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पाटीदारों का पराक्रम और पटेल का दमखम

आदिति फडणीस /  November 11, 2022

गुजरात में अगले महीने होने वाले चुनावों के बाद भूपेंद्र पटेल के राज्य का मुख्यमंत्री बनने की व्यापक संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनमें और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में काफी समानताएं हैं। वर्ष 2001 में जब मोदी राज्य में शीर्ष पद पर आसीन हुए उस समय उनके पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं था।

पटेल के साथ भी ऐसा ही है। पहली बार विधायक बने और उन्हें शीर्ष पद के लिए चुन लिया गया। मोदी ने कच्छ में आए भूकंप के कारण हुए भारी सार्वजनिक विनाश के बीच पदभार संभाला था। 13 सितंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद पटेल ने भी बाढ़ प्रभावित जिलों जामनगर, जूनागढ़ और राजकोट में राहत और बचाव कार्यों की खुद निगरानी की।

उन्होंने इस बात को सिरे से नकार दिया कि गुजरात उन राज्यों में से एक है जहां कोविड-19 महामारी से सबसे खराब तरीके से निपटा गया था। गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बरजोर पारदीवाला ने भी अहमदाबाद सिविल अस्पताल को 'कालकोठरी' तक कह दिया था जहां उनके मुताबिक लोगों को मरने के लिए भेजा गया था।

हालांकि दोनों नेताओं में अंतर भी है। जब मोदी ने केशुभाई पटेल की जगह ली तब ताकतवर माने जाने वाले पाटीदार जाति के समर्थक उनके खिलाफ आ गए और  सबने यह कहते हुए निशाना साधा कि पिछड़ी जाति तेली समुदाय का एक व्यक्ति मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने में कामयाब रहा जो जाति गुजरात के बाकी हिस्सों में लगभग अनजान ही मानी जाती है।

हालांकि भूपेंद्र पटेल पाटीदार समुदाय के पटेल हैं, लेकिन इस बात में संदेह है कि अहमदाबाद से परे पाटीदार समुदाय के लोग उन्हें अपना नेता मानेंगे या नहीं।

भूपेंद्र पटेल को एक और कार्यकाल के लिए अनौपचारिक रूप से फिर से समर्थन देकर, भाजपा स्पष्ट रूप से जातीय दबाव में आते हुए दिख रही है। गुजरात की राजनीति में पाटीदार उतने ही ताकतवर हैं, जितने महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा। शुरुआती दौर में सरदार पटेल के प्रभाव में पाटीदार नेतृत्व, कांग्रेस के प्रति जी जान से से वफादार था। यह अलग बात है कि गुजरात के पहले चार मुख्यमंत्री सभी ब्राह्मण थे।

1973 में चिमनभाई पटेल ने बगावत का झंडा बुलंद किया। वह पहले पाटीदार मुख्यमंत्री बने लेकिन वह कांग्रेस से जुड़े थे। हालांकि, वह पाटीदार आधार को मजबूत नहीं कर सके। बहुत बाद में, एक और पटेल उपमुख्यमंत्री बने और जल्द ही पाटीदारों के निर्विवाद नेता बने।

वह नेता केशुभाई पटेल ही पाटीदारों को भाजपा से जोड़ने के लिए जिम्मेदार थे। आंदोलन की शुरुआत सौराष्ट्र से हुई जिससे पाटीदार नेतृत्व का केंद्र मध्य गुजरात से हटकर  सौराष्ट्र स्थानांतरित हो गया।

इत्तफाक से उन्हीं दिनों सूरत में हीरा पॉलिशिंग का उभार एक उद्योग के तौर पर हुआ और इनसे जुड़ने वालों में से अधिकांश सौराष्ट्र के प्रवासी थे। धन, बल और राजनीतिक शक्ति के मेल के साथ ही पाटीदार प्रभुत्व का एक दौर शुरू हुआ जिसका भाजपा के विकास और गुजरात की वृद्धि में योगदान था। यह सब तब तक होता रहा जब तक कि नरेंद्र मोदी तस्वीर में नहीं आए।

नरेंद्र मोदी के उभार के खिलाफ प्रतिरोध और नाराजगी दूर होती गई। हालांकि इसके लिए काफी हद तक आनंदीबेन पटेल के प्रभाव को श्रेय दिया जा सकता है। उन्हें मोदी के प्रतिनिधि के रूप में पहचाना जाने लगा और पाटीदारों को धीरे-धीरे विश्वास हो गया कि उनका प्रभुत्व जारी रहेगा।

इसके बाद आनंदीबेन को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन उनकी जगह नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय जब जैन समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विजय रूपाणी को पद दिया गया तो पाटीदारों ने आम आदमी पार्टी (आप) का समर्थन कर अपना गुस्सा जाहिर किया। हालांकि आप के लिए बहुत अधिक सीटें पाना मुश्किल हो सकता है, लेकिन उसकी बढ़ती वोट हिस्सेदारी भविष्य में उसे सत्ता के लिए महत्त्वपूर्ण दावेदार बना सकती है। 

मोदी की तरह भूपेंद्र पटेल भी अपने ही बलबूते सत्ता में आए हैं लेकिन इस वक्त दिल्ली का हस्तक्षेप स्पष्ट है। उनके दाहिने हाथ माने जाने वाले ध्रुमिल पटेल को उनकी पदोन्नति के कुछ महीनों के भीतर ही बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि उन पर पुलिस पोस्टिंग को 'प्रभावित' करने के आरोप लगे। प्रधानमंत्री कार्यालय की 'सलाह' के बाद यह बर्खास्तगी की गई।

इस बीच पटेल ने मंत्रियों से कहा है कि पार्टी की वजह से वे इस पद पर पहुंचे हैं। इसलिए उन्हें भी पार्टी के लिए काम करने की जरूरत है। उनके प्रशासनिक हस्तक्षेप के केंद्र में आम लोग ही रहे हैं जिनके लिए आठ जिलों में नल के पानी की आपूर्ति,  जैविक खेती का समर्थन करने के लिए 100 करोड़ रुपये का कोष बनाने, आधुनिक सार्वजनिक बस परिवहन प्रणाली में सुधार करने जैसी पहल की गई। इसके अलावा गुजरातियों की कारोबारी दक्षता के अनुरूप ही सेमीकंडक्टर और फैब्स के लिए वेदांत-फॉक्सकॉन का 1.54 लाख करोड़ रुपये का निवेश हासिल किया गया है जिसकी वजह से पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र हाथ मलते रह गया।

डिफेंस एक्सपो कुछ हफ्ते पहले गुजरात में आयोजित किया गया था और यह उन कंपनियों तक सीमित था जिनके पास पहले से ही भारत में विनिर्माण क्षमता है (जो डिफेंस एक्सपो की निवेश-बढ़ाने की क्षमता को कुछ हद तक कम करता है) और  यह अच्छी तरह से प्रबंध किया गया कार्यक्रम था।

उनके सभी प्रयासों का  दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व ने मजबूती से समर्थन किया है और यह आधी लड़ाई है। राजनीतिक सत्ता के लिए महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले विजय रुपाणी, नितिन पटेल और भूपेंद्र सिंह चूड़ास्मा इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। इस तरह शीर्ष पद के लिए भविष्य के संभावित दावेदारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। भाजपा के 30 से अधिक मौजूदा विधायकों के टिकट कट गए हैं। संभव है कि पटेल इनमें से कुछ वफादारों को सरकार में जोड़ लें। साथ ही कांग्रेस से भाजपा में शामिल होने नेताओं के आने का सिलसिला लगातार जारी है।

वर्ष 2017 में भाजपा ने सरकार जरूर बनाई, लेकिन पार्टी के पास दो दशकों में सबसे कम विधायक (99 विधायक) थे। इसने बाद के चुनाव जीते और अपनी संख्या बढ़ाने में कामयाब रही। इस बार चुनौती अभूतपूर्व परिणाम दर्ज करने की है। भूपेंद्र पटेल वास्तव में दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व के हस्तक्षेप से कभी मुक्त नहीं हो सकते। लेकिन अगर वह गुजरातियों का दिल जीत लेते हैं और भाजपा की सीटों की संख्या में काफी सुधार कर लेते हैं तो वह यह साबित जरूर कर देंगे कि उन्हें गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

Keyword: गुजरात, भूपेंद्र पटेल, मुख्यमंत्री,
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