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नियमों के आधार पर हो मुद्रास्फीति लक्षित

गुरबचन सिंह /  November 14, 2022

भारत के केंद्रीय बैंक के पास 2021 या 2022 में मुद्रास्फीति लक्ष्य को छोड़ने के पर्याप्त कारण नहीं हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे 

रहे हैं गुरबचन सिंह 

भारतीय रिजर्व बैंक को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित 4 प्रतिशत मुद्रास्फीति को 2 प्रतिशत अंकों की छूट के साथ लक्षित करना है, जो वास्तव में 50 प्रतिशत (2/4 x 100) की छूट है। हालांकि पिछली तीन तिमाहियों में वास्तविक मुद्रास्फीति की दर 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा से काफी ऊपर रही है। भारत सरकार को देने के लिए एक स्पष्टीकरण पत्र का मसौदा तैयार करने के वास्ते  आरबीआई ने 3 नवंबर को एक बैठक की थी।

 हालांकि आरबीआई के औपचारिक स्पष्टीकरण को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन कई अन्य बयानों से यह स्पष्ट है कि आरबीआई आर्थिक वृद्धि और रूस की तरफ से यूक्रेन पर किए गए आक्रमण जैसे कारकों को लेकर बेहद चिंतित है। हालांकि आरबीआई ने अपने बचाव में कोई मजबूत तर्क नहीं पेश किए हैं।

यह सच है कि भारत में मुद्रास्फीति की दर अमेरिका और यूरोप की तुलना में काफी कम है। हालांकि आरबीआई अमेरिका के फेडरल रिजर्व सिस्टम (फेड) और यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) की तुलना में बेहतर स्थिति में रहा है। फेडरल रिजर्व को अमेरिका के वित्त विभाग की तरफ से दिए गए अत्यधिक राजकोषीय प्रोत्साहन से निपटना पड़ा है, वहीं ईसीबी को गंभीर ऊर्जा संकट के चलते मुद्रास्फीति से भी जूझना पड़ा है। आरबीआई को भारत में इनमें से किसी भी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा है।

कोविड 19 के बाद भारत में राजकोषीय प्रोत्साहन अधिक नहीं दिया गया है। यूक्रेन पर आक्रमण की वजह से हमें रूस से अपेक्षाकृत कम कीमत पर तेल मिल रहा है। इसके अलावा भारत सरकार और राज्य सरकारों ने पिछले वर्षों के दौरान ईंधन पर कर घटाए हैं। इससे भी मुद्रास्फीति का दबाव कम हुआ। यह तर्क दिया जा सकता है कि खाद्य पदार्थ की कीमतें महंगाई बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभा सकती थीं। लेकिन पिछले एक साल के दौरान औसत बुनियादी महंगाई दर 6 फीसदी के करीब रही। आखिर क्यों?

हम कई परिणामों के लिए कोविड-19 को दोषी ठहरा सकते हैं। हालांकि कोविड-19 और इसके प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन और संबंधित प्रतिबंधों का वर्ष 2020-21 में अर्थव्यवस्था में मूल रूप से आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। मांग पक्ष की बात करें तो ऐसे हालात में आरबीआई की विस्तारित मौद्रिक नीति की भूमिका वास्तव में सीमित थी, खासतौर पर ऐसे वक्त में जब बैंकों के पास मौजूद फंड के लिए कर्ज लेने वाले उपयुक्त लोग मिलने मुश्किल हो गए थे।

पिछले साल सुधार के चरण के दौरान भी आपूर्ति पक्ष और आपूर्ति में सुधार लाने से जुड़ी आवश्यकता पिछले साल सुधार के चरण में भी बरकरार रही है। आरबीआई इसमें कोई मदद नहीं कर सकता है। लेकिन अगर मौद्रिक नीति अपने अधिकतम स्तर से अधिक विस्तार की ओर अग्रसर है तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि मुद्रास्फीति दर में काफी वृद्धि हुई है।   

हालांकि पिछली तीन तिमाहियों के दौरान मुद्रास्फीति की दर ने 6 फीसदी के स्तर को पार कर लिया और यह तीन साल से अधिक समय से ही 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है। पूंजी में सर्वोच्च स्तर से अधिक विस्तार और कम ब्याज दरें 2019 से लागू हैं। इस साल मई से ही आरबीआई सामान्य दरों की ओर बढ़ रहा है। महत्त्वपूर्ण अंतराल के बाद कम मुद्रास्फीति का दौर आएगा।

यह मानने की कई वजहें हैं कि मई से पहले आरबीआई की कोशिश यह सुनिश्चित करने की थी कि मुद्रास्फीति की दर 6 प्रतिशत के स्तर को पार नहीं करनी चाहिए ताकि यह नीतिगत स्तर का उल्लंघन न हो। हालांकि अगर यह 4 प्रतिशत मुद्रास्फीति के लक्ष्य को लक्षित नहीं कर रहा था तब यह वास्तव में नीतिगत दर का उल्लंघन था। जब एक बार वर्ष 2020 में और अब 2022 में मुद्रास्फीति की दर लगातार तीन तिमाहियों तक 6 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई तब आखिरकार इसने खुद को नीतिगत व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए पाया।

अगर 4 प्रतिशत की मुद्रास्फीति का लक्ष्य रखा जाता है, तब वास्तविक मुद्रास्फीति कई बार 6 प्रतिशत तक जा सकती है। ऐसे में अगर आरबीआई को मुद्रास्फीति को 5.5 प्रतिशत के स्तर पर लक्षित करना होगा तब वास्तविक मुद्रास्फीति 7.5 फीसदी के स्तर तक जा सकती है जैसा कि वास्तव में अब हुआ है।

अतिसरलीकरण की लागत पर हाल के वर्षों में भारत में मुद्रास्फीति अधिक रही है और मुख्य रूप से सभी चीजों पर विचार करने के बाद एक बात सामने आती है कि सारी चीजें कम ब्याज दर और पूंजी की अधिक वृद्धि से जुड़ी हैं। आरबीआई का लक्ष्य आर्थिक मंदी से निपटना था लेकिन यहां कई तरह की मंदी है और सभी तरह की समस्याओं का हल ब्याज दरों में कमी करना नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि मुद्रास्फीति लक्ष्य को अपनाने के बाद पिछले दो-तीन दशकों में विभिन्न प्रकार के संकटों के बाद भी शायद ही किसी देश ने यह नीति छोड़ी हो। अगर आरबीआई भी मुद्रास्फीति को लक्षित करना जारी रखता है जैसा कि यह इच्छुक भी दिखता है तब उसे 2013 और 2016 के बीच लंबी अवधि में तैयार किए गए नियमों का पालन करना चाहिए। यह कहना नहीं है कि मुद्रास्फीति की दर तीन तिमाहियों तक कभी भी 6 प्रतिशत के स्तर को पार नहीं करनी चाहिए। लेकिन वर्ष 2020 या 2022 में आरबीआई से इतर इसके कोई पर्याप्त कारण नहीं हैं।

(लेखक अशोक यूनिवर्सिटी के अतिथि प्राध्यापक हैं)

Keyword: मुद्रास्फीति, आरबीआई, कोविड-19,
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