बिजनेस स?टैंडर?ड - जलवायु सम्मेलनों की चर्चाओं से परे
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, December 09, 2022 03:10 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

जलवायु सम्मेलनों की चर्चाओं से परे

टी. एन. नाइनन /  11 11, 2022

पर्यावरण को लेकर आयोजित किए जाने वाले वैश्विक सम्मेलनों के बारे में पहले से अनुमान लगाया जा सकता है। आसन्न संकट की बात की जाती है, तमाम बयान दिए जाते हैं, बातचीत को अंतिम समय में टूटने से बचाने के लिए कुछ प्रतिबद्धताएं जताई जाती हैं और अंत में थके हुए प्रतिभागी अपने घरों को लौट जाते हैं। इसके बाद ज्यादा कुछ नहीं होता है।

अगर सम्मेलन में लक्ष्य तय करने का दबाव न हो तो इतना भी नहीं होगा। शायद यही वजह है कि बीते 50 वर्षों में यानी 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित पहले जलवायु सम्मेलन के बाद से अब तक पर्यावरण सुरक्षा को लेकर निराशा बढ़ती ही गई है। फिर भी यह सोचना गलत होगा कि कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। जो कुछ हासिल हुआ है, वह बहुत धीमी गति से हुआ है और इसकी कीमत भी गरीबों को चुकानी होगी।

वैश्विक परिदृश्य की तुलना एक हद तक दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों से की जा सकती है जो हर जाड़े में जहरीली गैस के चैंबर में बदल जाते हैं। दशकों से तबाही का अनुमान जताया जा रहा है और सुधार के कुछ कदम भी उठाए गए हैं लेकिन त्रासद हकीकत नहीं बदली है। 

सन 1972 में जब क्लब ऑफ रोम ने ‘लिमिट्स टु ग्रोथ’ नामक रिपोर्ट प्रकाशित की तब यह किताब बहुत बड़ी तादाद में बिकी लेकिन बहुत सारे लोगों ने उसके बुनियादी संदेश का मजाक भी बना दिया। इस किताब ने जहां प्रदूषण और संसाधनों को पहुंच रही क्षति को सामने रखा वहीं उसी वर्ष स्टॉकहोम में आयोजित सम्मेलन में कई विशेषज्ञों खासकर पश्चिमी देशों ने उसकी अवहेलना की। हालांकि 100 से अधिक देशों ने इसमें हिस्सा लिया लेकिन केवल दो सरकारों के प्रमुख पहुंचे। एक थे मेजबान देश के मुखिया और दूसरी थीं भारत की इंदिरा गांधी। परंतु इंदिरा गांधी ने यह कहकर गलत संदेश दे दिया कि गरीबी कहीं अधिक बड़ी प्रदूषक है।

चाहे जो भी हो वह एक अहम घटनाक्रम था। उसकी बीसवीं वर्षगांठ मनाने के लिए 1992 में रियो डी जनेरियो में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ का आयोजन किया गया जहां जलवायु परिवर्तन पर एक फ्रेमवर्क सम्मेलन तैयार किया गया।

उसके बाद सन 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल सामने आया जिसमें करीब तीन दर्जन विकसित देशों से कहा गया कि वे अपने कार्बन उत्सर्जन को सन 1990 के आधार स्तर से नीचे लाएं। इसकी पुष्टि में 2005 तक आठ वर्ष का समय लगा और समय-समय पर उत्सर्जन लक्ष्य तय किए गए। हर बार लक्ष्य पाने में चूक होती रही और आधार वर्ष नए सिरे से तय किया गया।

इसके बाद कोपेनहेगन-2009 और पेरिस-2015 जैसे अन्य सम्मेलन हुए। अब उत्सर्जन लक्ष्य के साथ कुछ सिद्धांत जोड़े गए। सबसे अहम सिद्धांत यह था कि प्रमुख प्रदूषक देश ही नुकसान को कम करने और उसे सीमित करने के लिए जवाबदेह हैं। अब कुछ के लिए यह विचार ही हास्यास्पद है।

हम कहां हैं? दुनिया तापमान में औद्योगिकीकरण के पहले के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस के इजाफे की दिशा में 80 फीसदी तक बढ़ चुकी है। चूंकि खतरे का निशान पार होने के बाद भी उत्सर्जन जारी रहेगा इसलिए संभव है कि तापमान बढ़कर औद्योगिकीकरण के पूर्व के स्तर से दो डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाए।

वातावरण में कार्बन उत्सर्जन के हिसाब से दुनिया उस दिशा में दो तिहाई से ज्यादा उसकी चपेट में आ चुकी है। जलवायु परिवर्तन का संकट आसन्न है। लाखों गरीब लोगों को इसकी कीमत चुकानी होगी। दुनिया के कई हिस्से रहने लायक नहीं बचेंगे। विभिन्न प्रजातियों के नष्ट होने की दर बढ़ जाएगी। सरकारों को पता चलेगा कि उनके पास पारिस्थितिकी, आर्थिक और इंसानी समस्याओं से निपटने के संसाधन नहीं हैं। इससे मुश्किलें और बढ़ेंगी।

अच्छी खबर यह है कि कई अमीर, औद्योगिकीकरण के पहले के मुल्कों ने उत्सर्जन कम करना शुरू कर दिया है। भारत समेत कई अन्य देशों ने आर्थिक गतिविधियों के लिए ऊर्जा की खपत कम की है। नवीनीकृत ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ा है। उत्सर्जन को शुद्ध शून्य करने का लक्ष्य अभी भी एक दशक दूर है लेकिन यह लक्ष्य तय कर पाना भी अपने आप में एक बड़ा काम है। इन 50 वर्षों से क्या सबक निकले?

सबसे पहली बात, इस समय शर्म अल-शेख में चल रहे सम्मेलन की तरह तमाम जलवायु सम्मेलनों में जुबानी जमाखर्च के बावजूद कोई प्रगति बमुश्किल ही होती है। कई बार तो प्रगति के बजाय प्रतिगामी स्थितियां बन जाती हैं। मिसाल के तौर पर यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद कोयले का विरोध करने वाले देशों ने ताप बिजली घरों को दोबारा शुरू कर दिया। दूसरी बात, निरंतर वादों के बावजूद कोई अमीर देश जलवायु परिवर्तन से निपटने में गरीब देशों की कोई खास मदद नहीं करने जा रहा है। जबकि इस समस्या के लिए गरीब देश जिम्मेदार नहीं हैं। 

तीसरी बात, बहुत कम ऐसे लोग हैं जो अपनी कार्बन उत्सर्जन वाली जीवनशैली को त्यागना चाहते हैं। उसके बिना तकनीक कुछ हल तो सुझाएगी लेकिन संपूर्ण उत्तर नहीं मिल सकेगा। आखिरी बात, वृद्धि के ध्वंसात्मक पहलू से तब तक नहीं निपटा जा सकेगा जब तक कि राष्ट्रीय खातों (जिनमें किसी देश की संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया जाता है) को पुनर्परिभाषित कर इस बात का ध्यान नहीं रखा जाए कि प्राकृतिक संसाधनों को कितना नुकसान पहुंचाया गया है। सन 2013 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के पार्थ दासगुप्ता की अध्यक्षता वाली एक समिति ने इसकी अनुशंसा की थी। इसकी रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय में धूल खा रही है। 

Keyword: पर्यावरण, वैश्विक सम्मेलनों,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या दरों में वृद्धि का चक्र अब थम जाएगा
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.