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ईडब्ल्यूएस आरक्षण

बीएस संपादकीय /  11 07, 2022

सर्वोच्च न्यायालय ने तीन और दो न्यायाधीशों के बंटे हुए निर्णय के साथ सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण की व्यवस्था को बरकरार रखा है। इससे देश में अफर्मेटिव ऐक्शन को लेकर चलने वाली बहस में एक नया पहलू खुला है। अफर्मेटिव एक्शन ऐसे कदम हैं जिनकी मदद से महिलाओं, दलितों, वंचितों और अल्पसंख्यकों के साथ अतीत में हुए भेदभाव को दूर करने के लिए उन्हें समुचित आर्थिक और शैक्षणिक अवसर मुहैया कराए जाते हैं।

पांच न्यायाधीशों वाले पीठ के तीन न्यायाधीशों ने 103वें संविधान संशोधन की हिमायत की जिसे संसद ने जनवरी 2019 में पारित किया था। उन्होंने कहा कि यह कोटा संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है। हालांकि शेष दो न्यायाधीशों ने उनकी इस बात से असहमति जताई। एक ऐसा कानून जो सालाना आठ लाख रुपये से कम कमाने वाले सवर्ण परिवारों को आरक्षण मुहैया कराता है वह निश्चित रूप से उस आरक्षण नीति की भावना के साथ छेड़छाड़ करता है जो मूल रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और बाद में पिछड़े वर्ग के साथ ऐतिहासिक रूप होते आ रहे अन्याय को दूर करने पर केंद्रित थी।

इस बात के कोई प्रमाण नहीं है जिससे पता चले कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के प्रति भी वैसे ही पूर्वग्रह हैं। निश्चित रूप से यह एक तथ्य है कि पिछड़ा वर्ग की आरक्षण नीति में भी ‘क्रीमी लेयर’ के लिए वही आठ लाख रुपये की आय वाला फॉर्मूला लगता है और इससे यही संकेत निकलता है कि 103वें संविधान संशोधन के लिए अपनाए गए मानक बहसतलब हैं। इतना ही नहीं दो असहमत न्यायमूर्तियों मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित (जिनका कार्यकाल आज समाप्त हो गया है) और रवींद्र भट ने अपने तर्कों में कहा कि हालांकि यह संशोधन अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग को इस कोटे के दायरे से बाहर रखकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए अवसर तैयार करता है लेकिन यह संशोधन ‘भेदभाव के संवैधानिक रूप से निरुद्ध सिद्धांत’ को व्यवहार में लाता है।

 कानूनी दलीलों से इतर आलोचकों ने इस कानून की राजनैतिक प्रकृति की ओर भी ध्यान दिलाया है और आरोप लगाया है कि सत्ताधारी दल इस कानून का लाभ अपने पारंपरिक उच्च वर्ग के मतों को एकजुट करने में ले रहा है। संभव है कि यह भी इरादा रहा हो लेकिन यह बात भी सही है कि मुस्लिमों की बड़ी आबादी आठ लाख रुपये की इस आय सीमा के भीतर आएगी और सैद्धांतिक तौर पर वे भी इससे लाभान्वित होंगे।

इसके अलावा अगर सामाजिक न्याय इस कानून का मानक है तो अन्य प्रश्न भी पैदा होते हैं: आबादी में 18 फीसदी हिस्सेदारी के अनुपात में ईडब्ल्यूएस कोटा 10 फीसदी है जिससे आगे चलकर कुछ असंतोष उत्पन्न हो सकता है। इसके उलट अनुसूचित जाति और जनजाति का कोटा अपेक्षाकृत अधिक है और उन्हें क्रमश: आबादी में 20 और 9 फीसदी हिस्सेदारी पर 15 और 7.5 प्रतिशत कोटा हासिल है। अन्य पिछड़ा वर्ग को 41 फीसदी आबादी पर 27 फीसदी आरक्षण हासिल है। ईडब्लयूएस आरक्षण 50 फीसदी आरक्षण की सीमा के अलावा है जिसके चलते जाति के अलावा अन्य आधारों पर आरक्षण की मांगें नई जगह से उठ सकती हैं।

तमाम बातों के बावजूद इस बात को नकारना मुश्किल है कि यह संशोधन राजनीति से प्रेरित है। ऐसे मामलों में आमतौर पर यही होता है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि विभिन्न राज्य ईडब्ल्यूएस परिवारों के प्रति अपने दायित्व किस हद तक निभा पाएंगे क्योंकि अधिकांश रोजगार तो निजी क्षेत्र में ही तैयार हो रहे हैं।

ऐसे में रोजगार बढ़ाने पर केंद्रित नीतियां आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अधिक बेहतर साबित होंगी बजाय कि रोजगार का वादा करने के क्योंकि वहां बहुत सीमित अवसर हैं। सरकार को शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता सुधारने पर काम करना चाहिए क्योंकि उससे गिनेचुने संस्थानों में आरक्षण की मांग कम होगी। अंत में, नई जातियों और समुदायों की पिछड़ा घोषित किए जाने की बढ़ती मांग हमें आरक्षण की नई श्रेणियों के खतरों से भी अवगत कराती है। भारत जैसी अर्थव्यवस्था वाले देश में ऐसा होने से सामाजिक तनाव बढ़ेगा। इस समय देश को ऐसी स्थिति से बचने की जरूरत है।

Keyword: आरक्षण, ईडब्ल्यूएस, सर्वोच्च न्यायालय,
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