बिजनेस स?टैंडर?ड - शेयरों की अमेरिकी राह पर बाजार की निगाह
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शेयरों की अमेरिकी राह पर बाजार की निगाह

आकाश प्रकाश /  11 11, 2022

लंबे समय से यह प्रतीक्षा की जा रही थी कि शेयर बाजारों का केंद्र अमेरिकी शेयरों से दूर हो सके। लग रहा है कि वह वक्त आ गया है और भारत इससे लाभान्वित हो सकता है। बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

गत वर्ष यानी 31 दिसंबर 2021 को समाप्त दशक बड़ी तकनीकी कंपनियों, खासकर अमेरिकी बाजारों के लिए असाधारण रहा। अब जब हम सब मंदी के दौर में हैं तो ऐसी कई रिपोर्ट और विश्लेषण हैं जो पिछले दशक के प्रतिफल को अलग-अलग कर रही हैं और यह बताने की कोशिश कर रही हैं कि आने वाले वर्षों में वित्तीय बाजारों से किस प्रकार के प्रतिफल की अपेक्षा की जा सकती है।

पिछले कुछ समय से यह स्पष्ट है कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से अमेरिकी शेयर बाजारों का दबदबा रहा है। मार्च 2009 में बाजार के निचले स्तर पर पहुंचने के बाद बीते 12 वर्षों में से 10 वर्षों के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को पीछे छोड़ा है। दिसंबर 2021 में समाप्त दशक में अमेरिकी शेयरों (एसऐंडपी 500) ने विशुद्ध संदर्भों में 16.6 फीसदी की दर से सालाना प्रतिफल दिया। अमेरिकी शेयर बाजारों के इतिहास में यह 10 वर्षों के प्रतिफल का चौथा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इससे पहले केवल 1998, 1999 और 1958 में समाप्त होने वाली 10 वर्षों की श्रृंखला का प्रदर्शन बेहतर रहा था।

 अमेरिकी प्रतिफल के मामले में हम एक असाधारण दशक से गुजरे हैं। ऐसा लगता नहीं कि इस प्रकार प्रतिफल निकट भविष्य में दोहराया जाएगा। 16.6 फीसदी के वार्षिक प्रतिफल की छानबीन दिलचस्प होगी। इसके घटक और कारक क्या थे?

क्रिस्टोफर ब्लूमस्ट्रान ने अपने वार्षिक पत्र के एक उल्लेखनीय अध्ययन किया है। उन्होंने प्रतिफल को बिक्री/शेयर वृद्धि, मार्जिन वृद्धि, मूल्य/आय बदलाव और अंत में लाभांश प्राप्ति को अलग-अलग घटकों में तोड़ा। 

बीते दशक में एसऐंडपी 500 का 16.6 फीसदी प्रतिफल अलग घटकों में इस प्रकार नजर आता है: 3.8 फीसदी हिस्सा प्रति शेयर वृद्धि बिक्री से आता है, 4 फीसदी कर पश्चात मार्जिन से बढ़ोतरी से, 6.4 फीसदी मूल्य/आय चर में हुए विस्तार से और 2.4 फीसदी लाभांश प्रतिफल से मिलता है।

दिलचस्प बात यह है कि एसऐंडपी 500 की कंपनियों ने बीते एक दशक में सालाना केवल 3 फीसदी की वृद्धि की जो सामान्य सोच से काफी कम है।  बिक्री/शेयर वृद्धि 0.7 फीसदी बढ़कर 3.8 फीसदी पुनर्खरीद की वजह से हुई। बिक्री में इस मामूली वृद्धि को बीते दशक में आय प्रति शेयर (ईपीएस) के 7.8 फीसदी के स्तर की मदद मिलती है क्योंकि मार्जिन में विस्तार होता है।

एसऐंडपी 500 के लिए 13.4 फीसदी का कर पश्चात मार्जिन अपने उच्चतम स्तर पर है। मार्जिन में यह वृद्धि आंशिक रूप से इसलिए हुई क्योंकि कॉर्पोरेट कर दर में 21 फीसदी की कमी की गई। सन 1999-2000 के दौरान तकनीकी बुलबुला फटने का उदाहरण लें। उस वक्त कॉर्पोरेट मुनाफा मार्जिन 8 फीसदी के उच्चतम स्तर पर था।

इसके बाद 7.8 फीसदी की आय प्रति शेयर वृद्धि को कई विस्तारों से मदद मिली और मूल्य/आय (पीई) चर 13.3 से बढ़कर 23.6 हो गया। कई विस्तारों के कारण सालाना दशकीय प्रतिफल 6.4 फीसदी बढ़कर 14.2 फीसदी हो गया। अंतिम 2.4 फीसदी हिस्सा लाभांश से आया। इन घटकों पर नजर डाली जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी शेयर आज 10 फीसदी या उससे अधिक का प्रतिफल तब तक नहीं दे सकते हैं जब तक कि मूल्य/आय चर और मार्जिन में विस्तार न हो।

बिक्री/शेयर वृद्धि के 4-5 फीसदी से अधिक होने की उम्मीद नहीं है। दिसंबर 1999 में समाप्त हुए दशक में जब बाजारों ने 10 वर्ष की अवधि में 18.2 फीसदी का प्रतिफल दिया था तब इसमें से 11.4 फीसदी हिस्सा मार्जिन और चरों के विस्तार से आया। इस दशक में भी बिक्री/ शेयर वृद्धि केवल 4 फीसदी थी।

दिलचस्प बात यह है कि पांच शीर्ष तकनीकी कंपनियों ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट, अल्फाबेट, एमेजॉन और मेटा ने एक दशक के दौरान 30 फीसदी का वार्षिक प्रतिफल दिया। इन कंपनियों के शेयरों ने यह प्रतिफल मोटे तौर पर बिक्री में वृद्धि से हासिल किया। बिक्री में वृद्धि को चर विस्तार से मदद मिली। मसलन मूल्य/आय 13.4 फीसदी से बढ़कर 33.4 हो गया।

लाभांश से 0.5 फीसदी का मामूली सहयोग मिला जिसकी भरपाई कमोबेश उन पांच कंपनियों के मार्जिन में मामूली कमी से हो गई। यानी इस समूह के लिए 30 प्रतिशत प्रतिफल 20 प्रतिशत बिक्री/शेयर वृद्धि से आता है जबकि शेष 10 प्रतिशत चर विस्तार से।

अगर उपरोक्त आधार पर आने वाले दशक के संभावित प्रतिफल पर नजर डाली जाए तो हालात मुश्किल नजर आते हैं। अगर हम यह भी मान लें कि विशुद्ध बिक्री पिछले दशक के 3 फीसदी की तुलना में तेजी से बढ़ सकती है तो भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए और आने वाली मंदी की आशंका तथा प्राय: धीमी वैश्विक वृद्धि को ध्यान में रखते हुए लगता नहीं कि यह 4 फीसदी से अधिक होगी।

हां, अगर मुद्रास्फीति पूरे दशक के दौरान ऊंची बनी रहती है तो जरूर स्थितियां अलग हो सकती हैं। इस वर्ष बाजार में 21.5 फीसदी की गिरावट नजर आ चुकी है उसके बावजूद चर और मार्जिन बढ़े हुए हैं।

चरों में कमी आई है लेकिन मार्जिन अपने उच्चतम स्तर से नीचे नहीं आया है। अगर मान लिया जाए कि चरों और मार्जिन में आगे कोई इजाफा या कमी नहीं होगी तो हम आशा कर सकते हैं कि बिक्री में 4 फीसदी वृद्धि होगी और लाभांश प्रतिफल 1.2 फीसदी बढ़कर आने वाले दशक में एसऐंडपी 500 के लिए प्रतिफल लगभग 5.5 फीसदी हो जाएगा। यह 16.6 फीसदी से काफी कम है।

बहरहाल, अगर यह मान लिया जाए कि चरों और मार्जिन का आंशिक सामान्यीकरण क्रमश: 15.5 और 10 फीसदी होगा तो हालिया गिरावट के बाद भी एसऐंडपी 500 एक दशक में सालाना औसतन करीब 3 फीसदी का प्रतिफल देगा। यह बात कई नजरियों से मायने रखती है। अगर अमेरिका में शेयरों का रिटर्न प्रोफाइल ऐसा है तो डॉलर में 8-10 प्रतिशत प्रतिफल वाले कॉर्पोरेट बॉन्ड की खरीद बुरी नहीं प्रतीत होती है। 

सन 1971 से अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो अमेरिकी बाजार ने जब भी 10 वर्ष की अवधि के लिए 6 फीसदी से कम प्रतिफल दिया है तब अंतरराष्ट्रीय शेयरों का प्रदर्शन 94 फीसदी मामलों में बेहतरीन रहा है। कह सकते हैं कि अब वक्त आ गया है जब अमेरिकी शेयर केंद्रीय भूमिका में नहीं रहेंगे। 

अब हालात ठीक नजर आ रहे हैं। अगर पैसा अमेरिकी शेयरों से बाहर जाता है तो उभरते बाजारों में भी उसका हिस्सा आएगा। भारत भी उनमें शामिल है। इसमें दो राय नहीं कि भारत के चर काफी सस्ते हैं। हमारे यहां मार्जिन बढ़ाने की गुंजाइश है क्योंकि कॉर्पोरेट भारत के पूंजीगत व्यय चक्र में जाने से खपत और निर्यात बढ़ते हैं।

हम अभी भी पीक मार्जिन के आसपास भी नहीं हैं। जब तक हम पूंजी का अनुशासन बरकरार रख सकते हैं बिक्री/शेयर वृद्धि मजबूत और दो अंकों में रहनी चाहिए। जब तक चरों में गिरावट नहीं आती, प्रतिफल बेहतर रहना चाहिए। सीमित मार्जिन विस्तार और कम लाभांश के साथ भी हम दो अंकों में प्रतिफल हासिल कर सकते हैं बशर्ते कि चरों में आने वाली कमी बहुत अधिक असर न डाले।

Keyword: शेयर बाजारों, अमेरिकी शेयरों,
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