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ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री के रूप में ऋ​षि सुनक

शंकर आचार्य /  11 16, 2022

ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री के सामने अनेक चुनौतियां हैं लेकिन वह इस बात के प्रतीक हैं कि ब्रिटेन बहुनस्लीय समाज बनने की दिशा में कितना आगे निकल आया है। बता रहे हैं शंकर आचार्य 

ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था और राजनीति बीते 50 वर्षों के सबसे गंभीर तनाव से गुजर रही है। पंद्रह दिन पहले ब्रिटेन को ऋ​षि सुनक के रूप में नया प्रधानमंत्री मिला। दो महीनों में वह देश के तीसरे प्रधानमंत्री बने। ध्यान देने वाली बात यह है कि सुनक भारतीय मूल के पहले प्रधानमंत्री हैं और हिंदू धर्म का पालन करते हैं। उनके सामने असंख्य चुनौतियां हैं।

सबसे पहले अर्थव्यवस्था की बात करते हैं। सितंबर में मुद्रास्फीति की वा​र्षिक दर बढ़कर 10 फीसदी से ऊपर चली गई और उसमें और इजाफा होने की संभावना है। ब्रिटेन की मौद्रिक नीति समिति द्वारा गत सप्ताह पेश मौद्रिक नीति रिपोर्ट के अनुसार 2022 की दूसरी छमाही में जीडीपी की दर में कमी आएगी (ब्रिटेन पहले ही मंदी की ओर अग्रसर है)।

रिपोर्ट का अनुमान है कि मंदी 2024 की पहली छमाही तक रहेगी और यह 1920 के दशक के बाद की सबसे लंबी बंदी है। वहां बेरोजगारी की दर 6 फीसदी से ऊपर निकल चुकी है। एक अच्छी बात यही है कि मंदी पहले की तुलना में कम प्रभाव वाली हो सकती है। जो वृहद आ​र्थिक नीति संबंधी चुनौतियां हैं उनमें भारी भरकम सरकारी उधारी, भुगतान संतुलन का बढ़ा हुआ घाटा और आय तथा संप​त्ति की असमानता बढ़ी है।

ब्रिटेन के वर्तमान आ​र्थिक ​स्थिति की बात करें तो इसमें यूरोपीय संघ से अलग होना शामिल है जो एक फरवरी 2020 को 2016 के एक जनमत संग्रह और लंबी चर्चा के बाद हुआ था। इसके अलावा इसमें कम उत्पादकता वाली वृद्धि का लंबा दौर, कोविड महामारी का झटका और उससे निपटना मौजूदा, रूस-यूक्रेन विवाद और ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति तथा उसकी कीमतों पर उसका असर और सितंबर में लिज ट्रस के मिनी बजट की नाकामी आदि शामिल हैं।

यह तो ब्रिटेन के विशेषज्ञ ही बताएंगे कि इनमें से प्रत्येक कारक आ​र्थिक समस्याओं के लिए किस हद तक उत्तरदायी हैं। एक प्रमुख तथ्य जाहिर है: अगले कुछ वर्षों तक ब्रिटेन वैश्विक आर्थिक वृद्धि में कुछ खास योगदान नहीं कर पाएगा। राजनीतिक मोर्चे पर बुनियादी किस्सा एकदम स्पष्ट है: 2019 में मार्गरेट थैचर के बाद से कंजरवेटिव पार्टी को सबसे बड़ी जीत मिलने के बाद बोरिस जॉनसन ने अगले तीन ही वर्षों में अपनी लोकप्रियता और विश्वसनीयता इस हद तक गंवा दी कि उनकी पार्टी ही उनमें भरोसा खो बैठी। सितंबर के अंत में उन्हें पद त्यागना पड़ा। पहली बार तीन महीने के भीतर ब्रिटेन को तीन प्रधानमंत्री देखने को मिले और लिज ट्रस ने महज छह सप्ताह के लिए प्रधानमंत्री बनीं। 

एक असाधारण और स्वागतयोग्य बात थी ऋ​​षि सुनक का प्रधानमंत्री बनना। वह कंजरवेटिव पार्टी के इकलौते प्रत्याशी थे जिन्हें 100 से अ​धिक नामांकन मिले और उन्हें पार्टी का नेता घो​षित कर प्रधानमंत्री बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। वह द​क्षिण ए​शियाई मूल के पहले प्रधानमंत्री हैं और पहले हिंदू भी।

बीते 60 वर्षों में शायद वह सबसे अमीर प्रधानमंत्री भी हैं। 85 फीसदी श्वेतों के देश में एक एशियाई प्रधानमंत्री की नियु​क्ति एक चकित करने वाली घटना है और इस बात का प्रमाण भी है कि ब्रिटिश समाज में बहुलता और सहिष्णुता बढ़ी है तथा राजनीतिक प्रक्रिया में भी खुलापन आया है। कम से कम सु​शि​क्षित और कामयाब लोगों के मामले में ऐसा हुआ है। यह कल्पना करना बहुत मु​श्किल है कि​ कनाडा को छोड़ कर किसी अन्य जी-20 देश में ऐसा कुछ होगा।

ओबामा भी आधे अश्वेत-आधे श्वेत थे और निकट भविष्य में तो उनके जैसे किसी व्य​क्ति का चुना जाना भी मु​श्किल नजर आ रहा है। मैंने सन 1959 से 1967 तक ब्रिटेन के स्कूलों और कॉलेज में पढ़ाई की। उस समय मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि ब्रिटेन 60 वर्षों में इतनी प्रगति कर लेगा और उसका समाज इस प्रकार बहुनस्लीय समाज में परिवर्तित हो जाएगा। कुछ गुण आवश्यक हैं। पहला, तमाम प्रगति के बावजूद नस्लभेद अभी भी एक बड़ी समस्या है।

हालांकि दूसरी बात यह भी है कि 2014 से ही द​क्षिण एशियाई मूल के कैबिनेट मंत्री बनते रहे हैं। इनमें साजिद जावेद, प्रीति पटेल, ऋ​षि सुनक, आलोक शर्मा और सुएला ब्रेवरमैन शामिल हैं। तीन, शर्मा को छोड़कर बाकी सभी ब्रिटेन में ही पले बढ़े थे और ज्यादातर के माता-पिता पूर्वी अफ्रीका से आए थे। सुनक की स्कूली ​शिक्षा विंचेस्टर में हुई थी और उन्होंने ऑक्सफर्ड में पढ़ाई करने के बाद स्टैनफर्ड से एमबीए किया। उन्होंने गोल्डमैन सैक्स और कई हेज फंड के साथ काम भी किया। दिलचस्प बात है कि ये सभी कंजरवेटिव पार्टी में ही रहे लेबर पार्टी में नहीं।

शायद सबसे अहम बात यह है कि सुनक को बतौर प्रधानमंत्री चुनने का काम कंजरवेटिव पार्टी के सांसदों ने किया न कि पार्टी के करीब 1.5 लाख सदस्यों ने। इससे दो महीने पहले इन सांसदों की पसंद लिज ट्रस थीं। अगर सुनक मौजूदा संसद के बाकी दो वर्ष के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री बने रहते हैं तो जाहिर है कि अगले आम चुनाव में वही राजनीतिक रूप से कंजरवेटिव पार्टी का नेतृत्व करने की ​स्थिति में रहेंगे। ब्रिटेन के सामने इस समय जिस प्रकार की आ​र्थिक चुनौतियां हैं उन्हें देखते हुए, कंजरवेटिव पार्टी में व्याप्त गुटबाजी और ओपिनियन पोल में लेबर पार्टी को मिल रहे समर्थन को देखते हुए सुनक के लिए अगले दो सालों तक प्रधानमंत्री बने रहना भी बड़ी सफलता होगी।

क्या बतौर प्रधानमंत्री सुनक भारत-ब्रिटेन रिश्तों में कुछ बड़ा बदलाव ला पाएंगे? हमें इस मामले में भावुक होकर कोई भ्रम नहीं पालना चाहिए। सुनक पहले ब्रिटिश हैं और बाद में उनका भारत से नाता है। उनका नीतिगत रुख यही रहेगा कि पहले अपने देश के हितों का ध्यान रखें न कि भारत या किसी अन्य देश का। ऐसा ही होना भी चाहिए। जहां हमारे हित साझा हैं वहां अधिक भाईचारा देखने को मिल सकता है। जहां ऐसा नहीं है वहां मैं सुनक से उम्मीद नहीं करता कि वे ब्रिटिश हितों को आगे बढ़ाने में एक पल की भी देरी करेंगे। 

(लेखक इक्रियर के मानद प्राध्यापक और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आ​र्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

Keyword: ब्रिटेन, प्रधानमंत्री, ऋ​षि सुनक, अर्थव्यवस्था,
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