बिजनेस स?टैंडर?ड - रुपये में तेज गिरावट से क्यों हो रही घबराहट
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, November 29, 2022 02:14 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम अर?थव?यवस?था खबर

रुपये में तेज गिरावट से क्यों हो रही घबराहट

अजीत कुमार /  11 08, 2022

लगातार 10वें महीने अक्टूबर में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में नरमी देखी गई। वर्ष 1985 के बाद यह पहला मौका है जब लगातार इतनी लंबी अवधि तक रुपये में गिरावट बनी रही है। पिछले महीने 19 अक्टूबर को रुपया 83.02 के अपने सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ था। इसके अगले दिन यानी 20 अक्टूबर को तो यह कारोबार के दौरान 83.29 के निचले स्तर तक आ गया। हालांकि 7 नवंबर को लगातार दूसरे दिन रुपये में थोड़ा सुधार दिखा और यह डॉलर के मुकाबले 81.92 के स्तर पर बंद हुआ। मौजूदा कैलेंडर वर्ष में रुपये में अभी तक 9.3 फीसदी की नरमी आ चुकी है। 

भारतीय मुद्रा में लगातार जारी कमजोरी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका में ब्याज दरों में की जा रही बढ़ोतरी है। बीते सप्ताह 1 से 2 नवंबर तक चली बैठक के बाद फेडरल रिजर्व ने लगातार चौथी बार ब्याज दरों में 0.75 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा की और मौद्रिक नीति को लेकर रुख में सख्ती बरकरार रखने के स्पष्ट संकेत भी दिए। फेडरल रिजर्व ने इस बैठक में ब्याज दर को बढ़ाकर 3.75 से लेकर 4 फीसदी कर दिया जो कि 15 वर्षों में (यानी 11 दिसंबर 2007 के 4.25 फीसदी के बाद) सबसे ज्यादा है। यह इस साल फेड की तरफ से ब्याज दरों में की गई छठी बढ़ोतरी है। बैठक के बाद फेडरल रिजर्व के प्रमुख जेरोम पॉवेल ने कहा कि आने वाले समय में मुद्रास्फीति में वृद्धि की संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति को और सख्त करने पर गंभीरता से विचार करेगा। इससे पता चलता है कि फेड महंगाई पर काबू पाने के लिए आगे भी ब्याज दरों में आक्रामक रूप से बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि उन्होंने इसकी रफ्तार कम होने के संकेत भी दिए।

जानकारों के अनुसार मौद्रिक नीति को लेकर अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख में नरमी नहीं आती है तो अगले एक-दो महीने में रुपया 84 के स्तर तक नीचे जा सकता है। मौद्रिक नीति को लेकर फेड की बैठक अब अगले महीने दिसंबर में 13 और 14 तारीख को होगी। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक रुपये में हालिया आई तेजी के टिकने की संभावना कम है क्योंकि अमेरिकी फेड की तरफ से मौद्रिक नीति में आगे नरमी बरते जाने को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं आए हैं। अमेरिका में इसी सप्ताह गुरुवार को आने वाले महंगाई आंकड़ों पर अब सब की नजर होगी। 

रुपये में जारी इस गिरावट की वजह से घरेलू अर्थव्यवस्था को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आम लोगों की परेशानी भी काफी बढ़ी है। आज बात करते हैं रुपये में जारी कमजोरी की वजहों पर। यह भी समझते हैं कि आखिर लोगों को इससे कैसे परेशानी हो रही है। अर्थव्यवस्था पर इसके पड़ने वाले असर को भी समझेंगे। साथ ही इसके सकारात्मक पहलू पर भी बात करेंगे।

रुपये में उतार चढ़ाव के मायने

रुपये के ​विनिमय दर में बदलाव का आयात और निर्यात से सीधा संबंध है। जब डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य बढ़ता है तो आयात सस्ता हो जाता है और जब रुपये का मूल्य डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है। वहीं जब रुपया, डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो हमारा निर्यात वै​श्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी यानी सस्ता हो जाता है। 

उदाहरण के लिए, मान लें कि किसी उत्पाद की कीमत 10 डॉलर है। एक भारतीय ग्राहक के लिए जब भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले 70 रुपये पर चल रही थी तो उस उत्पाद के आयात की कुल लागत 700 रुपये होती थी। मौजूदा स्थिति के साथ इसकी तुलना करें, जब रुपया 82 के स्तर पर है तो भारतीय ग्राहक के लिए इसकी लागत होगी 820 रुपये।

वहीं जब डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा की कीमत 70 रुपये थी, भारतीय निर्यातक को 10 डॉलर की कीमत वाले उत्पाद के लिए 700 रुपये मिलते थे। जबकि अभी निर्यातक को 820 रुपये मिलेंगे।

जब हम आयात करते हैं तो अमेरिकी डॉलर खरीदने और भारतीय रुपये बेचने की जरूरत होती है। हमारा आयात जितना अधिक होता है, डॉलर की मांग उतनी ही अधिक होती है, जिसके परिणामस्वरूप रुपये के मुकाबले डॉलर की कीमत बढ़ जाती है।

डॉलर का जाना, रुपये का गिर जाना  

अमेरिकी डॉलर में जारी तेजी, आयात में भारी बढ़ोतरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली रुपये में तात्कालिक गिरावट के लिए मुख्यतया जिम्मेदार है। अब एक-एक कर इन सभी वजहों पर बात करते हैं

 अमेरिकी डॉलर में जारी तेजी 

अमेरिका में ब्याज दरों में तेजी, सख्त मौद्रिक नीति और यूक्रेन संकट के मद्देनजर पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी डॉलर विश्व की अन्य मुद्राओं की तुलना में लगातार मजबूत हुआ है। परिणामस्वरूप अन्य देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं और रुपया भी इससे अछूता नहीं है। विश्व की 6 अन्य प्रमुख मुद्राओं की तुलना में अमेरिकी डॉलर के प्रदर्शन को दर्शाने वाला सूचकांक, यूएस डॉलर सूचकांक कैलेंडर वर्ष 2022 में अभी तक 15.44 फीसदी और पिछले एक साल में 17.46 फीसदी मजबूत हुआ है।

फिलहाल यह 20 वर्षों के अपने उच्चतम स्तर 110.79 पर है। जिस तरह से अमेरिका में महंगाई रिकॉर्ड स्तर (40 वर्षों के उच्चतम स्तर) पर बनी हुई है, इस बात की संभावना प्रबल है कि वहां का केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी जारी रख सकता है, जिससे अमेरिकी डॉलर को और मजबूती मिल सकती है। परिणामस्वरूप रुपया सहित विश्व की अन्य मुद्राओं पर आने वाले समय में दबाव और आएगा।

हालांकि संतोष की बात यह है कि विश्व की कुछ अन्य प्रमुख मुद्राओं की तुलना में भारतीय रुपये में कमजोरी अभी भी कम है। अमेरिका में सितंबर में महंगाई दर 8.2 फीसदी रही। मुख्य महंगाई दर (खाद्य और ऊर्जा को छोड़कर) में वार्षिक 0.6 फीसदी की तेजी रही। इतनी तेजी अगस्त 1982 के बाद पहली बार देखी गई है। इसी वर्ष जून में तो अमेरिका में महंगाई दर 9.1 फीसदी के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी।

 आयात में भारी बढ़ोतरी

यूक्रेन संकट की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल से भारत का आयात बिल काफी बढ़ा है। हालांकि रिकॉर्ड स्तर से कच्चे तेल की कीमतों में अच्छी खासी नरमी आई है। फिर भी कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमतों में इस कैलेंडर वर्ष में तकरीबन 25 फीसदी और पिछले एक साल में 17 फीसदी का इजाफा हुआ है। इसको इस बात से समझिए कि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) के दौरान पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर 76 फीसदी ज्यादा खर्च करने पड़े हैं जबकि आयात की मात्रा में महज 15 फीसदी का इजाफा हुआ है।

गौरतलब है कि भारत कच्चे तेल (पेट्रोलियम) की अपनी कुल जरूरतों का तकरीबन 85 फीसदी आयात करता है। फलस्वरूप व्यापार घाटे (निर्यात से ज्यादा आयात) सहित चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी हुई है। घरेलू स्तर पर आपूर्ति संकट के चलते कोयले के आयात में बढ़ोतरी के साथ इलेक्ट्रॉनिक सामान और उर्वरकों के आयात में तेजी ने भी व्यापार घाटे को बढ़ाया है।

निर्यात की तुलना में अधिक आयात के कारण चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने (अप्रैल-सितंबर) में व्यापार घाटा दोगुना बढ़कर 148.46 अरब डॉलर पर पहुंच गया है जो एक साल पहले अप्रैल-सितंबर में 76.25 अरब डॉलर था। बढ़ते व्यापार घाटे को देखते हुए मौजूदा वित्त वर्ष यानी 2022-23 में चालू खाते का घाटा बढ़कर जीडीपी के 3 फीसदी से ऊपर रह सकता है जो मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी का 2.8 फीसदी था। वित्त वर्ष 2021-22 में तो यह जीडीपी का महज 1.2 फीसदी था।

 विदेशी निवेशकों की बिकवाली 

रुपये में कमजोरी की एक बड़ी वजह अमेरिका सहित विश्व के अन्य विकसित देशों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी अनिश्चितता की वजह से विदेशी संस्थागत निवेशकों की तरफ से की जा रही बिकवाली है। मौजूदा कैलेंडर वर्ष 2022 में अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 21.65 अरब डॉलर की निकासी की है, जबकि 2021 में शुद्ध आमद 7 अरब डॉलर, 2020 में 14 अरब डॉलर और 2019 में 19 अरब डॉलर थी।

सरल शब्दों में कहें तो भारत में इस साल डॉलर के आमद में कमी आई है। जिस वजह से भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ा है। सामान्यतया जब व्यापार घाटा ज्यादा होता है तो भुगतान संतुलन के घाटे की भरपाई विदेशी निवेश (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और  विदेशी संस्थागत निवेश) से होती है। लेकिन विदेशी संस्थागत निवेशकों की तरफ से जारी बिकवाली के चलते देश के विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल इस घाटे की भरपाई में हो रहा है।

परिणामस्वरूप, देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 21 अक्टूबर को खत्म हुए सप्ताह के दौरान घटकर 524.52 अरब डॉलर रह गया। यह पिछले दो साल से ज्यादा का निचला स्तर है। हालांकि 28 अक्टूबर को खत्म हुए सप्ताह के दौरान इसमें 6.56 अरब डॉलर की बढ़त देखने को मिली। इसी साल मार्च के अंत में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 607 अरब डॉलर था। पिछले साल 3 सितंबर को खत्म हुए सप्ताह के दौरान यह बढ़कर 642.453 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया था। मतलब साफ है, अगर चालू खाते का घाटा ज्यादा होगा तो पर्याप्त विदेशी निवेश के अभाव में भारत को मजबूरन इस घाटे की भरपाई के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर निकालना होगा।

अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर असर 

 महंगाई

कोविड के बाद मांग में आए उछाल, आपूर्ति को लेकर जारी व्यवधान, और प्रतिकूल मौसम की वजह से उत्पादन में आई कमी के मद्देनजर वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमतें पहले से ही आसमान छू रही है वहीं रुपये में कमजोरी ने घरेलू स्तर पर इसे और बढ़ा दिया है । भारतीय रिजर्व बैंक की गणना के मुताबिक रुपये में हर 5 फीसदी की गिरावट महंगाई में 10 से 15 आधार अंक की बढ़ोतरी करती है। जब रुपये में कमजोरी आती है तो हर वह चीज जो आयात की जाती है मसलन- पेट्रोलियम पदार्थ, उर्वरक, खाद्य तेल, कोयला, सोना, रसायन, आदि की  कीमतों में इजाफा होता है क्योंकि इसके एवज में हमें ज्यादा रुपये चुकाने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इन आयातित चीजों का कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल करके बनने वाली वस्तुओं की लागत भी बढ़ जाती है, मसलन कंप्यूटर्स, स्मार्टफोन और कारें आदि। 

पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से वस्तुओं और सेवाओं का ढुलाई खर्च भी बढ़ जाता है और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती है। महंगाई के आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं। महंगाई के आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं। सितंबर महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 7.41 फीसदी पर जा पहुंची, जो लगातार नौवें महीने भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक दायरे से ज्यादा है। अगस्त में यह 7 फीसदी और जुलाई में  6.71 फीसदी रही थी।

 निर्यात

रुपये में गिरावट को आम तौर पर निर्यात करने वालों के लिए अच्छी खबर माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि रुपये में गिरावट होने पर विदेशी बाजार में भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की कीमत कम हो जाती है, जिससे उनकी मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है। साथ ही डॉलर में मिलने वाले भुगतान को रुपये में एक्सचेंज करने पर मिलने वाली रकम बढ़ जाती है। लेकिन अगर निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल हुआ है, मसलन रत्प एवं आभूषण, पेट्रोलियम उत्पादों, ऑर्गेनिक केमिकल्स, ऑटोमोबाइल उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल्स आदि या आयात किए जाने वाले देश की मुद्रा भारतीय रुपये के मुकाबले कमजोर हुई है  तो रुपये में गिरावट का फायदा नहीं होता है।

हां, कुछ क्षेत्रों जैसे कि सेवा (सर्विस) से संबंधित आईटी व श्रम केंद्रित  टेक्सटाइल क्षेत्र को फायदा होता है। इसके अलावा ऐसे उत्पाद जिनमें आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल न हुआ हो या हम ऐसे किसी देश को आयात कर रहे हों जहां की मुद्रा में कमजोरी भारतीय मुद्रा की तुलना में कम हो, तो रुपये में कमजोरी का फायदा होता है। उद्योग के आकलन के मुताबिक कम से कम 50 फीसदी निर्यातित वस्तुओं के निर्माण में आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल होता है। वैश्विक स्तर पर मांग में कमी, बढ़ती महंगाई और मुद्रा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव की वजह से निर्यातकों के लिए मौजूदा समय ऐसे भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

 घरेलू उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता

कमजोर रुपया घरेलू उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाता है। जैसे-जैसे आयात का मूल्य बढ़ता है, यह आयातित वस्तुओं और सेवाओं की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी करता है। परिणामस्वरूप आयातित सामानों  के मुकाबले घरेलू सामान अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं और उपभोक्ता देश में उत्पादित सस्ते सामानों की ओर रुख करते हैं। इस तरह की स्थिति वैसी घरेलू कंपनियों के हित में हो सकती हैं जिन्हें सस्ते आयात से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।

 विदेशी कर्ज और ब्याज का बोझ

रुपये में गिरावट का एक बहुत बड़ा और सीधा नुकसान यह होता है कि इससे विदेशी मुद्रा में लिए गए सारे कर्ज और उन पर दिए जाने वाले ब्याज में अचानक बढ़ोतरी हो जाती है। इनमें सरकार द्वारा लिए गए विदेशी लोन के अलावा सरकारी और निजी बैंकों और कंपनियों द्वारा लिए गए विदेशी मुद्रा में कर्ज भी शामिल हैं। इन सभी कर्जों पर अदा किए जाने वाले ब्याज की रकम रुपये में गिरावट से अचानक बढ़ जाती है। अगर उस कंपनी या बैंक की ज्यादा कमाई रुपये में होती है तो उसके लिए विदेशी मुद्रा में कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाना पहले से ज्यादा महंगा हो जाता है।

 ऋण और जमा पर ब्याज

अगर रुपये में कमजोरी की वजह से महंगाई एक तय सीमा से ज्यादा बढ़ती है तो भारतीय रिजर्व बैंक को रीपो दर में बढ़ोतरी करना होता है, जैसा कि केंद्रीय बैंक अभी कर रही है। जिससे बैंक उधारी दर बढ़ा देते हैं। फलस्वरूप कर्ज महंगा हो जाता है। वहीं बैंक जमा दरों में भी बढोतरी करते हैं जिससे जमाकर्ताओं को फायदा मिलता है। रीपो दर में बढ़ोतरी के बाद सरकार की छोटी बचत योजनाओं, मसलन पीपीएफ, सुकन्या आदि पर भी ब्याज बढ़ने की संभावना बढ जाती है। केंद्रीय बैंक ने मई से लेकर अब तक ब्याज दरों में 190 आधार अंक यानी 1.90 फीसदी की बढ़ोतरी की है।

 अन्य नुकसान और फायदे

रुपये में कमजोरी से अन्य परेशानियां भी होती है, मसलन अगर हम देश से बाहर छुट्टियां मनाने या विदेश घूमने जाते हैं तो हमें ज्यादा रुपये खर्च करने होगें।। विदेश में पढ़ाई महंगी हो जाती है। वहीं रुपये में कमजोरी का एक फायदा यह है कि विदेश में रह रहे लोग अगर देश में अपने रिश्तेदार को पैसा भेजते हैं तो रिश्तेदार को ज्यादा रुपये मिलेंगे।

Keyword: रुपये, डॉलर, गिरावट, ब्याज दरों,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या श्रीलंका में रुपये को विदेशी मुद्रा बनाने से बढ़ेगा लेनदेन
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.