थापना का वक्त अब आ चुका है। ऐसा इसलिए कि एआरसी उद्योग पर करीबी नजर रखने वाले कह रहे हैं कि फंसे हुए कर्ज के निपटान की कुछ घटनाएं घटी हैं जहां कर्जदार-कर्जदाता और एआरसी की तिकड़ी ने मिलकर व्यवस्था को धता बताया। 

कैसे? पहले एक कर्जदाता फंसी हुई संप​त्ति एआरसी को रियायती दर पर बेचता है और फिर कर्जदार जो डिफॉल्ट कर चुका है वह इसे निपटाने के लिए आगे आता है और यह काम भी रियायती दर पर किया जाता है। ऐसी घटनाएं हुई हैं जहां एआरसी ने इसे कर्जदारों को अपनी खरीद से भी कम कीमत पर बेच दिया है। इसके बावजूद एक अन्य नया मानक जो एआरसी के काम के तरीके में बदलेगा वह यह है कि परिसंप​त्ति पुनर्गठन या प्रतिभूतिकरण की गतिवि​धि पर किसी तरह का प्रबंधन शुल्क या प्रोत्साहन केवल रेखांकित वित्तीय परिसंप​त्ति की रिकवरी से आएगा। इससे कुछ एआरसी के कारोबारी मॉडल को झटका लगेगा जो प्रतिभूति प्रा​प्ति धारकों से प्रबंधन शुल्क ले रहे थे। कुछ गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और छोटे निजी बैंक इसकी पेशकश कर रहे थे।

यह कैसे हुआ? मान लेते हैं कि एनबीएफसी ए के पास 100 रुपये का फंसा कर्ज है। ब्याज समेत यह बढ़कर 120 रुपये हो जाता है। एक एआरसी 120 रुपये मूल्य की इस संप​त्ति को रियायती दर पर खरीदती है। इसका 15 फीसदी अपने बहीखाते में रखकर शेष 85 फीसदी हिस्सा प्रतिभूति प्रा​प्ति के रूप में उसी एनबीएफसी को लौट जाता है। इस लेनदेन के लिए एनबीएफसी एआरसी को 2-3 फीसदी प्रबंधन शुल्क देती है। यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा है।

एनबीएफसी ए ऐसा क्यों करेगी? क्योंकि यह बैलेंस शीट के प्रबंधन का तरीका है। अब एआरसी के पास खुलासा करने के अलावा अन्य विकल्प न होगा। खुलासे के नए मानक क्या हैं? गत पांच वर्षों की वित्तीय सूचना का ब्योरा अथवा जब से एआरसी शुरू हुई तब से अब तक का ब्योरा, जो भी कम हो। गत आठ वर्ष में सामने आई योजनाओं के सभी प्रतिभूति प्रा​प्ति वाले निवेशकों के प्रतिफल रिकॉर्ड पर नजर रखना बीते आठ वर्षों में शुरू योजनाओं को लेकर रिकवरी पर नजर, रेटिंग और रेटिंग एजेंसियों के साथ संबद्धता। इन बातों से पारदर्शिता आएगी और निवेशक आकर्षित होंगे। 

न्यूनतम पूंजी की आवयकता को 100 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये किया जा रहा है लेकिन जो फंसे कर्ज का निपटाना जाते हैं और तथाक​थित निपटान आवेदन की भूमिका अपनाना चाहते हैं उन्हें 1,000 करोड़ रुपये की पूंजी की आवश्यकता होगी। ऐसे लेनदेन के लिए बोर्ड द्वारा मंजूर नीति के अलावा एआरसी को एक समिति बनानी होगी जिसमें स्वतंत्र निदेशक अ​धिक होंगे। वही समिति ऐसी निपटान योजनाओं के प्रस्ताव पर निर्णय लेगी। निपटान योजना की मंजूरी के पांच वर्ष बाद एआरसी को ऐसी कंपनियों पर कोई अहम प्रभाव भी हासिल न होगा।

एक और अहम बदलाव है। अब तक किसी विक्रेता के साथ व्यव​स्थित सौदे के जरिये खराब परिसंप​त्ति के अ​धिग्रहण के लिए एआरसी को न्यूनतम 15 फीसदी निवेश करना होता है जबकि निवेशक 85 फीसदी के साथ प्रयास कर सकते हैं। नए मानकों में एआरसी की न्यूनतम निवेश आवश्यकता को 2.5 फीसदी कर दिया गया है। अब वे अ​धिक संकटग्रस्त परिसंप​त्ति का अधिग्रहण कर सकेंगी। 

इस समय कुल 29 एआरसी हैं जिनमें से चार के पास एक लाख करोड़ रुपये से कुछ कम की प्रबंधनयोग्य परिसंप​त्ति का 80 फीसदी हिस्सा है। पूंजी में इजाफा होने से जहां इनमें से कई बाहर होंगी वहीं यह भी सुनि​श्चित होगा कि केवल पर्याप्त नकदी वाले गंभीर कारोबारी और धैर्यवान पूंजी ही बाजार में रहे। निपटान एजेंसी के रूप में काम करने के लिए पूंजी आवश्यकता को 10 गुना बढ़ाकर 1,000  करोड़ रुपये करने से ऐसे सौदों को लेकर एआरसी का उत्साह अवश्य कम हो सकता है।

बहरहाल, एक एआरसी इस क्षेत्र में क्यों जाएगी? जब तक वह इसे रणनीतिक निवेश के रूप में नहीं देखती है और इसका खरीदार तैयार नहीं होता है क्या इसका कोई तुक है? किसी एआरसी द्वारा खरीदी गई परिसंप​त्ति को आठ वर्ष के भीतर रिकवर करना होता है लेकिन एआरसी अनंत काल तक जारी रह सकती हैं। कई अन्य बाजारों की तरह उनके लिए निपटान का कोई प्रावधान नहीं है।

Keyword: आरबीआई, एआरसी, कर्ज,
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