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क्या राजकोषीय दृष्टि से अपव्ययी हैं राज्य?

ए के भट्टाचार्य /  11 10, 2022

कुछ राज्यों पर यह आरोप लग सकता है कि उन्होंने राजकोषीय मोर्चे पर विवेक का परिचय नहीं दिया लेकिन इस मामले में सभी राज्यों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता है। बता रहे हैं ए के भट्टाचार्य  

इस बात को लेकर चिंता जताई गई है कि कुछ राज्य अत्यधिक उधारी ले रहे हैं जो राजकोषीय दृष्टि से विवेकसम्मत नहीं है और गैरजवाबदेही भरा है। परंतु ये चिंताएं कितनी गंभीर हैं? 

राज्यों के ऋण की स्थिति से जुड़े  आंकड़ों को देखें तो एक अलग कहानी सामने आएगी। नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के एक अध्ययन के मुताबिक 18 बड़े राज्यों का समेकित सार्वजनिक कर्ज 2019-20 के राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 20.53 फीसदी से बढ़कर 2020-21 में 23.5 फीसदी पहुंच गया। हालांकि उसके बाद इन राज्यों के कर्ज में धीमापन आया है लेकिन 2021-22 के संशोधित अनुमान में इन राज्यों का सार्वजनिक कर्ज थोड़ा बढ़कर 23.66 फीसदी हो गया और 2022-23 में इसके 23.93 फीसदी रहने की उम्मीद है।

व्यक्तिगत स्तर पर राज्यों के कर्ज पर नजर डालें तो हालात और स्पष्ट होते हैं। पंद्रहवें वित्त आयोग ने अक्टूबर 2020 की रिपोर्ट में राज्यों के कर्ज की स्थिति के बारे में कहा था कि उन्हें 2020-21 में इसे जीएसडीपी के 31.3 फीसदी से कम, 2021-22 में 30.7 फीसदी से कम और 2022-23 में 31.1 फीसदी से कम पर रखना चाहिए। परंतु इस मानक के हिसाब से केवल दो राज्यों पश्चिम बंगाल और पंजाब का कर्ज ज्यादा रहा जो क्रमश: 32.61 फीसदी और 42.17 फीसदी रहा। 2021-22 और 2022-23 में कर्ज का स्तर केवल बिहार और पंजाब में ही तय दायरे से अधिक रहने की बात कही गई है।

कहा जा सकता है कि पंजाब के कर्ज का स्तर निरंतर जीएसडीपी के 42-46 फीसदी के स्तर पर बना हुआ है। बिहार भी एक समस्या वाला राज्य है लेकिन उसका विचलन बहुत कम है। ध्यान रहे कि इन दो राज्यों के अलावा अन्य सभी 16 राज्य पंद्रहवें वित्त आयोग के मानक के भीतर रहे हैं। यकीनन 18 बड़े राज्यों का औसत कर्ज स्तर 2020-21 में 23.5 फीसदी, 2021-22 में 23.66 फीसदी और 2022-23 में 23.93 फीसदी रहने का अनुमान है जो आयोग के मानक से 7-8 फीसदी तक कम है। 

यह कहा जा सकता है कि 2022-23 में कर्ज का स्तर केवल बजट अनुमान पर आधारित है और इसलिए अभी जो चिंताएं जताई जा रही हैं उनके लिए चालू वर्ष में राज्यों का प्रदर्शन भी एक वजह हो सकता है। अब अधिकांश राज्यों के 2022-23 की पहली छमाही के लिए उधारी के आंकड़े उपलब्ध हैं और वे दिखाते हैं कि सभी राज्यों का प्रदर्शन नियंत्रण में है। यहां एक बार फिर बिहार और पंजाब से ही समस्या आ रही है। इस वर्ष इनकी उधारी 2021-22 की समान अवधि की तुलना में अधिक रही। 2022-23 की पहली छमाही में हिमाचल प्रदेश की उधारी का स्तर भी अधिक रह सकता है।

यह बात इनमें से ज्यादातर राज्यों की समग्र राजकोषीय सुदृढ़ीकरण योजना के लिए अच्छी साबित हो सकती है। राजकोषीय इरादों की बात करें तो कम से कम 10 बड़े राज्यों ने 2022-23 में अपना घाटा कम करने का प्रस्ताव सामने रखा है। इनमें बिहार और पंजाब ने अपने घाटे में उल्लेखनीय कमी करने की बात कही है जबकि ऐसा कहने वाले अन्य राज्य हैं छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश।

जिन राज्यों ने चालू वर्ष में घाटे में मामूली इजाफा होने की बात कही थी वे हैं आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड ने चालू वर्ष में घाटे में एक फीसदी से अधिक का इजाफा होने की बात कही है। ओडिशा ने भी 2021-22 के 0.38 फीसदी की तुलना में करीब 3 फीसदी के बढ़े हुए घाटे का अनुमान सामने रखा है। 

ऐसा नहीं है कि राज्यों के सामने राजकोषीय चुनौतियां नहीं हैं। उदाहरण के लिए 2022-23 के पहले छह महीनों में आंध्र प्रदेश और बिहार पहले ही पूरे वर्ष के घाटे का स्तर पार कर चुके हैं। ऐसा व्यापक तौर पर इसलिए हुआ क्योंकि उनका छमाही कर राजस्व पूरे वर्ष के अनुमानित राजस्व का बमुश्किल एक तिहाई रहा। बिहार की बात करें तो उसे केंद्र से अपेक्षित राजस्व सहयोग नहीं मिला।

इसके विपरीत राजकोषीय घाटे तथा कर राजस्व बढ़ाने के मामले में अन्य सभी राज्यों का प्रदर्शन बेहतर रहा है। अप्रैल-सितंबर 2022 में केंद्र का राजकोषीय घाटा पूरे वर्ष के बजट का 37 फीसदी रहने का अनुमान था। परंतु गुजरात, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने अपेक्षाकृत कम आंकड़े दर्शाए हैं। हिमाचल प्रदेश, केरल, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना सभी अपने बजट में उल्लिखित वार्षिक बजट घाटे के 50 फीसदी से नीचे के स्तर पर थे। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि उन्होंने कमतर उधारी का अनुमान जताया था और कर राजस्व में मजबूती हासिल की थी।

सवाल यह है कि ऐसे में राज्यों पर अतिशय उधारी करने या राजकोषीय विवेक न दिखाने का इल्जाम क्यों लगाया जा रहा है? कुछ राज्य यकीनन तय शुदा कर्ज स्तर से अधिक ऋण लेने वाले साबित हुए हैं या उन्होंने राजस्व मोर्चे पर गैरजवाबदेही दिखाई है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश बड़े राज्य उधारी और कर राजस्व दोनों ही मानकों पर सही हैं।

याद कीजिए कि केंद्र सरकार का कर्ज का स्तर भी सकल घरेलू उत्पाद के 60 फीसदी के असहज करने वाले स्तर के आसपास है। यदि केंद्र सरकार ने उपकरों और अधिभार से अपना राजस्व संग्रह न बढ़ाया होता तो राज्यों को केंद्रीय करों में और अधिक हिस्सेदारी मिलती और शायद उनके कर्ज की समस्या कम गंभीर होती।

बहरहाल, राज्यों के वित्त की मौजूदा स्थिति में एक कमी भी है। उनमें से किसी ने चालू वर्ष की पहली छमाही में अपना पूंजीगत व्यय बढ़ाने के प्रयास नहीं किए हैं। जिन दो राज्यों ने अपने वार्षिक पूंजीगत व्यय का 40 फीसदी से अधिक व्यय किया वे हैं केरल और गुजरात। अन्य सभी राज्यों का पूंजीगत व्यय उनके वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट के 15 फीसदी (हरियाणा) से 39 फीसदी (मध्य प्रदेश) के बीच रहा।

इस मामले में केंद्र सरकार का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा और उसने अपने वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट का 46 फीसदी खर्च किया। शायद अधिक खर्च नहीं करने की प्रवृत्ति राज्यों में राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने की चाह से आई होगी। परंतु उस समस्या को हल नहीं किया जा सकता है अगर राज्यों पर अतिरिक्त उधारी का आरोप लगता रहेगा। हालांकि यह इल्जाम सभी राज्यों पर साबित नहीं होता है। 

राज्यों को अधिक व्यय करना चाहिए, राजकोषीय दृष्टि से समझदारी दिखानी चाहिए और अतिरिक्त उधारी से बचना चाहिए लेकिन केंद्र को भी इस क्षेत्र में एक सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। वह इस प्रकार के शुल्क लगाने से बच सकता है जिससे कि संग्रहीत राजस्व में राज्यों को कोई हिस्सा नहीं मिलता है। केंद्र सरकार को राज्यों के साथ मशविरे की प्रक्रिया भी शुरू करनी चाहिए। केवल आरोप लगाने से बात नहीं बनेगी। 

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