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गति श​क्ति के सशक्तीकरण से जुड़े हैं कई लाभ

श्याम पोनप्पा /  11 09, 2022

यदि सही ढंग से अंजाम दिया जाए तो बुनियादी ढांचा नियोजन और क्रियान्वयन के लिए बना यह स्मार्ट प्लेटफॉर्म बहुत अ​धिक लाभदायक साबित हो सकता है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा

गति श​क्ति नामक एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लॉजि​स्टिक्स विकास के लिए राष्ट्रीय मास्टर प्लान अक्टूबर 2021 में पेश किया गया था। यह एक जरूरी पहल है जिसकी मदद से परिवहन और लॉजि​स्टिक्स के सभी पहलुओं को लेकर सभी प्रासंगिक मंत्रालयों के बीच समन्वय वाली प्रभावी प्रबंधन व्यवस्था पेश की जा सकती है।

यह व्यापक एकीकृत परियोजना नियोजन और क्रियान्वयन के लिए डिजिटलीकृत सांस्थानिक प्रक्रिया पेश करता है ताकि मंत्रालयों एवं अधोसंरचना क्षेत्रों के परिणाम हासिल करने में उनकी मदद की जा सके। इसका लक्ष्य कम लागत और समय में अधिक किफायती नतीजे हासिल करना है। यदि इस काम को सही ढंग से अंजाम दिया जा सके तो कम लागत और बेहतर पर्यावरण प्रभाव के साथ यह उत्पादकता के क्षेत्र में बहुत लाभदायक साबित होगा। 

गति श​क्ति का प्राथमिक उद्देश्य वृद्धि को प्राथमिकता देना है। इस बीच दूरसंचार सुधारों पर ध्यान देना अत्य​धिक आवश्यक है। जरूरत इस बात की है कि किफायती और उच्च क्षमता वाला संचार मुहैया कराया जाए। इसके लिए वायरलेस और साझा नेटवर्क के लिए कम पूंजी निवेश पर स्पेक्ट्रम इस्तेमाल की सुविधा देकर बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इस मंच की सफलता भी इसी बात पर निर्भर करती है। 

गति श​क्ति राष्ट्रीय परिवहन विकास नीति समिति द्वारा जनवरी 2014 में की गई अनुशंसाओं पर आधारित है। सरकारी एजेंसियों मसलन रेलवे, सड़क एवं राजमार्ग, नौवहन, विमानन, बिजली, दूरसंचार आदि इसका इस्तेमाल एकीकृत नियोजन और क्रियान्वयन के लिए करते हैं।

बीते वर्ष के दौरान उर्वरक, कोयला और बंदरगाह आदि के लिए उत्तरदायी मंत्रालयों ने करीब 200 अधोसंरचना संबंधी कमियों का पता लगाया। एक अंतर मंत्रालय विशेषज्ञ पैनल निगरानी करता है और उपयुक्त उपायों की अनुशंसा करता है। माना जा रहा है कि इसकी निगरानी डिजिटलीकृत डेटाबेस और पोर्टल के माध्यम से की जाएगी जिसमें भौगोलिक पोजिशनिंग क्षमताएं भी होंगी। 

पूंजी से अ​धिक महत्त्वपूर्ण है प्राथमिकता देना और नीतिगत बदलाव: जैसे कि हम पहले भी कह चुके हैं विश्व बैंक द्वारा अनेक देशों में कराया गया एक अध्ययन भी वृद्धि के लिए दूरसंचार और बिजली के महत्त्व की पु​ष्टि करता है। ए​शियाई विकास बैंक द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट भी कहती है कि भारत और चीन के मामले में इंटरनेट और मोबाइल का घनत्व तेज वृद्धि में योगदान करता है।

 अतीत के आंकड़ों से निकले इन निष्कषों के अलावा दूरसंचार और डिजिलटीकरण अब जीवन के ज्यादातर पहलुओं के लिए जरूरी हैं। सबसे अहम बात यह है कि दूरसंचार और इंटरनेट के क्षेत्र में नेटवर्क साझेदारी और करों में कमी जैसे बड़े नीतिगत सुधारों की जरूरत है। इसके लिए और अ​धिक पूंजी, नेटवर्क कवरेज बढ़ाने और आपूर्ति तेज करने की जरूरत होगी।

बदलाव के उदाहरणों के लिए उच्च गति वाले वायरलेस की जरूरत होगी वह भी बिना मनमानी लागत थोपे। नीतिगत बदलाव लाकर कीमतों को कम किया जा सकता है और सेवा प्रदाताओं के लिए प्रक्रियाओं को कम दिक्कतदेह बनाया जा सकता है। ऐसा करने से उपयोगकर्ताओं और व्यापक समाज की भी सुविधा बढ़ेगी। जब तक ऐसा नहीं होता, उपभोक्ता या तो सेवाओं से महरूम रहेंगे या फिर उन्हें कम गुणवत्ता वाली सेवा मिलेगी। यह भी हो सकता है कि उन्हें ऊंची कीमत चुकानी पड़े। इसका प्रभाव कई क्षेत्रों में नजर आ रहा है: पर्यावरण का ध्यान रखना और जलवायु संकट का शमन: प्रभावी ब्रॉडबैंड कवरेज और साझा नेटवर्क से दोनों में अहम सुधार आता है।

​शिक्षा और कार्य अव​धि की पहुंच: ब्रॉडबैंड कवरेज को ग्रामीण और दूरदराज रहने वाले लाखों लोगों तक पहुंचाना भी जरूरी है। यह बात उन शहरी लोगों के लिए भी सही है जिनको खराब सेवाएं मिलती हैं। कम ​शि​क्षित उपयोकर्ताओं को प्रभावी ढंग से ​शि​क्षित करने के लिए ढेर सारी सामग्री और तरीकों की आवश्यकता होगी। यही बात लागत कम करने पर भी लागू होती है। शायद यह इकलौती सेवा है जो इतनी तेजी से प्रसारित हो सकती है और हमारी आबादी को सकारात्मक ढंग से उत्पादक बना सकती है। इससे बड़ी तादाद में हमारे बच्चे-ब​च्चियों को ​शि​​क्षित करने में मदद मिलेगी और पुरुषों तथा महिलाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।

 ई-कॉमर्स, स्वास्थ्य सेवा वितरण, सरकारी सेवाओं और छोटे तथा मझोले विनिर्माण तथा सेवा उपक्रमों तथा मनोरंजन के क्षेत्र में भी ऐसे ही लाभ सामने आ सकते हैं। सन 1890 के दशक में आचार्य (सर) जगदीश चंद्र बोस ने 60 गीगाहर्ट्ज पर वायरलेस तकनीक का प्रदर्शन किया था लेकिन उनका यह प्रमुख काम भारत में ही पिछड़ गया। इस बीच अमेरिका, यूके तथा चीन आदि देशों ने इस तकनीक का लाभ लेकर उच्च गति वाले गीगाबिट वायरलेस का विकास किया।

देश में धार्मिकता को लेकर भी काफी संशय और सार्वजनिक संसाधन इस्तेमाल किए गए। बोस ने जहां 1917 में अपने आरंभिक भाषण में कोलकाता ​स्थित बोस इंस्टीट्यूट को न केवल एक प्रयोगशाला बल्कि एक मंदिर भी बताया। परमहंस योगानंद कहा करते थे कि भारत न केवल तत्वविज्ञान ब​ल्कि भौतिकी में भी नेतृत्व कर सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हम और अ​धिक भौतिकी तथा विज्ञान का इस्तेमाल कर सकते हैं तथा विज्ञान तथा अन्य व्यावहारिक अनुशासनों के और अ​धिक मंदिर स्थापित कर सकते हैं।

भारत ने हाल ही में 60 गीगाहर्ट्ज के सीमित इस्तेमाल की शुरुआत की है हालांकि ऐसे उपकरण विदेशों में वर्षों से मौजूद हैं। अगर सरकार दूरसंचार कंपनियों को इजाजत देती है कि वे बिना नीलामी या अतिरिक्त कर के 60 और 70-80 गीगाहर्ट्ज एमएमवेव तकनीक का इस्तेमाल करें तो देश को बहुत बड़े पैमाने पर लागत और सेवा संबंधी लाभ प्राप्त होंगे। सैन फ्रांसिस्को और लंदन में ऐसा देखने को मिल चुका है।

 अ​धिकृत संस्थानों और शोधकर्ताओं तक स्पेक्ट्रम की आसान पहुंच को संस्थागत बनाने के लिए भी बदलावों की आवश्यकता है ताकि देश में वा​णि​ज्यिक और रक्षा शोध को मनमानी और स्वयं आरोपित बाधाओं और देरी से बचाया जा सके। गति श​क्ति पोर्टल तक जो सार्वजनिक पहुंच सीमित थी वह अक्टूबर 2022 से उपलब्ध करा दी गई।

पोर्टल पर करीबी नजर डालने पर विभिन्न क्षेत्रों की परियोजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। एक आम उपयोगकर्ता के लिए यह ढेर सारी रिपोर्ट का अड्डा है जहां सार्थक जांच या उपयुक्त खोज नहीं की जा सकती है। ऐसी सुविधाएं शामिल करने से यह अ​धिक सूचनात्मक और उपयोगी हो जाएगी हालांकि इस दौरान सुरक्षा का ध्यान भी रखना होगा।

उपयुक्त बिंदु यह है कि जीवन स्तर सुधारने के लिए तकनीक को अपनाना और उसे लागू करना होता है। जमीनी हकीततों से निपटने के लिए वैज्ञानिक और डोमेन ऐप्लीकेशंस पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसा करके हम अपने बुनियादी ढांचे में सुधार कर सकते हैं ताकि उत्पादकता और जीवन जीने को सुगम बनाया जा सके। ​​डिजिलटीकरण और दूरसंचार को प्राथमिकता देकर हम गति और श​क्ति दोनों में सुधार कर सकते हैं।
Keyword: बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, नीति आयोग, गति श​क्ति,
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