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साथ-साथ चल सकते हैं आस्था और विकास

आर जगन्नाथन /  11 07, 2022

यह एक मिथक है कि चर्चित और मशहूर धार्मिक और राजनीतिक परियोजनाओं का विकास से कुछ लेनादेना नहीं होता है। इस विषय में विस्तार से अपनी राय रख रहे हैं आर जगन्नाथन 

गत माह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बड़े आयोजनों में शिरकत की। इनमें से अधिकांश को राजनीतिक प्रकृति का माना गया। ऐसा ही एक अवसर था रोजगार मेले की शुरुआत जहां 75,000 लोगों को सरकारी नौकरियों के नियुक्ति पत्र सौंपे गए। यह आयोजन प्रधानमंत्री के उस वादे से जुड़ा था जिसमें उन्होंने 2024 के आम चुनाव तक 10 लाख रोजगार के अवसर तैयार करने की बात कही थी।

गुजरात चुनाव के पहले राज्य में तीन बड़ी परियोजनाओं की बात कही गई और ये हैं वेदांत-फॉक्सकॉन सेमीकंडक्टर फैक्टरी, एयरबस-टाटा सैन्य परिवहन विनिर्माण संयंत्र और आर्सेलरमित्तल-निप्पॉन स्टील विस्तार परियोजना। तीसरी घटना में अयोध्या के दीपोत्सव का टेलीविजन पर भव्य प्रसारण हुआ जहां 18 लाख दिए जलाए गए और पटाखों के साथ-साथ लेजर शो का शानदार प्रदर्शन किया गया। 

इन आयोजनों में चुनाव की आहट है। यह संदेश दिया जा रहा है कि मोदी सरकार विकास, रोजगार और हिंदुओं की धार्मिक मान्यता को लेकर काम कर रही है। ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दकोश में विकास को अक्सर आस्था के खिलाफ रखा जाता है। यह भी एक वजह है कि आखिर क्यों राम जन्मभूमि विवाद के लिए एक हल यह सुझाया गया कि वहां अस्पताल या शैक्षणिक संस्थान बना दिया जाए। खुशकिस्मती है कि सर्वोच्च् अदालत ने ऐसा कुछ नहीं सोचा और राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त हुआ।

इसके चलते लाखों हिंदू और पर्यटक अयोध्या की ओर आकर्षित हुए। विकास और आस्था को विरोधी मानना एक मिथक है। ये साथ-साथ चलते हैं। प्रधानमंत्री 2014 में पद संभालने के बाद से लगभग हर दूसरे वर्ष हिंदू धार्मिक (और राजनीतिक) परियोजनाओं का उद्घाटन करते आए हैं।

इसकी शुरुआत 2016 में चार धाम राजमार्ग से हुई थी। 2017 में कोयंबटूर में सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा स्थापित आदियोगी (शिव) की प्रतिमा का लोकार्पण, 2020 में राम मंदिर भूमि पूजन, 2021 में काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर और इस वर्ष के आरंभ में हैदराबाद में वैष्णव संत श्री रामानुजाचार्य को समर्पित स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी का उद्घाटन। इस बीच 2018 में मोदी ने अपने गृह राज्य यानी गुजरात में दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा सरदार पटेल के स्टैच्यू को लोकार्पित किया था।

इस मिथक को समाप्त करने की आवश्यकता है कि ऐसी बड़ी धार्मिक और राजनीतिक परियोजनाओं का विकास से संबंध नहीं। एक लोकप्रिय मंदिर का केवल धार्मिकता से रिश्ता नहीं होता। यह कारोबार, परोपकार और अधोसंरचना का एक पूरा माहौल भी रचता है। सड़क और अधोसंरचना में समय के साथ सुधार होता है, अतिथिगृह और होटल तथा रेस्टोरेंट खुलते हैं, छोटे और मझोले कारोबार पनपते हैं ताकि आने वाले तीर्थयात्रियों को सुविधाएं प्रदान की जा सकें। 

तिरुमाला-तिरुपति देवस्थानम् भारत का सबसे समृद्ध मंदिर है और इसका वार्षिक बजट 3,000 करोड़ रुपये से अधिक है। यह राशि सिक्किम जैसे छोटे राज्यों के आंतरिक राजस्व से भी अधिक है। मान कर चलिए कि 2024 में जब 1800 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा अयोध्या मंदिर खुलेगा तो वह आर्थिक प्रभाव के मामले में तिरुपति अथवा वैश्विक पहचान वाले स्मारक ताजमहल को कड़ी टक्कर देगा।

अयोध्या केवल हिंदुओं के लिए आकर्षण का केंद्र नहीं होगा बल्कि वह दुनिया भर के पर्यटकों को आकृष्ट करेगा। यह देश के सबसे गरीब इलाकों में आने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत मददगार साबित होगा। राजनीतिक और धार्मिक परियोजनाओं का आर्थिक प्रभाव अक्सर तात्कालिक राजनीतिक लाभों से अधिक होता है। मोदी ने 2018 में सरदार पटेल की मूर्ति का उद्घाटन किया था लेकिन कोविड के पहले टिकट बिक्री और लेजर शो से आने वाले राजस्व के शुरुआती अनुमानों से यही लगा था कि यह ताजमहल को टक्कर देगा। अयोध्या इस मामले में काफी मददगार साबित होगा।

इसी तरह माना जा सकता है कि अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद मुस्लिम पक्ष को जो जमीन हर्जाने में दी गई है वहां बनने वाली मस्जिद भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनेगी। इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लिए भी तरक्की का एक विशिष्ट माहौल तैयार होगा। अगर हम इस परिकल्पना को स्वीकार कर लें तो काशी और मथुरा विवादों को हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच बातचीत करके हल करने के न केवल राजनीतिक निहितार्थ हैं बल्कि आर्थिक असर भी हैं।

क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें अयोध्या फैसले के तर्ज पर क्षतिपूर्ति की जा सकती है। यहां हमारे विश्लेषण में कॉर्पोरेट जगत के दो उदाहरण उपयोगी हैं। पहला, बड़े कारोबारी समूह जब अपने असंबद्ध कारोबारों को अलग-अलग करते हैं तो अक्सर उनमें तेज वृद्धि हासिल होती है और उनके शेयरधारकों के लिए भी मूल्यवर्द्धन होता है। धार्मिक संदर्भों में इसे इस तरह देख सकते हैं कि मंदिर से अलग होकर नई मस्जिद का निर्माण दोनों को अपने लिए अलग सहायक माहौल तैयार करने में मदद करेगा। अगर विवाद को हल करने के बजाय बढ़ने दिया जाता तो शायद ऐसा नहीं होता।

क्या यह उचित नहीं होगा कि विशुद्ध आर्थिक आधार पर काशी और मथुरा के साथ भी ऐसा ही हो। कोई धार्मिक समुदाय नहीं चाहता कि वह दूसरे के साथ जगह साझा करे। दूसरा विचार निजीकरण का है। यह भी व्यापक रूप से स्वीकार्य अवधारणा है कि सरकारी परिसंपत्तियों को निजी हाथों में सौंपकर उनकी अच्छी खासी कीमत जुटाई जाए। यहां बात आती है उन मंदिरों की जो पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में हैं। ऐसे करीब एक लाख मंदिर तो दक्षिण भारत के पांच राज्यों में ही हैं।

यदि अगले पांच से दस वर्षों में उपयुक्त विधायी बदलावों के बाद इन मंदिरों का निजीकरण कर दिया जाता है तो श्रद्धालुओं और अंशधारकों के प्रबंधन के अधीन वे विकास के वाहक बन सकते हैं। यकीनन कोई निजी समूह तत्काल बड़े मंदिरों के संचालन के लिए तैयार नहीं होगा लेकिन यह क्षमता तैयार की जा सकती है। पहले छोटे मंदिरों को मुक्त किया जा सकता है ताकि स्थानीय समुदाय अपने दम पर उनका प्रबंधन करे।

यदि निजी क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण शेयरधारकों के लिए बेहतर है तो मंदिरों पर भी यही दलील लागू होनी चाहिए। यदि आकलन यह है कि उपासना स्थलों को सरकार के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए तो क्या यही बात गिरजाघरों और मस्जिदों पर भी लागू नहीं होती? उन तमाम मंदिरों की तो बात ही छोड़ दें जिनका संचालन पहले ही निजी रूप से और विभिन्न मठों द्वारा किया जा रहा है। 

यह नेहरूवादी राज्य की एक हास्यापद बात थी कि केवल स्टील प्लांट, बांध और आईआईटी ही आधनिुक भारत के मंदिर हैं। इस प्रक्रिया में आर्थिक वृद्धि के कहीं अधिक भावनात्मक स्वरूप की अनदेखी की गई जो धार्मिक संस्थानों और मंदिरों द्वारा संचालित है। अब वक्त आ गया है कि इस मिथक को खत्म किया जाए कि धार्मिक बुनियादी ढांचा और निर्माण संकीर्ण मनोदशा से जुड़े हैं जबकि राजमार्ग और दूरसंचार आदि अच्छे विकास व्यय के परिचायक हैं।

दोनों सार्वजनिक हित से जुड़े हैं और उनमें वृद्धि और आजीविका तैयार करने की जबरदस्त संभावना होती है। धार्मिक परियोजनाओं से जुड़ा बुनियादी ढांचा और विनिर्माण न केवल धर्मनिरपेक्ष ढंग से नागरिकों की मदद करते हैं बल्कि वे भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भी मददगार होते हैं।

समृद्ध और आत्मविश्वास से भरे लोगों के देश को विकास और आस्था के बीच चयन नहीं करना पड़ता। खासकर तब जब समाजवादियों और उदारवादियों ने उसे संकीर्ण अंदाज में परिभाषित किया हो। यदि धर्म जनता के लिए अफीम है तो आत्मा से रहित विकास भारत के ‘धर्मनिरपेक्ष समाजवादी उदारवादियों’ के लिए अफीम है। विकास और आस्था साथ-साथ चल सकते हैं।

Keyword: आस्था और विकास, नरेंद्र मोदी, धार्मिक और राजनीतिक,
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