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भारत का मछुआरा समुदाय नाराज, कर रहा विरोध और अनुरोध

सार्थक चौधरी /  11 14, 2022

बाघता काई, शामिल व्हा (आप क्यों देख रहे हैं? हमसे जुड़ें), मुंबई की फैशन स्ट्रीट के सामने आजाद मैदान में लगाए गए कई होर्डिंग्स में से एक में यह लिखा गया था। और ऐसा हो नहीं सकता कि खरीदारी के लिए स्ट्रीट में घुसने से पहले लोगों की नजर इस होर्डिंग पर न पड़े।

मराठी में यह हताशापूर्ण अपील वर्ली के लोटस जेट्टी के मछुआरों द्वारा की गई थी, जो अपनी सहकारी समिति को पंजीकृत करने में तीन साल की देरी के विरोध में समूह के साथ भूख हड़ताल पर थे। समिति में पंजीकरण होने के बाद उन्हें महाराष्ट्र सहकारी समिति अधिनियम के तहत कई लाभ उठाने की सुविधा मिलेगी। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हस्तक्षेप कर मत्स्य विभाग को समिति को प्राथमिकता के आधार पर पंजीकृत करने का निर्देश दिया, जिसके बाद हाल ही में एक महीने से चली आ रही हड़ताल समाप्त हुई।

लोटस जेट्टी के एक मछुआरे हसन ने कहा कि मछुआरा समूह लगभग तीन वर्षों से पीने के पानी जैसी मौलिक आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है। मुंबई तटीय सड़क परियोजना ने सबकी स्थिति और खराब कर दी है। वे जितनी मछलियां पकड़ते थे, उनमें भी कमी आ गई है, और इसके बदले सरकार की तरफ से कोई मुआवजा या सब्सिडी नहीं है। समिति ही समूह के पास अंतिम विकल्प के रूप में बची थी। मछुआरा समुदाय की शिकायतें एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। हाल के दिनों में कई राज्यों में मछली पकड़ने में गिरावट और तटों पर बन रहे बुनियादी ढांचों में वृद्धि और विनिर्माण के बीच ये समुदाय अपनी आजीविका के बारे में चिंता जताते हुए देखे जा रहे हैं।

कोविड -19 महामारी ने मछुआरों के संकट को और बढ़ा दिया। 2020 में प्रकाशित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज टेक्नोलॉजी के आंकड़ों के अनुसार, कोविड -19 के कारण समुद्री मत्स्य क्षेत्र पर 224 करोड़ रुपये का प्रतिदिन नुकसान हुआ। ऐसे समय में, अधिकांश मछुआरों को जीविका के लिए केंद्र द्वारा दी जा रही सब्सिडी पर निर्भर रहना पड़ता था।

डब्ल्यूटीओ में भारत का पक्ष

जून में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सम्मेलन में मत्स्य पालन सब्सिडी प्रस्ताव का उद्देश्य अवैध, गैर-सूचित और अनियमित मछली पकड़ने के लिए सब्सिडी को समाप्त करना और स्थायी रूप से मछली पकड़ने को बढ़ावा देना है। भारत ने वैश्विक मत्स्य पालन समझौते को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह विकासशील देशों को उनके पारंपरिक मछुआरों की जरूरतें पूरी करने के लिए एक समान अवसर प्रदान नहीं करता है।

मत्स्य पालन विभाग के संयुक्त सचिव जे बालाजी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि भारत ने समझौते के संबंध में एक मजबूत कदम उठाया है। हम इस तथ्य के प्रति सचेत हैं कि मछली पकड़ने वाले कुछ विकसित देश सब्सिडी देते हैं। हमारी सब्सिडी अलग है। हमारी सब्सिडी महासागरों तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए है। हमारी सब्सिडी गरीबी दूर करने के लिए है। ताकि मछुआरों को तीन वक्त का भोजन उपलब्ध हो सके। इसलिए हमने इस प्रस्ताव पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

भारत के कुल मछुआरों में से 67 फीसदी छोटे मछुआरे हैं। उनमें से कई पारंपरिक तरीकों को छोड़कर मशीन वाली नावों का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं, जिससे उन्हें उनकी पिछली आय के मुकाबले सिर्फ एक हिस्से के बराबर की आय हो पाती है। अक्टूबर 2021 के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संस्थान के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। शहरी क्षेत्रों में इनकी प्रति व्यक्ति आय 33 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 27 रुपये ही है।

इन्फ्रा परियोजना से झटका

समुद्र या नदियों के पास विभिन्न ढांचागत परियोजनाएं मछुआरों के लिए उनके मछली पकड़ने के क्षेत्रों को प्रभावित करके कई समस्याएं पैदा करती हैं। मुंबई में तटीय सड़क परियोजना की तरह, केरल में विझिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह परियोजना के बाद मछुआरों ने विरोध शुरू कर दिया है। वे बड़े पैमाने पर तटीय क्षरण और उनकी आजीविका पर इसके प्रतिकूल प्रभाव से डरे हुए हैं। वे तेज ज्वार की लहरों के कारण घरों और आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजे की मांग कर रहे हैं। मछुआरों का कहना है कि बंदरगाह के निर्माण के कारण ऐसी घटनाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में  केरल सरकार ने यह विश्लेषण करने के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन किया था कि क्या निर्माण से तटीय क्षरण हुआ था।

स्थानीय मछुआरा संघ, मछलीमार अधिकार संघर्ष संगठन के उस्मांगनी शेरसिया ने कहा कि देश में अधिकांश मछली पकड़ने के केंद्र अपना पंजीकरण रद्द करा चुके हैं, इसमें गुजरात विशेष रूप से शामिल है।  इसलिए जब तट के किनारे कोई विकास या औद्योगिक परियोजना शुरू की जाती है, तो मछुआरों से अनुमति नहीं मांगी जाती है। साइट या मछुआरों का पंजीकरण न होने के कारण सरकार या फर्म से कोई मुआवजा भी नहीं मिलता है। इसलिए भारत के अधिकांश हिस्सों खासकर गुजरात में, इन मछुआरों को फिर से स्थापित कराने के लिए कोई जगह प्रदान नहीं की जाती है। कुछ मछुआरों ने आरोप लगाया कि उन्हें मुश्किल समय में समुदाय की मदद करने के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है।

मुंबई के बांद्रा में कोली समुदाय के एक मछुआरे आलम ने कहा कि पिछले तीन साल कठिनाई भरे रहे हैं। सबसे पहले, लॉकडाउन के दौरान हमें मुश्किल से राज्य से कोई प्रोत्साहन मिला। हमें सिर्फ 5 किलो चावल मिला और वह भी सिर्फ एक बार। फिर, चक्रवात ताउते के कारण नावें खराब हो गईं। छोटी नावों को तो भूल जाइए, 20 लाख से अधिक वाली बड़ी नावों के भी कई टुकड़े हो गए थे। केवल कुछ मछुआरों को ही लगभग 25,000 रुपये मिले। मछुआरों ने इस राशि का उपयोग अपने कुछ कर्ज का भुगतान करने और अपने परिवारों को खिलाने के लिए किया।

सरकार की पहल

हालांकि, बालाजी ने कहा कि सरकार ने मछुआरों को विभिन्न सुविधाएं प्रदान की हैं। उन्होंने कहा कि अगर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को देखें, तो यह कई चीजों पर केंद्रित है। बुनियादी ढांचे जैसी सुविधाएं लगभग सभी के लिए है। यदि कोई बंदरगाह बनाया जाता है, तो उसका उपयोग छोटे और बड़े मछुआरे समान रूप से करते हैं। बालाजी ने कहा कि देशभर में 1,500 लैंडिंग सेंटर हैं। दो साल में 300-400 केंद्रों तक पहुंचने में सफलता मिल पाई है।  यह एक सतत प्रक्रिया है। छोटे मछुआरों को कई सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं। लोग जो कह रहे हैं ,वह गलत है। इस योजना को छोटे मछुआरों के पक्ष में देखा जाता है। शिकायत निवारण एक और मुद्दा रहा है। इसलिए, सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए एक ऐप बनाने की योजना कर रही है।

बालाजी ने कहा कि कई राज्यों के पास मुद्दों को हल करने के लिए अपनी व्यवस्था है। स्थानीय शिकायतों को केंद्र स्तर पर ज्यादा नहीं लाया जाता है। लेकिन डेटाबेस पर काम किया जा रहा है। एक बार इसे औपचारिक रूप देने के बाद, पैसों के लेनदेन में वृद्धि होगी। कुछ राज्यों में तटीय मछुआरों के लिए डेटाबेस हैं। हालांकि अंतर्देशीय मछुआरों के लिए कोई डेटाबेस नहीं है और इस पर काम किया जा रहा है।

Keyword: मछुआरा समुदाय, फैशन स्ट्रीट, आजाद मैदान, लोटस जेट्टी, बुनियादी ढांचा, आजीविका, डब्ल्यूटीओ,
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