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लॉजिस्टिक्स की दिशा में अहम सुधार के आसार

विनायक चटर्जी /  11 06, 2022

 इस समय जब दुनिया भर में माल परिवहन के तरीकों में मौलिक बदलाव दिख रहे हैं तो लॉजिस्टिक्स यानी रसद प्रबंधन की समग्र प्रक्रिया पर जोर देने का समय आ गया है जिसमें संसाधनों को उत्पादन केंद्र से लेकर उनकी भंडारण योजना बनाने और परिवहन के माध्यम से उन्हें अंतिम गंतव्य तक पहुंचाना शामिल है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का दायरा बढ़ने के साथ ही कंपनियां अब ऐसी भंडारण रणनीति बना रही हैं जिससे क्षमता बढ़े, चीजें कम बर्बाद हों और विनिर्माण के लिए उन्हें समय पर कच्चा माल मिल जाए  जिससे भंडारण की लागत कम हो।

 इन दिनों वैल्यू-वेट अनुपात (यह इलेक्ट्रॉनिक, म्यूजिक उपकरण और गहने से जुड़ा है और इसमें भंडारण करने की लागत अधिक है जबकि परिवहन की लागत कम होती है) बढ़ रहा है। कंटेनरों की बढ़ती व्यवस्था और पैलेट यानी छोटे हिस्सों में माल के भंडारण और परिवहन की प्रक्रिया के साथ बड़े पैमाने पर पूरी सक्षमता के साथ सामानों की पैकिंग की जा रही है। ई-कॉमर्स से जुड़ी महत्वाकांक्षाएं, डिलीवरी के समय को कम करने के लिए लगातार किए जा रहे संघर्ष से जुड़ी हैं।

तकनीकी प्रगति यानी ड्रोन डिलीवरी से लेकर एक परिवहन प्रणाली के हावी होने के बजाय परिवहन के कई माध्यमों के उपयोग से कई तरह के व्यापक बदलाव के संकेत देखने को मिल रहे हैं। विश्व बैंक द्वारा तैयार 2018 के लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक में भारत को 44 वें स्थान पर रखा गया है।

शीर्ष पांच देशों में जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया और जापान शामिल हैं। चीन 26वें स्थान पर है। उस दौरान देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर लॉजिस्टिक्स के हानिकारक प्रभाव को लेकर भारत में गंभीर चर्चा शुरू हुई। इसके परिणामस्वरूप सितंबर में एक राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (एनएलपी) की घोषणा की गई। भारत की बात करें तो यहां 

लॉजिस्टिक्स पर जोर ऐसे समय में दिया जा रहा है जब परिवहन से जुड़े बुनियादी ढांचे के एक बड़े हिस्से यानी ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे से लेकर समर्पित फ्रेट कॉरिडोर तक तैयार किए जा रहे हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और ई-वे बिल प्रणाली ने परिवहन प्रक्रिया की प्रकृति ही बदल दी है क्योंकि अब ऑनलाइन के जरिए इसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। एक और बात यह कि भारत की विकास गाथा केवल तटीय क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें सुदूर इलाकों के विशाल हिस्से को भी जोड़ने की बात है जिसमें गतिशक्ति प्लेटफार्म के जरिये आवश्यक कनेक्टिविटी का निर्माण करने की बात है।

माना जाता है कि भारत की लॉजिस्टिक्स लागत, सकल घरेलू उत्पाद की लगभग 13 प्रतिशत है, और लॉजिस्टिक नीति में इसे 8 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। करीब 13 प्रतिशत के स्तर पर इसकी तुलना चीन के साथ हो सकती है लेकिन यह अमेरिका, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी अधिक है, जहां लागत 7 से 10 प्रतिशत के बीच होने का अनुमान है।

एक अखबार बिजनेस लाइन में छपे एक लेख में नैशनल काउंसिल ऑफ अप्लायड इकॉनमिक रिसर्च के संजीब पोहित ने भारत के 13 प्रतिशत के अनुमान की सत्यता पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा एक सलाहकार कंपनी आर्मस्ट्रॉन्ग ऐंड एसोसिएट्स का है, जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक उपयुक्त मॉडल का उपयोग करती है।

प्रोफेसर पोहित का तर्क है कि भारत का मौजूदा आंकड़ा पहले से ही एकल आंकड़े में सीमित है। भारत को आखिरकार अपनी अर्थव्यवस्था के अनुरूप एक मॉडल का निर्माण और इस्तेमाल करना चाहिए  और इस बीच लागत में किसी भी कमी का स्वागत किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (एनएलपी) के जरिए पांच-आयामी रणनीति पर अमल की योजना है जिससे इसमें कमी आने की उम्मीद है।

पहला, रेलवे की हिस्सेदारी मौजूदा 28 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी की जानी है। दूसरा, मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क स्थापित किए जाने हैं। तीसरा, अंतरदेशीय जल परिवहन, तटीय शिपिंग और पाइपलाइनों के माध्यम से तरल सामग्री एकमुश्य या थोक में भेजने पर विशेष जोर दिया जाना है। चौथा, 15 उद्योगों के लिए विशिष्ट योजनाएं तैयार की जानी हैं जहां से ज्यादातर माल थोक पैमाने पर भेजा जाता है। पांचवां, माल कहां जा रहा है और कहां रखा जा रहा है इसकी निगरानी के लिए डिजिटल तरीके का इस्तेमाल किया जाना है।

इन पांच चिह्नित क्षेत्रों में से प्रत्येक की अपनी अनूठी चुनौतियां हैं। रेलवे के समग्र व्यापार-ढांचे को एक ऐसे निर्माण से बदलना होगा जो सब्सिडी वाले यात्रियों की यात्रा के सामने माल ढुलाई के कारोबार से खुद को बाहर कर देता है। आरओआरओ (रोल-ऑन रोल-ऑफ) विकल्पों के साथ प्रतिबद्ध समय-सारणी के जरिये उच्च गति, उच्च मात्रा वाले ‘समर्पित फ्रेट कॉरिडोर’ पर जोर दिए जाने से इस मकसद में काफी मदद मिलनी चाहिए।

इसके अलावा, गतिशक्ति मंच पर चिन्हित अहम क्षेत्रों में निजी निवेश को प्रोत्साहित करके मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क विकसित किए जाने हैं। मानकीकृत विभिन्न उपयोग वाले कंटेनरों को अपनाने पर जोर दिया जाना है। कृषि मंडियों से लेकर एयरोट्रोपोलिस तक,  आधुनिक रीफर ट्रकों और रेफ्रिजरेटेड गोदाम या वेयरहाउस तैयार करने की आवश्यकता है ताकि भारत जल्द खराब होने वाली वस्तुओं के निर्यात से लाभ उठा सके और घरेलू स्तर पर बर्बादी कम कर सके।

 भारतीय बंदरगाहों की क्षमता और दक्षता में काफी सुधार हुआ है। यह बताया गया है कि एक कंटेनर पोत की वापसी का औसत समय 44 घंटे से घटकर 26 घंटे रह गया है। लेकिन समुद्री माल ढुलाई मूल्य निर्धारण शक्ति को कुछ मजबूत कदमों की आवश्यकता है। भारत को अपने खुद के अहम नौवहन मार्गों के साथ-साथ अपनी कंटेनर सेवाओं की भी आवश्यकता है।

 हालांकि संसद ने 105 नदी क्षेत्रों को राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में घोषित किया है, लेकिन कई तरह की कठिनाइयों की वजह से जल परिवहन बाधित है। इनमें बारहमासी नौवहन माध्यम, रात्रि में नौवहन सेवाएं और नदी-बंदरगाहों की अनुपस्थिति और जहाज चालकों को पर्याप्त सहूलियत देने के लिए संबंधित कनेक्टिविटी जैसे बदलावों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

बड़े पैमाने पर माल का परिवहन कराने वाले 15 उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करने के अल्पकालिक परिणाम मिलेंगे क्योंकि इन संस्थाओं के लॉजिस्टिक्स प्रबंधक इस नई नीति के तत्वावधान में परिवहन के साथ सक्रिय रूप से जुड़ते हैं। इन 15 वस्तुओं में सीमेंट, इस्पात, उर्वरक, कोयला और लौह अयस्क जैसी थोक वस्तुएं शामिल हैं। 

इस क्षेत्र पर सबसे बड़ा प्रभाव डिजिटलीकरण का होगा। एकीकृत लॉजिस्टिक्स इंटरफेस मंच या यूलिप नाम का एक नया मंच रेलवे, सीमा शुल्क, विमानन और वाणिज्य प्राधिकरणों के आज के अलग अलग स्वतंत्र ई-पोर्टलों को एकीकृत करके माल के परिवहन की  निगरानी करने और उसमें तेजी लाने के लिए जरूरी डेटा तक खुली पहुंच की पेशकश करेगा। वाणिज्य मंत्रालय को उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक यह काम करना शुरू कर देगा। 

इन प्रयासों के नतीजों की निगरानी लॉजिस्टिक्स ईज एक्रॉस डिफरेंट स्टेट्स (लीड्स) सर्वेक्षण से होनी है। वर्ष 2022 लीड्स रिपोर्ट 13 अक्टूबर को जारी की गई थी। राज्यों को इस बार किसी विशेष क्रम में स्थान नहीं दिया गया है, लेकिन उन्हें कामयाब, तेजी से सफलता की ओर कदम बढ़ाने वाले और महत्वाकांक्षी (अचीवर्स, फास्ट-मूवर्स और एस्पायरर्स) जैसी श्रेणियों में रखा गया है।

 इन सबसे उम्मीद है कि भारत 2030 तक लॉजिस्टिक्स दक्षता के मामले में दुनिया के शीर्ष 25 देशों में शामिल हो सकता है जो निश्चित रूप से 2047 तक शीर्ष 10 देशों में शामिल होने की उसकी आकांक्षा को बढ़ा सकता है, जब भारत अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे कर लेगा।

(लेखक बुनियादी क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। वह इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक और प्रबंध न्यासी भी हैं)
Keyword: माल परिवहन, लॉजिस्टिक्स,,
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