बिजनेस स?टैंडर?ड - भारतवंशी विदेशी सितारों की कामयाबी और हम
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भारतवंशी विदेशी सितारों की कामयाबी और हम

अजित बालाकृष्णन /  November 08, 2022

यह चर्चा आम है कि भारतीय मूल के लोग विदेशों में बड़ी कंपनियों से लेकर देश तक संभाल रहे हैं। क्या ऐसे प्रतिभाशाली लोगों के लिए देश में भूमिकाएं नहीं तैयार करनी चाहिए? बता रहे हैं अजित बालाकृष्णन 

चंद रोज पहले जब ऋषि सुनक ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चुने गये तो हममें से कई भारतीयों ने यह सोचा कि काश हमें विंस्टन चर्चिल की एक झलक मिल पाती जो शायद ऑक्सफोर्डशायर में सेंट मार्टिन चर्चयार्ड में अपनी कब्र में करवट बदल रहे होंगे। बहरहाल, सुनक के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही सोशल मीडिया पर देश भर के मित्रों के संदेशों की भरमार हो गई: ‘क्या आपको पता था कि गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के प्रमुख भारतीय मूल के हैं।’

जाहिर है इस पर मैं यही कहता हूं कि यह मामला देश के तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा है तो भला मुझे कैसे नहीं पता होगा? इस बीच एक और तरह के संदेश मिलने का सिलसिला शुरू हुआ: ‘क्या आपको पता था कि पुतर्गाल के प्रधानमंत्री भारतीय हैं और हम शर्त लगाते हैं कि आपको पता नहीं होगा कि आयरलैंडके हालिया प्रधानमंत्री आधे भारतीय हैं। 

इसके अलावा यह भी अमेरिका की उपराष्ट्रपति आधी भारतीय हैं।’ क्या यह चकित करने वाली बात नहीं है कि जब दुनिया भर में यह सब हो रहा है तब हमारे अपने देश में बड़े कारोबारों का मालिकाना हक मालिकों के बेटों के हाथों में है, बॉलीवुड की बड़ी फिल्मों में फिल्मी सितारों की संतानें यानी बीते वर्षों के सितारों के बेटे-बेटियां दिखाई पड़ते हैं तथा हर बड़े राजनीतिक दल में राजनेताओं के बेटे नजर आते हैं। बीते सप्ताह मैं इसी बात पर विचार करता रहा और इस हक्काबक्का कर देने वाले विरोधाभास का मतलब निकालने की कोशिश करता रहा।

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था दशकों से मेरिट आधारित दाखिले की व्यवस्था अपनाती रही है। इसकी कोशिश उस सामंती सामाजिक व्यवस्था से निजात पाने की है जो आजादी के समय मौजूद था। परंतु अब हम पाते हैं कि हमारे मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और ऐसे ही अन्य संस्थानों के शीर्ष स्नातकों में से अनेक भारत के बाहर अपने लिए करियर के अवसर तलाश करते हैं जबकि हमारे कारोबारी घराने, राजनीतिक दल तथा अन्य संस्थान अभी भी पिता से पुत्र या पुत्री को विरासत सौंपने की सामंती व्यवस्था पर ही काम कर रहे हैं।

जब मैं अपनी स्मृतियों को खंगालता हूं तो मुझे याद आता है कि सन 1960 के दशक तक मेरे रिश्ते के सभी भाई-बहन जिन्होंने चिकित्सा शिक्षा ली थी वे सब अमेरिका चले गए थे। मैंने अभी पाया कि ऐसा सिर्फ मेरे भाई बहनों के साथ नहीं हुआ था। सन 2008 का एक अध्ययन दिखाता है कि सन 1989-2000 के बीच भारत के बेहतरीन मेडिकल कॉलेज यानी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली से चिकित्सा में स्नातक करने वालों में से 54 प्रतिशत अमेरिका चले गए थे।

जहां तक आईआईटी स्नातकों की बात है तो कई अध्ययन बताते हैं कि उनमें से करीब 20 प्रतिशत आगे पढ़ाई पूरी करने के लिए देश छोड़ देते हैं लेकिन इसी दौरान यह भी पता चला कि सन 1950 के दशक से ही 25,000 से 30,000 आईआईटी स्नातक अमेरिका में ही रह रहे हैं।

उद्योग जगत की एक वेबसाइट ने हाल ही में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों पर एक अध्ययन किया जो कहता है कि अमेरिका और भारत में दिए जाने वाले वेतन का अनुपात 2:1 का है। कहने की आवश्यकता नहीं कि वेतन का यह अंतर भी भारत के सॉफ्टवेयर सीमा उद्योग के 200 अरब डॉलर के निर्यात तथा 50 लाख लोगों के रोजगार के पीछे एक अहम कारक है। वह कौन सा घटनाचक्र है जो उच्च योग्यता वाले भारतीयों और भारतीय ज्ञान से चलने वाली कंपनियों को विवश करती है कि वे अपनी तकदीर संवारने के लिए विदेशों का रुख करें और घरेलू बाजार को परिवार आधारित कारोबारियों के सामंती ढांचे के भरोसे छोड़ जाएं। क्या इसकी वजह डॉलर और रुपये की विनिमय दर है? सन 1970 के दशक में जब मैंने काम करना शुरू किया था तब यह दर 8 थी जो अब 80 का स्तर पार कर चुकी है।या फिर हमारे बाजारों का छोटा आकार उनको विवश करता है? 

मुझे नैशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्चकी एक रिपोर्ट याद आती है जिसमें कहा गया था कि ऐसे परिवार जिनके मुखिया को प्रबंधकीय दायित्व वाला कहा जा सकता था उनकी तादाद तीन करोड़ थी और उनकी औसत आय बमुश्किल 13,000 रुपये प्रति माह तक थी। अगली ऊंची श्रेणी यानी पेशेवर और तकनीकी की श्रेणी में करीब पांच करोड़ परिवार शामिल थे और उनकी मासिक पारिवारिक आय भी करीब 13,000 रुपये प्रति माह ही थी। 

मैं इन आंकड़ों को भविष्य के प्रति निराशा दर्शाने के लिए नहीं पेश कर रहा हूं बल्कि मैं यह कहना चाहता हूं कि ऐतिहासिक रूप से बड़ा बदलाव तभी आता है जब सही मायने में कोई नवाचार होता है और ऐसे उत्पाद तैयार होते हैं जो किफायती ढंग से बदलाव ला सकें। उदाहरण के लिए सन 1906 में हेनरी फोर्ड ने अपनी पहली कार पेश की और लोगों को घोड़ा गाड़ी से दूर कर दिया। ऐसा इस तरह हुआ कि उनकी कार खरीदकर एक वर्ष तक चलाने का खर्च 1,364 डॉलर था जबकि घोड़े से चलने वाली बग्घी में यह खर्च 2,180 डॉलर था। ऐसा करके उन्होंने मुनाफा भी कमाया। वास्तविक नवाचार ऐसे ही होता है और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार के साथ बाजार तैयार करता है। 

हमें इस बात को लेकर भी सचेत रहने की आवश्यकता है कि इंटरनेट से संबद्ध तकनीकों में अगले दौर का नवाचार गति पकड़ रहा है और चैट बोट जैसी तेज गति से काम करने वाली तकनीक करीब-करीब इंसानी ढंग से काम करने लगी हैं तो ऐसे में बहुत बड़ी तादाद में कॉल सेंटर कर्मचारियों की नौकरियां खतरे में आ जाएंगी। हालांकि इन खतरों की अनदेखी की जा रही है लेकिन हम देख रहे हैं कि हमारी बड़ी टेक कंपनियां डिजिटल बदलाव के दृष्टिकोण को अपना रही हैं और विदेशी कंपनियों को तकनीकी श्रम सेवा मुहैया करा रही हैं ताकि वे अपने इंटरनेट आधारित कारोबार चला सकें। 

क्या यह बात इस मान्यता पर आधारित है कि भारत का घरेलू बाजार तकनीकी दृष्टि से जटिल चीजों के लिए बहुत छोटा है और परिणामस्वरूप भारतीय तकनीकी कंपनियों के लिए बेहतर यही है कि वे ऐसे किसी भी नवाचार आधारित रुख से दूरी बनाएं तथा केवल विदेशी कंपनियों को श्रम सेवा देने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखें।

क्या हम यह कर सकते हैं कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जुटाने या विदेशी मुद्रा बचाने अथवा रोजगार तैयार करने जैसे मसलों पर बहस करने के लिए सैकड़ों समितियां गठित करने के बजाय अपना ध्यान इस बात पर केंद्रित करें कि नवाचार की बदौलत तैयार होने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए बड़ा घरेलू बाजार किस प्रकार तैयार किया जा सकता है? क्या हमें यह सुनिश्चित करने की दिशा में कदम नहीं बढ़ाने चाहिए कि हमारी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं विदेश चले जाने के बजाय भारत में रहें और घरेलू बाजार में नवाचार को बढ़ावा दें।

Keyword: ऋषि सुनक, प्रधानमंत्री, ग्रेट ब्रिटेन, भारतवंशी विदेशी सितारों,
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