बिजनेस स?टैंडर?ड - चीन की सेना से निपटने को कितने तैयार हम?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, December 01, 2022 03:18 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

चीन की सेना से निपटने को कितने तैयार हम?

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  11 14, 2022

पिछले दिनों गुजरात के वडोदरा में एक नई उत्पादन इकाई की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता की बात की। इस संयंत्र में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स द्वारा सी-295 परिवहन विमान बनाए जाएंगे। भारतीय वायुसेना के लिए ये विमान एयरबस डिफेंस ऐंड स्पेस के साथ तकनीक साझेदारी के तहत बनेंगे। प्रधानमंत्री ने संबोधन में कहा कि भारत जल्दी ही परिवहन विमानों का बड़ा निर्माता बन जाएगा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के कार्यकाल में विनिर्माण क्षेत्र स​ब्सिडी के सहारे किसी तरह काम चला रहा था।

इसके बावजूद देश की सैन्य क्षमताओं को लेकर गंभीर सवाल हैं और यह भी क्या हम दो मोर्चों से छिड़ने वाली जंग का सामना कर सकेंगे? वह भी तब जबकि हमारी पारंपरिक सेना का मुकाबला चीन की अ​धिक उन्नत कृत्रिम बुद्धिमता के सहारे काम करने वाली सेना से होगा जिसके पास किलर रोबोट, मशीन लर्निंग और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी सुविधाएं हैं। कई लोग मानते हैं कि कोई युद्ध होने की संभावना कम ही है क्योंकि चीन तुलनात्मक रूप से कमजोर और आकार में छोटे भारत से निपटने के लिए पाकिस्तान की मदद लेता नहीं दिखना चाहेगा। ऐसे में यह सवाल बरकरार है कि क्या भारत इन परि​स्थितियों के लिए तैयार है या फिर हमारी सेना 2022-23 में भी जंग में उन्हीं तरीकों और उपकरणों की सहायता लेनी होगी जो सन 1999 में करगिल के समय थे। अब तक क्या बदलाव आया है और किन चीजों की जरूरत है?

एक अहम बदलाव जो हमने अजरबैजान-आर्मीनिया और यूक्रेन में भी देखा वह यह कि जमीनी सेनाओं को दूर से संचालित ह​थियारबंद ड्रोन से खतरा है। भारतीय सेना के लिए यह एक बड़ा जो​खिम साबित हो सकता है। सशस्त्र ड्रोन शत्रु की हवाई रक्षा को भंग करके अग्रिम सुरक्षा पं​क्ति तक पहुंचते और हमला करते हैं। वे मुख्यालयों और संचार केंद्रों, लॉजि​स्टिक इकाइयों तक को जद में ले सकते हैं। भौगोलिक गतिरोधों की वजह से सैनिक एक जगह एकत्रित होते हैं और उनके निशाना बनने का जो​खिम अ​धिक होता है। ह​थियारों के मामले में जहां भारत-पाकिस्तान में काफी समानता है लेकिन ड्रोन के मामले में पाकिस्तान आगे निकल रहा है क्योंकि उसे चीन, ईरान और तुर्की से आपूर्ति हुई है। भारत के पास अभी इन नए खतरों से निपटने का कोई उपाय या रणनीति नहीं है। चीन अपनी रणनीति मजबूत कर रहा है और वह पांचवीं पीढ़ी की युद्ध संबंधी तैयारी में लगा है, वहीं हमारी ड्रोन खरीदने तथा ड्रोन हमलों से निपटने की तकनीक हासिल करने की को​शिश नीतिगत खामियों की ​शिकार है। ड्रोन के मामले में हमारे पिछड़े होने की एक वजह राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) का अभाव भी है। सैन्य बलों के लिए रणनीतियां, परिचालन और तकनीकी अवधारणा निर्मित करने में एनएसएस की अहम भूमिका होती है। बिना तकनीकी रूप से सक्षम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के सेना के लिए युद्ध की तैयारी मु​श्किल होगी।

यह स्पष्ट है कि मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एनएसएस की स्थापना को बहुत अ​धिक प्राथमिकता नहीं देते और यह जवाबदेही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस), सैन्य मामलों के विभाग और वि​भिन्न वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों मसलन रक्षा शोध एवं विकास संगठन पर आ गई है। यह वांछित नहीं है क्योंकि सन 1999 में सीडीएस की अवधारणा आने के बाद से ही यह तीन सेनाओं वाले सैन्य ढांचे, खरीद, एकीकरण और मौजूदा एकल सेवा ​थिएटर को एकीकृत तीन सेनाओं वाली कमांड की ओर उन्मुख रहा है।

भारत की एक और कमजोरी सूचनाओं, गलत सूचनाओं, साइबर हमलों, इलेक्ट्रॉनिक, सिग्नल्स और सैटेलाइट इंटेलिजेंस और ऐतिहासिक रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ आदि के क्षेत्र में है। तवांग, डोकलाम और लद्दाख आदि इसके उदाहरण हैं। चीन के विशेष सैन्य बल समुद्र के भीतर इंटरनेट केबल को क्षति पहुंचाकर भारत को अलग-थलग कर सकते हैं और तब हम अपने सहयोगियों के साथ सुर​​क्षित संवाद भी नहीं कर पाएंगे। भारत की सैन्य तैयारियों को लेकर चीन और पाकिस्तान का खतरा केवल कृत्रिम मेधा तक सीमित नहीं है। यह पारं​परिक शैली की लड़ाई मसलन लंबी दूरी के हमले के जरिये जमीनी ऑपरेशन को मदद पहुंचाने के क्षेत्र में भी हावी है। इस मामले में भारत के पास पिनाका रॉकेट और ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के अलावा बहुत सीमित विकल्प हैं। इस बीच पाकिस्तान ने हत्फ श्रृंखला की मिसाइल हासिल या विकसित कर ली हैं और एक क्रूज मिसाइल भी जो परमाणु ह​थियार ढोने में सक्षम है।

भारत की बैलि​स्टिक मिसाइलें तभी प्रतिरोध कर सकती हैं जब चीन कमांड और कंट्रोल सिस्टम को काम करने दे। सरकार ने इन कमियों को दूर करने के बजाय सैन्य चिंताओं को खारिज किया। 2015 में आईएनएस विक्रमादित्य पर आयोजित संयुक्त कमांडरों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने वहां उप​​स्थित कमांडरों से कहा कि उनकी नजर में भारत के लिए प्रमुख सैन्य खतरा क्या है? जब कुछ जनरल, एयर मार्शल और एडमिरल ने कहा कि उन्हें चीन ही प्रमुख खतरा लगता है तो बेहतर यही होता कि मोदी उन्हें युद्ध में सूचना प्रौद्योगिकी और विश्लेषणात्मक जानकारी के इस्तेमाल की कुछ बातों से अवगत कराते। परंतु इसके बजाय उन्होंने कहा, ‘आप ऐसा मान सकते हैं लेकिन मेरे नजरिये से मेरा ​विश्वास है कि चीन भारत के लिए सैन्य खतरा बिल्कुल नहीं है।’बमु​श्किल दो ​वर्ष के भीतर सि​क्किम के डोकलाम में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच सीधा टकराव हुआ। पांच वर्ष बाद पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना ने बड़े पैमाने पर घुसपैठ की और 20 भारतीय जवानों को न केवल अपनी जान गंवानी पड़ी ब​ल्कि लद्दाख के उत्तर में डेपसांग सेक्टर में भारत को अपनी जमीन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा चीन के हाथों खोना पड़ा। इन कमियों के बीच भारत को चीन के ​खिलाफ एक अहम बढ़त हासिल है जिसकी अक्सर अनदेखी की जाती है। वह है हमारे सैन्य बलों की मजबूती और लड़ाई की गुणवत्ता। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में जवानों को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है वह उनकी कड़ी परीक्षा लेती है। इसके विपरीत औसत चीनी सैनिक घर का इकलौता लड़का होता है जो लाड़ प्यार में पला होता है और वास्तविक नियंत्रण रेखा के प्रतिकूल हालात के लिए तैयार नहीं होता।

डोकलाम में जहां भारतीय और चीनी सैनिक आमने-सामने आ गए थे वहां वरिष्ठ भारतीय कमांडर याद करते हैं कि उन्हें चीनी सेना में अनि​श्चितता नजर आई थी। जानकारों के मुताबिक भारतीय जवान जहां चीनी सैनिकों को पीछे धकेल रहे थे, वहीं चीनी अ​धिकारियों को अपने जवानों से यह कहते सुना गया कि अगर उनके जवान लाइन तोड़कर हटते हैं तो उन्हें गोली खानी पड़ेगी। परंतु एक बार जब हमारे कठोर प्र​शिक्षण वाले जवानों की जगह चार वर्ष के कार्यकाल वाले अ​ग्निवीर ले लेंगे तो यह बढ़त भी जाती रहेगी। इन अ​ग्निवीरों में से केवल 20 फीसदी यानी हर वर्ष 1.25 लाख जवानों में से केवल 25,000 जवानों को दीर्घकालीन सेवा के लिए चुना जाएगा। सैन्य अ​धिकारियों को आशंका है कि अ​ग्निवीरों का प्रतिशत बढ़ने पर सेना कमजोर पड़ेगी।

राहत की एक बात यह है कि चीन के साथ किसी भी जंग में भारत अकेला नहीं रहेगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लोकतांत्रिक देशों मसलन जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्तों के साथ भारत अन्य  सेनाओं को साथ जोड़कर तत्काल प्रतिक्रिया दे सकेगा। चीन को अपनी सेनाओं को दो दिशाओं में बांटना होगा। एक भारत के साथ लगने वाली जमीनी सेना और दूसरी द​क्षिण चीन सागर में समुद्री सेना। भारत के लिए यह अहम है कि वह इन हालात में कूटनयिक और सामरिक परि​स्थितियों का उचित प्रबंधन करे।

Keyword: चीन, सेना, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, सी-295 परिवहन विमान, वायुसेना, किलर रोबोट, मशीन लर्निंग,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या जीडीपी वृद्धि को सेवा क्षेत्र से मिलेगी और मजबूती
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.